जान जोखिम में डालकर भागती ये औरतें

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- Author, कैरोलीन हैवली
- पदनाम, वर्ल्ड अफेयर्स संवाददाता
रक़्क़ा की 28 साल की डॉक्टर माहा के चेहरे पर अब मुस्कान है क्योंकि वो इस्लामिक स्टेट के क़ब्जे वाले सीरिया के शहर से निकलने में क़ामयाब हो गई हैं.
उन्होंने सुरक्षित निकलने के लिए तुर्की की सीमा के साथ लगे रास्ते को कीचड़ में रेंगते हुए पार किया.
रक़्क़ा को अब कथित तौर पर इस्लामिक स्टेट की राजधानी कहा जाता है.
उन्होंने ग्रीस के द्वीप लेसबोस पर कारा टेपे कैंप में मुझे बताया, "मौत हर क़दम पर मेरे साथ थी."
उनका दिल हर उन 46 सुरक्षा चौकियों पर ज़ोर-ज़ोर से धड़कता था जहां से उन्हें गुज़रना होता था.
वो कहती है, "वे नहीं चाहते हैं कि डॉक्टर देश छोड़कर जाएं. वे मुझे रोक सकते थे."
उन्होंने अपने क़ागजातों को अपने कपड़े में सिल कर छिपा लिया था. वो इन बहुमूल्य दस्तावेज़ों को अपने साथ ले जाना चाहती थीं ताकि नई जगह पर काम मिल जाए और वो नए सिरे से ज़िंदगी की शुरुआत कर सकें.
वो अपने भाई और बहनों से मिलना चाहती थीं जो कि पहले ही देश छोड़कर जर्मनी जा चुके थे.

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जब से पलायन का संकट शुरू हुआ है तब से पलायन करने वाले ज्यादातर पुरुष ही थे. लेकिन इस साल की शुरुआत में शरणार्थियों और प्रवासियों में औरतों और बच्चों की बड़ी संख्या हो गई है.
इनमें से अधिकांश देश छोड़ चुके अपने पति और बच्चों से मिलने के लिए पलायन कर रही हैं, जबकि अन्य पांच सालों के गृहयुद्ध में अपने पति के मारे जाने के बाद पलायन कर रही हैं.
सहायता समूहों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि यूरोप पहुंचने के साथ ही औरतों को जिन जोखिमों का सामना करना पड़ता है, वो ख़त्म हो जाता है.
यूएन पॉपुलेशन फंड के मुखिया बैबाटुंड सोटीमेहिन का कहना है, "परिवार और समाज के संरक्षण के अभाव में वे अक्सर यौन हिंसा, अनचाहा गर्भ, मानव तस्करी और बाल विवाह की शिकार होती हैं."
कारा टेपे कैंप में काम करने वाली इंटरनेशनल रेस्क्यू कमिटी की मनोवैज्ञानिक किकि मिशेलिडाउ के मुताबिक़, औरतें 'बहुत ज़्यादा तनाव' झेल रही हैं.
वो कहती हैं, "मुझे 20 लोगों की प्रतीक्षा सूची मिली है और हर दिन हमारे सामने नया मामला आ रहा है."
मैंने माहा से पूछा कि क्या उन्हें बिना किसी मर्द के यहां तक पहुंचने में डर नहीं लगा?
उन्होंने कहा, "वाक़ई में हम जो पीछे छोड़ आए हैं, वो बहुत बुरा था. मैं अपने देश में डरी हुई थी इसलिए मैं उसे छोड़ आई."

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माहा अब आठ दूसरी औरतों और लड़कियों के साथ एक झोपड़ी में रह रही हैं.
यह एक तंग झोपड़ी है लेकिन कारा टेपे कैंप उन लोगों के लिए बनाया गया है जो सबसे ख़राब हालत में लेसबोस पहुंच रहे हैं.
हालांकि यहां के हालात उनके देश के हालात से कहीं बेहतर हैं, जहां यूरोप की सीमा बंद होने के कारण पचास हज़ार लोग फंसे हुए हैं.
लेकिन हताशा और अनिश्चितता की स्थिति ज़रूर है.
औरतों को कैंप में यह नहीं पता है कि उनके साथ आगे क्या होगा और उनके दुखों का अंत कब होगा.
माहा के नए आशियाने से कुछ ही दूर पर चार महिलाएं एक दूसरे झोपड़े में अपने चार बच्चों के साथ रह रही हैं.
दोपहर के वक्त मैं उन लोगों से मिली. उस वक्त वो लोग अभी सोकर उठे ही थे.

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उन्होंने कहा, "हम नहीं चाहते हैं कि आप ये सोचें कि हमलोग आलसी हैं. लेकिन हम लोग जितना संभव हो उतना सोने की कोशिश करते हैं ताकि बोरियत से बच सकें और पुरानी बातों को भूल सकें."
जब वो अपने पीछे छोड़ आई ज़िंदगी को याद करती हैं तो उनकी आंखें भर जाती हैं.
ये सीरियाई शहर डेर अल-ज़ोर से आई हैं जोकि सरकारी सुरक्षा बलों और इस्लामिक स्टेट लड़ाकों के नियंत्रण में बंटा है. वे इतना डरी हुई हैं कि अपने नाम भी बताने पर राज़ी नहीं हैं.
उनमें से सबसे उम्रदराज 38 साल की महिला, जिन्हें हम फ़ातिमा कहेंगे, ने बताया, "मानव तस्करों ने हमारे पैसे चुरा लिए. उन्होंने पुलिस को बता देने की धमकी देकर हमें ब्लैकमेल किया. अगर हमारे साथ कोई मर्द होता तो बात थोड़ी अलग होती. हमारी तरफ से कोई लड़ने वाला होता."
लेकिन उनके पति सीरिया में फंसे हुए हैं. वो एक सरकारी कर्मचारी हैं इसलिए आसानी से तुर्की जाने वाली सड़क पर बनी चौकियों को पार नहीं कर सकते थे.
फ़ातिमा की बहन के पति का इस्लामिक स्टेट ने सिर क़लम कर दिया. उनकी एक और बहन के पति की मौत सरकारी जेल में प्रताड़ना से हो गई.

अब वे सभी जर्मनी जाने की कोशिश कर रही हैं, जहां उनका एक रिश्तेदार उनके एक बेटे के साथ है.
कारा टेपे में उनकी झोपड़ी में रोशनी नहीं है और दरवाज़ा बंद करने के लिए कोई लॉक भी नहीं है.
वो रात में झोपड़ी के दरवाजे को तार से बांधकर रखती हैं. फातिमा कहती हैं, "रात में हम टॉयलेट जाने से डरते हैं."
मर्दों के बिना सीरिया छोड़ने वाली औरतों ने एक-दूसरे का साथ देने के लिए अपना एक नेटवर्क तैयार किया है.
सिहाम और फ़ातिया, दोनों अपनी पहली मुलाकात के बारे में याद करते हुए मुस्कुरा देती हैं.
उन दोनों की मुलाकात एक तुर्की हिरासत केंद्र में हुई थी जब दोनों मार्च में सीरिया से ग़ैर-क़ानूनी ढंग से सीमा पार करने के आरोप में बंदी बनाई गई थीं.
सिहाम के पति और उनके दो बेटे उत्तरी सीरिया में एक साल पहले लापता हो गए थे और अब उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है कि उनके साथ क्या हुआ.

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अपने घर पर विद्रोहियों का गोला गिरने के बाद वो अपनी बेटी के साथ एलेप्पो से भाग आई थीं.
वे अब फ़ातिया के साथ कारा टेपे के झोपड़े में रहती हैं. फ़ातिया अपने तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ दमिश्क छोड़कर अपने पति के पास जाने के लिए आई हैं. उनके पति अपने दो और बच्चों के साथ जर्मनी में हैं.
फ़ातिया कहती हैं, "हम दोनों एक-दूसरे के लिए बहनों की तरह हो गए हैं. मैं सीरिया में अपनी एक बहन को छोड़कर आई हूँ, लेकिन मुझे यहां एक नई बहन मिल गई है."
सिहाम कहती हैं, "मुझे भी."
दोनों ने उम्मीद पाल रखी है कि जर्मनी में वे आस पड़ोस में ही रहेंगी.
लेकिन कैंप में मौजूद हर किसी की तरह उन्हें भी इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं है कि यह कब होगा और आख़िर हो भी पाएगा कि नहीं.
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