'ख़लीफ़ा की आवाज़' कौन सुन रहा है?

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''वॉयेस ऑफ़ द कैलिफ़ेट'' यानी ''ख़लीफ़ा की आवाज़'' चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट का दो महीने पहले लॉन्च किया गया एफ़एम रेडियो चैनल है.
इसकी बढ़ती गतिविधियों से सवाल उठ रहे हैं कि तमाम आधुनिक तकनीक के बावजूद अफ़ग़ान सरकार और उसके पश्चिमी सहयोगी इसे बंद क्यों नहीं कर पा रहे हैं.
पश्तो भाषा में पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर दिसंबर में इस रेडियो को शुरू किया गया था. किसी वाहन पर लगे इस रेडियो ने अब दरी भाषा (फ़ारसी से मिलती-जुलती भाषा) में भी कार्यक्रम प्रसारित करने शुरू कर दिए हैं.
कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक़ आईएस अंग्रेज़ी, उज़्बेक, उर्दू और नूरेस्तानी भाषाओं में भी कार्यक्रम शुरू करने की सोच रहा है.

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पुख़्ता शक हैं कि ये रेडियो प्रसारण अफ़ग़ानिस्तान से हो रहा है जहां ब्रॉडकास्ट मार्केट पहले से ही काफ़ी उलझी हुई है. वैसे भी इस इस्लामी संगठन की कार्रवाइयां अफ़ग़ानिस्तान में सुर्खियां बनती रहती हैं.
जिस मुल्क में साज़िशों की बातें ख़ूब होती हैं, वहां आईएस के लगातार प्रसारण से कई लोग ख़ौफ़ज़दा है और परेशान भी.
समाचार एजेंसी एआईपी ने एक अफ़ग़ान मीडिया कार्यकर्ता के हवाले से कहा है, "यह प्रसारण आधुनिक तकनीक के मौजूद होने के बावजूद जारी है. इससे शक पैदा होते हैं कि आईएस के समर्थक सरकार में भी मौजूद हैं."

ये टिप्पणी पूर्वी प्रांत के कई राजनीतिक नेताओं, जैसे सांसद ज़ाहेर क़ादिर के आरोपों को बल देती है जिनके मुताबिक सरकार में बैठे कुछ वरिष्ठ लोगों की इस्लामिक स्टेट के साथ मिलीभगत है.
एक निजी अफ़ग़ान चैनल तोलो टीवी पर 28 जनवरी को पूर्वी प्रांत के एक निवासी ने रेडियो को बंद न करने पर सवाल उठाए थे.

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पूर्व अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करज़ई और उनके सहयोगियों की ओर से अफ़ग़ान युद्ध में 'अमरीकियों की धोखेबाज़ी' के आरोप और स्थानीय जनता की हक़ीक़त ने देश के माहौल को बिगाड़ दिया है.
एक पूर्व अधिकारी के शब्दों से भी साज़िश वाले आरोपों को और बल मिलता है. उन्होंने कहा था, ''मैं अमरीकी सैन्य नेतृत्व से अफ़ग़ानिस्तान में आईएस क्यों और कैसे के सवाल पूछना चाहता हूँ.''

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करज़ई के पूर्व प्रवक्ता अजमल फ़ैज़ी ने अल जज़ीरा को 26 जनवरी को लिखे एक आर्टिकल में कहा था, "कैसे अमरीका की 'पैनी आंख' के बावजूद एक बाहरी संगठन इस्लामिक स्टेट अफ़ग़ानिस्तान में पनपा? इसके चरमपंथी कौन हैं और उन्हें कहां से और कैसे समर्थन मिलता है?"
रेडियो की शोहरत उसके असर से कहीं बड़ी लगती है. अफ़ग़ानिस्तान के बीहड़ इलाक़ों में एफ़एम रेडियो का असर सीमित ही है. एक एफ़एम सिग्नल वातावरण की वजह से साफ़ और होता है, लेकिन वह एएम सिग्नल की तरह दूर तक नहीं जा सकता.
स्टेशन को मॉनिटर करने पर पता जलता है कि इसका प्रसारण ख़राब है और अक्सर सिग्नल टूटते रहते हैं और यह नंगरहाल प्रांत के सीमावर्ती कुछ ज़िलों में ही सुना जा सकता है.
लगता है कि रेडियो एक वाहन के पीछे से चलाया जाता है ताकि वह लगातार अपनी जगह बदल सके. ऐसा शायद हवाई हमलों से बचने के लिए किया जाता है लेकिन ट्रांसमिशन के मोबाइल होने से ऐसा संदेश जाता है कि यह रेडियो ज़्यादा बड़ा इलाक़ा कवर करता है.

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इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान में 200 से ऊपर रेडियो स्टेशन हैं जो देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रसारित होते हैं.
इस भीड़भाड़ वाले मीडिया बाज़ार में दर्जनों टीवी चैनल भी शामिल हैं, जिनमें से ज़्यादातर स्थानीय स्तर पर प्रसारित होते हैं. ढेरों प्रसारकों की मौजूदगी में आईएस के रेडियो की मौजूदगी की कोई ख़ास अपील नहीं लगती है.
अफ़ग़ान मीडिया पर नज़र रखने वाले एक संगठन नाई के प्रमुख को यक़ीन है कि यह रेडियो बेअसर है लेकिन वो चेतावनी देते हैं कि "इसके प्रसारण के बारे में बने माहौल ने अफ़ग़ानिस्तान में आईएस समर्थकों का हौसला बढ़ा दिया है." इसी वजह से नाई ने 28 जनवरी को अपने एक बयान में इसके ख़िलाफ़ तुरंत कार्रवाई की मांग की थी.

अमरीकी हवाई हमलों, अफ़ग़ान सैन्य बलों और तालिबान ताक़तों के हमलों के बावजूद इस्लामिक स्टेट ने जिस तरह से अपना रेडियो चलाने और कार्यक्रमों को बढ़ाने का काम किया है उससे पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में लोगों का हौसला को घटा है.
यह संगठन एक साल पहले ही पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में उभरा था और इसने कुछ ही महीनों में तालिबान को नंगरहाल प्रांत के उसके कई ज़िलों से उखाड़ फेंका.
हालांकि उसकी रफ़्तार को हवाई हमलों से धक्का लगा है. दर्जनों आईएस लड़ाके और उनके सीनियर कमांडर पिछले कुछ महीनों में इन हमलों में मारे गए हैं.
मगर इन धक्कों के बावजूद यह संगठन पूर्व में अपने पैर जमाए रखने में कामयाब रहा है और उसने हाल ही में दूसरे प्रांतों जैसे कोनार, नूरेस्तान और पक्तिया में घुसने की अपनी कोशिशों को दोगुना कर दिया है.
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