माँ के गर्भ में ही सीखने लगते हैं बच्चे

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- Author, लेस्ली इवांस ऑर्गडन
- पदनाम, बीबीसी अर्थ
महाभारत का वो क़िस्सा तो आपने पढ़ा ही होगा कि अर्जुन के बेटे अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में घुसने की कला मां के गर्भ में रहते हुए सीखी थी.
उनके पिता अर्जुन, जब सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदकर बाहर निकलने का तरीक़ा बता रहे थे, तो सुभद्रा सो गईं थी. इसलिए अभिमन्यु चक्रव्यूह में घुसने का तरीक़ा तो सीख गए, मगर उससे निकलने का नहीं. आख़िर में अभिमन्यु की मौत चक्रव्यूह में घिरकर हुई.
बहुत से लोग इस क़िस्से पर यक़ीन करते हैं. मगर, बहुत से इसे पौराणिक गल्पकथा मानकर गंभीरता से नहीं लेते. पर क्या वाक़ई में इंसान, मां के गर्भ में रहते हुए बहुत सी बातें सीखता है?
वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब हां में देते हैं. खान-पान, स्वाद, आवाज़, ज़बान जैसी चीज़ें सीखने की बुनियाद हमारे अंदर तभी पड़ गई थीं, जब हम मां के पेट में पल रहे थे.
गर्भवती महिलाओं को अक्सर नसीहतें मिलती हैं कि ज़्यादा मसालेदार चीज़ें न खाओ. ये न खाओ, वो न पियो. ऐसा न करो, वैसा न करो. वरना बच्चे पर बुरा असर पड़ेगा.

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मगर, तमाम तजुर्बों से ये बात सामने आई है कि गर्भवती महिलाएं, प्रेगनेंसी के दौरान जो कुछ भी खाती-पीती हैं, उसकी आदत उनके बच्चों को भी पड़ जाती है. इसकी वजह भी है. जो भी वो खाती हैं, वो ख़ून के ज़रिए, बच्चे तक पहुंचता ही है. तो जैसे-जैसे वो बढ़ता है, वैसे-वैसे मां के स्वाद की आदत उसे लगती जाती है.
उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफ़ास्ट की यूनिवर्सिटी के पीटर हेपर ने इस दावे को परखने की ठानी. उन्होंने कुछ गर्भवती महिलाओं पर तजुर्बा किया. इन महिलाओं में से कुछ ऐसी थीं, जो लहसुन खाती थीं. और कुछ ऐसी भी थीं, जो लहसुन नहीं खाती थीं. उनका रिसर्च सिर्फ़ 33 बच्चों पर था.
लेकिन, हेपर के तजुर्बे से एक बात साफ़ हो गई. जो महिलाएं गर्भ के दौरान लहसुन खाती थीं. उनके बच्चों को भी लहसुन ख़ूब पसंद आता था.

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पीटर हेपर कहते हैं कि गर्भ के दसवें हफ़्ते से भ्रूण, मां के ख़ून से मिलने वाले पोषण को निगलने लगता है. यानी उसे उसी वक़्त से मां के स्वाद के बारे में एहसास होने लगता है. लहसुन के बारे में तो ये ख़ास तौर से कहा जा सकता है, क्योंकि इसकी महक देर तक हमारे बदन में बनी रहती है.
अमरीका की पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी में भी ऐसा ही एक तजुर्बा किया गया था. यहां देखा गया कि जो महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान गाजर ख़ूब खाती थीं. उनके बच्चों को भी पैदाइश के बाद अगर गाजर मिला बेबी फूड दिया गया, तो वो स्वाद ज़्यादा पसंद आया. मतलब ये कि गाजर के स्वाद का चस्का उन्हें मां के पेट से ही लग गया था.
इंसान ही क्यों, कई और स्तनपायी जानवरों में भी ऐसा देखा गया है. पीटर हेपर कहते हैं कि पैदा होने के फौरन बाद बच्चे मां का दूध इसीलिए आसानी से पीने लगते हैं क्योंकि उसके स्वाद से वो गर्भ में रूबरू हो चुके होते हैं.

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हेपर के मुताबिक़ ये लाखों साल के क़ुदरती विकास की प्रक्रिया से आई आदत है. मां, बच्चों की परवरिश करती है. उनकी रखवाली करती है. इसलिए बच्चों को उससे ज़्यादा अच्छी बातें कौन सिखा सकता है? खाने के मामले में ख़ास तौर से ये कहा जा सकता है. दुनिया में आने पर कोई नुक़सानदेह चीज़ न अंदर चली जाए, इसीलिए क़ुदरत बच्चों को मां के पेट में ही सिखा देती है कि क्या चीज़ें उसके लिए सही होंगी.

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ये बात ख़ास तौर से उन जानवरों पर लागू होती है, जिनकी पैदाइश से ही उन पर ख़तरा मंडराने लगता है. जैसे फेयरी रेन नाम की एक चिड़िया. ऑस्ट्रेलिया में इसके बारे में बेहद दिलचस्प रिसर्च हुई है. ये रिसर्च भी बेइरादा तरीक़े से हुई.
एडीलेड की फ्लाइंडर्स यूनिवर्सिटी की डाएन कोलोम्बेली-नेग्रेल, इन चिड़ियों की आवाज़ रिकॉर्ड करती थीं. उन्होंने महसूस किया कि, रात के वक़्त अंडे सेने वाली मादा फेयरी रेन एक अलग ही तरह की आवाज़ निकालती थी. ये बात उन्हें अजीब लगी. वजह ये कि अंडे सेते वक़्त तो परिंदे और भी चौकसी रखते हैं. ये काम चुपचाप करते हैं. वरना दुश्मनों को ख़बर होने का अंदेशा रहता है.
नेग्रेल को लगा कि उन्होंने ये आवाज़ कहीं सुनी है. उन्होंने पाया कि जब फेयरी रेन के बच्चे अंडों से बाहर आते हैं तो वो ये शोर मचाते हैं. जैसे ये कह रहे हों कि हमें खाना दो, खाना दो. तो क्या, माएं अपने बच्चों को अंडे के भीतर रहते हुए ही ये आदत सिखा रही थीं?

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आख़िर इसकी ज़रूरत क्या थी?
फेयरी रेन के बच्चों को इसकी ख़ास तौर से ज़रूरत थी. अक्सर होता ये है कि कोयल, जो एक नंबर की काहिल चिड़िया है. वो बच्चे पालने से बचने के लिए चुपचाप, फेयरी रेन के घोंसले में अंडे दे आती है. फिर उन अंडो को अपना समझकर फेयरी रेन सेती है. जब कोयल का बच्चा होता है तो वो सबसे ज़्यादा शोर मचाता है. उसके शोर से फेयरी रेन, अक्सर अपने असल बच्चों को छोड़कर कोयल के बच्चे को ही सारा खाना खिला देती है. उसके अपने बच्चे मर जाते हैं.

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इस झांसे से बचने के लिए ही शायद फेयरी रेन अपने अंडों में पल रहे बच्चों को पैदा होने पर ये आवाज़ निकालने की बात सिखा रही होती है. इस बारे में कोलम्बेली-नेग्रेल ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर एक प्रयोग किया. उन्होंने कुछ फेयरी रेन के घोंसलों में अंडे बदलकर दूसरे परिदों के अंडे रख दिए. देखा ये गया कि उनमें से निकले बच्चे, ठीक वैसे ही शोर मचा रहे थे, जैसे अंडे सेते वक़्त फेयरी रेन ने आवाज़ निकाली थी. यानी अपनी असल मां के बजाय इन परिंदों के बच्चों ने फेयरी रेन की आवाज़ सीख ली थी. ऐसा अंडे सेते वक़्त ही हो सकता था.
इसी तजुर्बे को आगे बढ़ाते हुए, कोलम्बेली-नेग्रेल और उनके साथियों ने ये पड़ताल की कि क्या बच्चों के इस शोर में फ़र्क़ को मांएं समझ पाती हैं. तजुर्बे से मालूम हुआ कि परिंदों के शोर में वो अपने बच्चों की आवाज़ को पहचान लेती हैं. यानी कोयल की चालाकी का फेयरी रेन ने क़ुदरती तोड़ निकाल लिया है.
कोलम्बेली-नेग्रेल के साथी मार्क हाउबर कहते हैं कि ये एक तरह का पासवर्ड है. ज़िंदगी का पासवर्ड. जिसे अंडे सेते वक़्त फेयरी रेन मांएं अपने बच्चों को सिखा रही होती हैं. इससे उनके बचने की उम्मीद बढ़ जाती है. अपने बच्चों की आवाज़ पहचान कर मां उन्हें सबसे पहले खाना खिलाती है. जिससे उनके जीने की संभावना बढ़ जाती है.
वैसे ये रिसर्च नया नहीं. अमरीकी मनोवैज्ञानिक गिलबर्ट गोटलिएब ने सत्तर के दशक में ही ये पाया था कि बतख के बच्चे, जन्म से पहले कुछ ख़ास आवाज़ों के बारे में सीख लेते हैं.

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अभी हाल ही में अमरीका की इंडियाना यूनिवर्सिटी के क्रिस्टोफर हार्शॉ और रॉबर्ट लिकलाइटर ने एक और परिंदे की नस्ल पर तजुर्बा करके पाया है कि उनके बच्चे जन्म से पहले कुछ ख़ास आवाज़ें निकालना सीख लेते हैं.
जन्म से पहले आवाज़ सीखने वाली इस बात के बारे में सबसे ज़्यादा रिसर्च इंसानों के बीच ही हुआ है. कुछ तो जन्मजात गुण होते हैं. कुछ गर्भ में पलने के दौरान भी बच्चा सीखता है.
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की एथेना वॉल्यूमैनस को इस बारे में काफ़ी दिलचस्पी है कि इंसान, कैसे ज़बान सीखता है. गर्भ में ऐसा होता है या बाहर के माहौल का असर? अब गर्भ में ज़बान के बारे में बच्चा क्या सीखता है ये पता लगाना ज़रा टेढ़ी खीर है.
लेकिन, एथेना ने ये ज़रूर पड़ताल की है कि नवजात बच्चे ज़बान वाली आवाज़ ज़्यादा समझते हैं या सिर्फ़ सामान्य आवाज़, जिसमें शब्द न हों. जैसे संगीत. उन्होंने पाया कि बच्चे उन आवाज़ों को ज़्यादा तवज्जो देते हैं जिनमें शब्द होते हैं. जैसे कि दो लोगों की बातचीत, या गीत. मां-बाप की आवाज़ को तो बच्चे सबसे ज़्यादा पहचानते हैं. इसी से उनकी ज़बान सीखने की बुनियाद पड़ती है. जो ज़बान मां-बाप बोलते हैं, उसे सीखना बच्चे के लिए सबसे ज़रूरी है. आख़िर पहला संवाद अपने मां-बाप से ही तो करते हैं बच्चे.

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मां के गर्भ में रहते हुए, बच्चों पर गीत संगीत का भी असर पड़ता है. अगर मांएं गर्भ के दौरान ख़ास तरह का संगीत सुनती हैं, तो पैदा होने पर बच्चे भी उस आवाज़ को आसानी से पहचान लेते हैं.
तो इस बात का ख़ास ख़याल रखा जाना चाहिए कि गर्भवती महिला के आस-पास कैसा माहौल हो? इसका सीधा असर बच्चे पर पड़ता है. इस बारे में सावधानी बरतना तो ठीक है. लेकिन, गर्भ में पल रहे बच्चों को ख़ास तरह की आवाज़ या संगीत का आदी बनाना ठीक नहीं.
तमाम जीवों के बच्चे, पैदा होने से पहले ही स्वाद, ख़ुशबू और कुछ ख़ास आवाज़ों को पहचानना सीख जाते हैं. इनके अलावा भी कई जानवरों के बच्चे, पैदा होने से पहले कई गुण सीख लेते हैं.

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कटलफ़िश की ही मिसाल ले लीजिए. इस बारे में हुए एक रिसर्च में कटलफ़िश के अंडों के आस-पास अक्सर केकड़ों की तस्वीर घुमाई जाती थी. पैदा होने पर ऐसे अंडों से निकली कटलफ़िश को केकड़े ख़ास तौर से पसंद आते देखे गए. वो इनका जमकर शिकार करती थीं. मतलब अंडे के भीतर से ही केकड़े की तस्वीरें देखकर उनका झुकाव केकड़ों की तरफ़ हो गया था.
मेंढक और सैलेमैंडर के बच्चे भी जन्म से पहले किसी ख़तरे की आहट और इससे बचने की जुगत सीख जाते हैं. बेहद ख़तरनाक माहौल में पैदा होने वाले सैलेमैंडर के बच्चों का बचना बेहद मुश्किल होता है. वो अंडों में रहने के दौरान ही उस माहौल से रूबरू कराए जाते हैं, जिससे जन्म के बाद उनका सामना होने वाला होता है. जो भी उसे सीख लेता है, वो ही जन्म के बाद बच पाता है.
इस बारे में पता चलने पर मिसौरी स्टेट यूनिवर्सिटी की एलिशिया मैथिस, सैलेमैंडर की एक ख़ास नस्ल को बचाने में जुटी हैं. इस नस्ल का नाम है हेलबेंडर सैलेमैंडर. जिसके ख़ात्मे का ख़तरा मंडरा रहा है. इसके अंडों को ख़ास माहौल में रखा जाता है. ताकि उसमें पल रहे बच्चे, दुनिया में आने से पहले ही अपने रिहाइश के माहौल के ख़तरे से वाकिफ़ हो जाएं.
तो, अब आपको यक़ीन आया, अभिमन्यु की कहानी पर?
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