सस्ते कच्चे तेल का सफर अब हुआ और लंबा

इमेज स्रोत, Getty

    • Author, क्रिस बारानियूक
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

पिछले एक साल से कच्चे तेल के दामों में भारी गिरावट आई है. तेल बेचकर काम चलाने वाले देशों की हालत पतली है. तेल के कारोबारियों का मुनाफ़ा घट गया है. भारत जैसे तेल ख़रीदने वाले देशों को अपना सरकारी घाटा पूरा करने का सुनहरा मौक़ा मिल गया है.

मगर तेल के दाम गिरने का एक और ही, बड़ा अजब तरह का असर हुआ है. अब दुनिया भर में तेल पहुंचाने वाले जहाज़, पुराने, लंबे, ऐतिहासिक रास्तों से आ-जा रहे हैं.

आख़िर क्या है ये माजरा? चलिए पता लगाते हैं.

मिस्र की स्वेज़ नहर भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है. 19वीं सदी में बनी ये नहर, उस वक़्त की इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा कमाल मानी गई थी. इसको बनाने में 20 साल लगे थे. क़रीब 15 लाख मज़दूरों ने इसे बनाने के लिए मशक़्क़त की थी.

नहर को बनाने में हज़ारों लोगों की जान चली गई थी. मगर जब वर्ष 1869 में ये नहर चालू हुई तो इसने समंदर से होने वाले कारोबार की दशा और दिशा बदल दी. समुद्री सफ़र में एक इंक़लाब सा आ गया था. इसने यूरोप और एशिया के बीच की दूरी क़रीब साढ़े छह हज़ार किलोमीटर घटा दी थी.

इमेज स्रोत, Getty

मसलन, सिंगापुर से नीदरलैंड के रॉटरडम बंदरगाह के बीच की दूरी क़रीब 6480 किलोमीटर कम हो गई थी. इससे वक़्त और पैसा दोनों बचते थे.

मगर, आज, तेल की क़ीमतों में गिरावट के चलते, तेल ढोने वाले जहाज़, स्वेज़ नहर के रास्ते से गुज़रने से बच रहे हैं. इसके बजाय वो पूरे अफ्रीकी महाद्वीप का चक्कर लगाकर यूरोप या एशिया पहुंचने का विकल्प चुन रहे हैं.

दक्षिण अफ्रीका के आख़िरी छोर पर स्थित 'केप ऑफ़ गुड होप' या उत्तमाशा अंतरीप से होते हुए यूरोप से एशिया जाने वाला ये रास्ता, सदियों पुराना है. जब पहले पहल यूरोपीय खोजी नाविक, नई दुनिया की तलाश के लिए निकले थे.

पर, आज जल्दी का ज़माना है. फिर, सवाल उठना लाज़िमी है कि तेल के बड़े-बड़े जहाज़ स्वेज़ नहर की बजाय, ये लंबा रास्ता क्यों चुन रहे हैं?

एक मोटे अंदाज़े के मुताबिक़, पिछले साल अक्तूबर से इस साल जनवरी के बीच 100 से ज़्यादा तेल टैंकर्स ने स्वेज़ नहर की बजाय 'केप ऑफ़ गुड होप' का रास्ता चुना. जानकार, इसकी कई वजहें बताते हैं.

इमेज स्रोत, Getty

तेल के कारोबार पर नज़र रखने वाली मिशेल बॉकमन कहती हैं कि जहाज़ का ईंधन सस्ता है. इसलिए उनके लिए लंबा रास्ता चुनने का विकल्प खुल गया है. इसके और भी फ़ायदे हैं. जैसे स्वेज़ से गुज़रने पर उन्हें अच्छा ख़ासा टोल चुकाना पड़ता है.

वो बताती हैं कि एक जहाज़ को क़रीब साढ़े तीन लाख डॉलर, या क़रीब 24 करोड़ रुपए का टैक्स स्वेज़ नहर अथॉरिटी या मिस्र सरकार को देना पड़ता है.

उनके मुताबिक़ इसके अलावा, स्वेज़ से गुज़रते वक़्त जहाज़ों को हफ़्ता वसूली का भी शिकार होना पड़ता है. स्वेज़ नहर से गुज़रते वक़्त जहाज़ों को अथॉरिटी के कर्मचारियों को ज़बरदस्ती ढोना पड़ता है. वो लोग कभी सिगरेट तो कभी चॉकलेट मांगकर जहाज़ के लोगों को तंग करते हैं. हज़ारों रुपए का ख़र्च बढ़ता है सो अलग.

इसके मुक़ाबले, तेल टैंकर अगर 'केप ऑफ़ गुड होप' का रास्ता चुनते हैं तो सिर्फ़ 11 दिन ज़्यादा लगते हैं. ख़र्च कम पड़ता है. सस्ते तेल की वजह से तेल टैंकरों के मालिकों के लिए ये विकल्प खुल गया है.

इमेज स्रोत, Getty

मिशेल बॉकमैन कहती हैं कि आज तेल के कारोबारी, अपने टैंकर्स को देर तक समंदर में रख रहे हैं. वो इस इंतज़ार में रहते हैं कि तेल की क़ीमतें सुधरें, तो उन्हें ज़्यादा मुनाफ़ा हो. तेल सस्ता होने की वजह से, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की सप्लाई, मांग से ज़्यादा हो गई है. इस वजह से तेल के कारोबारी, भरे हुए टैंकर कभी समंदर के लंबे रास्तों पर घुमा रहे हैं तो कभी दूर दराज़ के बंदरगाहों पर खड़ा रख रहे हैं. इस इंतज़ार में कि क़ीमतों में उछाल आएगा तो उन्हें अपने माल की ज़्यादा क़ीमत मिलेगी.

मिशेल बताती हैं कि समंदर में तेल का स्टॉक रखने के इस खेल को 'कॉन्टैंगो' कहा जाता है. दिसंबर में ये स्टोरेज पिछले पांच सालों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया.

टैंकर मालिकों के लिए गेंद हमेशा उन्हीं के पाले में रहती है. वो ये तय कर सकते हैं कि जहाज़ किस रास्ते से जाएं. वो ये भी तय कर सकते हैं कि जहाज़ कितने दिन समंदर में रहें जिससे उन्हें अपने माल की अच्छी क़ीमत मिल सके, मुनाफ़ा बढ़ सके.

बस उनका तेल अच्छी क्वालिटी का होना चाहिए. हालांकि कई बार बड़े टैंकरों को बंदरगाहों की सुविधा मिलने में दिक़्क़त होती है. इसीलिए वो लंबा रास्ता तय करते हैं.

आज की तारीख़ में तेल के टैंकर, कच्चे तेल के गिरे दामों की वजह से लंबे रास्ते के विकल्प इसीलिए चुन रहे हैं. आख़िर तेल के कारोबार की दुनिया निराली जो है और इसका चाल-चलन भी अलग है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख <link type="page"><caption> यहां पढ़ें</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160303-cheap-oil-is-taking-shipping-routes-back-to-the-1800s" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)