'पाक को बदनाम करने के लिए हमले का ड्रामा'

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- Author, अमृता शर्मा
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
पाकिस्तानी मीडिया में आ रही ख़बरों के मुताबिक पठानकोट हमले की जांच करने भारत गई पाकिस्तानी टीम भारतीय एजेंसियों के जुटाए सबूतों से संतुष्ट नहीं है.
पाकिस्तानी टीम को भारत की राष्ट्रीय जांच एजंसी ने ये सबूत उपलब्ध कराए थे और उन्हें इस घटना से जुड़ी जगहों का दौरा कराया था.
पाकिस्तान टुडे की ख़बर में पाक जांच टीम के सूत्रों से हवाले से ख़बर है- "पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए इस हमले का ड्रामा किया गया. कोई सबूत नहीं है कि हमलावर पाकिस्तान से आए थे."
ग़ौरतलब है कि फिलहाल आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान सरकार की ओर से पठानकोट हमले पर पाकिस्तानी जांच टीम के फैसले के बारे में कुछ नहीं कहा गया है.
अंग्रेज़ी के अख़बार 'पाकिस्तान टुडे' ने ख़बर दी है कि पाकिस्तानी जांच दल ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली है. वह इसे अगले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री को सौंपेगा.

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इस ख़बर में ये आरोप लगाया गया है कि भारत सरकार ने सहयोग करने की जगह पाकिस्तानी टीम की जांच में बाधा डालने का प्रयास किया.
पाकिस्तानी मीडिया ने भारत की एनआईए के एक पुलिस अधिकारी की हत्या को लेकर भी सवाल उठाए हैं. ये अधिकारी पठानकोट हमले की जांच में शामिल थे.

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अंग्रेजी के अख़बार 'द नेशन' के तीन अप्रैल की संपादकीय में लिखा, ''पाकिस्तानी संयुक्त जांच दल (जेआईटी) पठानकोट मामले में जब तक कोई ठोस सबूत नहीं जुटा लेता है, तब तक इस मामले में आगे कोई कार्रवाई नहीं हो सकती है.''
'पाकिस्तान टुडे' ने चार अप्रैल को ख़बर दी कि पाक टीम के एक सदस्य ने कथित तौर पर कहा कि मुस्लिम जांचकर्ता की हत्या सबूत है कि भारतीय प्रशासन मामले मेें कुछ छिपा रहा है.
अंग्रेज़ी के अलावा ऊर्दू अख़बारों में भी पाठनकोट की जांच रिपोर्ट और भारतीय जांच दल के सदस्य मोहम्मद तंजील अहमद की हत्या पर चिंता जताई गई है.
पाकिस्तान का सबसे बिकने वाला उर्दू अख़बार 'जंग' कहता है, '' यह समय की ज़रूरत है कि भारतीय अधिकारी की हत्या की विस्तृत और निष्पक्ष जांच हो. इस मामले के असली कारणों को सामने लाया जाए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो पठानकोट हमला विवादास्पद मामले में बदल जाएगा. हालांकि यह भारत सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह इस मामले में सभी तरह के शक दूर करे.''

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ऊर्दू अख़बार 'डेली एक्सप्रेस' का इस्लामाबाद संस्करण लिखता है, ''हमारा विश्वास है कि तंजील अहमद की हत्या कोई दुर्घटना नहीं है. यह भारतीय एजंसियों की योजना का हिस्सा हो सकता है. यह संभव है कि उन्हें पठानकोट हमले को लेकर कोई सबूत मिल गया हो, जो कि भारतीय एजंसियों के ख़िलाफ़ जाता हो और उनके षड्यंत्र की पोल खोलने के लिए काफी हो.''
रूढ़िवादी और राष्ट्रवादी माने जाने वाले उर्दू अख़बार 'नवा-ए-वक्त' का दावा है, ''जब इस अधिकारी की हत्या की गई तो वह अधिकारी पठानकोट वायुसेना अड्डे पर हुए हमले के हमलावरों को बेनकाब करने वाले थे. पठानकोट हमले में भारत का असली चेहरा सामने आ गया है.''
इस्लामाबाद से निकलने वाला ज़िहाद समर्थक अख़बार 'औसाफ़' लिखता है, ''भारत अगर पठानकोट मामले की जांच को लेकर गंभीर है तो उसे इस मामले की जांच कर रहे अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए. बहानेबाजी और दलीलों से कोई लाभ नहीं होगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस तरह के मामलों का संज्ञान लेना चाहिए."
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