बिना बहस के दूसरों को कायल बना सकते हैं?

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- Author, टॉम स्टैफ़ोर्ड
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
"आप समझे नहीं. आप जिस बात पर अड़े हैं, वो बिल्कुल सही नहीं. मेरी बात सुनिए तो आपको सब-कुछ सही-सही समझ आएगा. अगर आप राज़ी हैं तो मैं आपको पूरा मामला बताता हूं. मैं यक़ीन दिलाता हूं कि आप मेरे क़ायल हो जाएंगे."
हम किसी से भी बहस करते वक़्त अक्सर ऐसे ही कहते हैं. दूसरे की बात खारिज़ करते हैं. अपनी बात मनवाने में पूरा ज़ोर लगा देते हैं. फिर चाहे मुद्दा कोई भी हो. दुनिया की आबो-हवा में बदलाव का मसला हो, खाड़ी देशों में जंग की बात हो या फिर, आने वाली छुट्टियों की प्लानिंग. अक्सर हम लोग दूसरों की बात सुनने के बजाय अपनी बात मनवाने पर ज़ोर देते हैं. और जब आप अपनी बात पर अड़ जाते हैं, तो, सामने वाला भी झुकने को या आपकी बात मानने को राज़ी नहीं होता.
क़िस्मत से, रिसर्च के ज़रिए कुछ ऐसे तरीक़े तलाशे गए हैं, जिनकी मदद से आप बिना बहस के, बिना धमकाए, बहस में सामने वालों अपना क़ायल बना सकते हैं.
क़रीब एक दशक पहले अमेरिका की याल यूनिवर्सिटी में ऐसी रिसर्च हुई थी. जिसे लिओनिद रोज़ेनबिट और फ्रैंक कील ने किया था. इसमें उन्होंने लोगों से ये पूछा था कि वो कोई भी चीज़ या बात किस हद तक समझते हैं. जैसे कि क्या उन्हें कार के स्पीडोमीटर के काम करने का तरीक़ा पता है? या फिर, क्या वो जानते हैं कि सिलाई मशीन कैसे काम करती है?

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सवाल का जवाब देने से पहले ही लोगों से कहा गया कि वो अपनी जानकारी की रेटिंग करें. फिर सवाल का जवाब देने के बाद उन्हें अपने जवाब की रेटिंग करने को कहा गया. दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ था. असल जवाब देने से पहले लोगों ने अपने को बड़ा जानकार ज़ाहिर किया. मगर जब उनके जवाब के झोल बताए गए, तो लोगों ने ख़ुद ही अपनी रेटिंग घटा ली.
अक्सर होता यही है. हमें बहुत सी चीज़ों की जानकारी नहीं होती. या होती है तो बेहद सतही. मगर हम ख़ुद को उस मामले का बड़ा जानकार समझते हैं. और इसीलिए बहस के दौरान अपनी कमी पर ध्यान देने के बजाय, ख़ुद को क़ाबिल साबित करने में जुट जाते हैं. सामने वाले को धमकाने वाले अंदाज़ में कहते हैं कि पूरा सच सिर्फ़ आपको मालूम है. अक्सर हम अपनी जानकारी को ख़ुद ही सच की कसौटी पर नहीं कसते. और, दूसरे लोग हमसे सवाल नहीं करते. इसलिए अपनी जानकारी की कमी का हमें एहसास ही नहीं होता.
मनोवैज्ञानिक, इस मुग़ालते को जानकारी की कंजूसी का नाम देते हैं. हम अक्सर ये सोचते हैं कि कोई बात अच्छे से समझने में हम क्यों वक़्त बर्बाद करें. जब आधी-अधूरी जानकारी से ही हमारा काम अच्छे से चल रहा है. हम दूसरों पर रौब गांठने में कामयाब हैं. असल में, हम अपनी सतही जानकारी को ख़ुद से ही छुपाते हैं.
जिसने भी किसी भी तरह की टीचिंग की है, उसे ये बात अच्छे से पता है. इसका एहसास उसी वक़्त से हो जाता है, जब आप कोई विषय पढ़ाने की प्रैक्टिस शुरू करते हैं. या फिर इस बात की तैयारी करते हैं कि किसी शागिर्द के सवाल का जवाब कैसे देंगे. आपको तुरंत ही एहसास होता है कि आप तो इस मसले को अच्छे से जानते ही नहीं, तो पढ़ाएंगे क्या? बच्चों को समझाएंगे क्या? पूरी दुनिया में अध्यापक ये बात कहते हैं कि जब तक उन्होंने पढ़ाने की शुरुआत नहीं की, उन्हें फलां बात ख़ुद अच्छे से नहीं मालूम थी. पढ़ाने के दौरान ही उन्होंने उस विषय को सही तरीक़े से समझा.
जानकारी की इस कमी को ही एक मौक़े में तब्दील करके, लोगों को अपना क़ायल बनाया जा सकता है.

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इस बात पर अमेरिका के कोलोराडो यूनिवर्सिटी के फ़िलिप फर्नबैक की टीम ने रिसर्च की थी. फर्नबैक कहते हैं कि चाहे कोई राजनैतिक सिद्धांत हो या टॉयलेट के काम करने का तरीक़ा. सब बातों पर ये लागू होगा. अगर हम किसी को ये कहें कि वो अपनी बात दूसरों को समझाने के बजाय, ख़ुद को वही बात समझाएं. तो उसे ख़ुद अपनी बात की कमज़ोरियों का एहसास होगा. वो दूसरों को क़ायल बनाने पर ज़ोर देने के बजाय, अपनी बात की कमियों को दूर करने की कोशिश करेगा.
फर्नबैक और उनकी टीम ने इंटरनेट पर अमरीकी लोगों से कई मसलों पर उनकी राय मांगी थी. इन लोगों को दो हिस्सों में बांटा गया था. पहले ग्रुप से कहा गया कि ईरान पर प्रतिबंध लगाने के फ़ैसले, अमरीकी स्वास्थ्य सेवाओं और ग्लोबल वार्मिंग जैसे मसलों पर अपनी राय दें. वो बताएं कि इनसे जुड़े जो फ़ैसले सरकार ने लिए, वो उनका क्यों समर्थन करते हैं.
दूसरे ग्रुप से कहा गया कि वो सरकारी फ़ैसलों की जगह जो तरीक़े ख़ुद बता रहे हैं, उनको सही साबित करने की कोशिश करें, अपने तर्क से.
जब इस सर्वे के नतीजे आए, तो वो चौंकाने वाले थे, जिन्होंने सरकारी नीतियों का समर्थन किया था. वो अपनी राय पर कायम रहे.
मगर, जिन्हें सरकार के बजाय अपने तर्क रखने थे, वो बदल गए थे. क्योंकि सरकार के फ़ैसले के विरोध में जो वो कह रहे थे, उसके क़ायल वो ख़ुद नहीं थे. इसलिए जब अपनी बात सही साबित करने की बारी आई, तो वो नाकाम रहे.

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तो, आइंदा अपने दोस्तों से किसी बहस में उलझिए तो इस बात का ख़ास ख़याल रखिएगा. नए एटमी प्लांट लगाने की बात हो, या पूंजीवाद के पतन का मामला. या फिर आप ये बात सही साबित करना चाहते हों कि दस हज़ार साल पहले डायनासोर, इंसानों के साथ इसी धरती पर रहते थे.
याद रहे, आपको ये समझाना पड़ सकता है कि आख़िर, किस बुनियाद पर आप ये बात सही मानते हैं. अगर, आपको अपनी राय पर भरोसा नहीं, तो दूसरे आपकी बात मानें, उससे पहले आपको ही अपनी राय बदलने को तैयार रहना चाहिए.
(अंग्रेज़ी में मूल <link type="page"><caption> </caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160322-when-personal-and-professional-lives-collide" platform="highweb"/></link>ले<link type="page"><caption> ख यहां</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20140521-the-best-way-to-win-an-argument" platform="highweb"/></link> पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ़्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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