भारत-पाकिस्तान रिश्ते में अफ़ग़ान पेंच

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- Author, रहीमुल्लाह यूसुफ़ज़ई
- पदनाम, पेशावर से वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भारत और अफ़ग़ानिस्तान के साथ तमाम मुद्दों पर रुकी हुई बातचीत आगे बढ़ाने के लिए 'हार्ट ऑफ़ एशिया' सम्मेलन के रूप में पाकिस्तान को एक बहुत ही अच्छा मंच मिला.
पर इसे काबुल और नई दिल्ली के साथ अविश्वास दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर और लगातार काम करना होगा.

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अफ़ग़ान तालिबान और अफ़ग़ान सरकार के बीच सत्ता की साझेदारी को लेकर होने वाली बैठक पाकिस्तान कितने अच्छे तरीक़े से शुरू करवा पाएगा, इस पर बहुत कुछ निर्भर है.
दोनों पक्षों के बीच पिछली बार बातचीत इसी साल 7 जुलाई को पाकिस्तान के हिल स्टेशन मरी में हुई थी. पर तालिबान के सबसे बड़े नेता मुल्ला मोहम्मद उमर की अप्रैल 2013 में हुई मौत की देर से मिली ख़बर की वजह से यह बातचीत पहले दौर के बाद ही टूट गई.

तालिबान ने इस ख़बर को जानबूझ कर छिपाए रखा क्योंकि इसके बाद ही इस चरमपंथी संगठन में उत्तराधिकार की लड़ाई का शुरू होना लाज़िमी था. यह डर सही साबित हुआ.
इसके तुरंत बाद तालिबान के दो धड़ों के बीच लड़ाई शुरू हो गई. ये लोग अफ़ग़ानिस्तान के ज़ाबुल और हेरात प्रांत में लड़ने लगे. लंबे समय तक मुल्ला उमर के ठीक नीचे काम करने वाले मुल्ला अख़्तर मोहम्मद मंसूर तालिबान के मुख्य धड़े के प्रमुख बने जबकि मुल्ला मोहम्मद रसूल विरोधी गुट के प्रमुख हैं.

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तालिबान के टूटने और अफ़ग़ान सरकार के अंदरूनी मतभेदों के उजागर होने से तालिबान और सरकार के बीच होने वाली बातचीत में अड़चने आ रही हैं.
अफ़ग़ान सरकार के गुप्तचर सेवा के प्रमुख जनरल रहमतुल्ला नबील ने इस्तीफ़ा दे दिया. पांच साल पहले तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशालय का प्रमुख नियुक्त किया था.
वे पाकिस्तान से दोस्ती करने, उस पर भरोसा करने और तालिबान के साथ शांति वार्ता में प्रमुख भूमिका निभाने के लिए कहने की राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की नीतियों के ख़िलाफ़ थे.
नबील के पद से हटने के बाद राष्ट्रपति को यह मौक़ा मिलेगा कि वे अपने पसंद के आदमी को इस पद पर नियुक्त कर सकें और वह शांति बहाली के उनके नज़रिए को ठीक से लागू कर सके.

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लेकिन कई अफ़ग़ान यह मानते हैं कि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए तालिबान का इस्तेमाल कर रहा है. इसलिए पाकिस्तान के साथ रिश्ते और तालिबान के साथ बातचीत के मुद्दों पर विवाद उभरते रहेंगे.
इस्लामाबाद और काबुल के बीच विवाद का एक दूसरा सबब अफ़ग़ानिस्तान में भारत की भूमिका है.
अफ़ग़ानिस्तान में भारत के बढ़ते प्रभाव से पाकिस्तान चिंतित है. उसे ऐसा लगता है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान की सरज़मीन का इस्तेमाल बलोच अलगाववादियों और तालिबान चरमपंथियों की मदद करने में करता है ताकि वह पाकिस्तान को अस्थिर कर सके.

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प्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान ने लड़ाई से बर्बाद हुए अफ़ग़ानिस्तान में विकास और पुननिर्माण के भारत के काम का विरोध नहीं किया है.
पर यह अफ़ग़ानिस्तान और भारत के बीच हुए रक्षा समझौते से सशंकित ज़रूर है.
जहां तक भारत की बात है, वह एक बार फिर तालिबान शासन वाला अफ़ग़ानिस्तान नहीं चाहता, जहां उसके ख़िलाफ़ लड़ने वालों के शिविर चलते हों.
आठ और नो दिसंबर को इस्लामाबाद में हुए 'हार्ट ऑफ़ एशिया' सम्मेलन के दौरान भारत और अफ़ग़ानिस्तान ने मिल कर पाकिस्तान पर दबाव बनाया कि वह दोनों देशों के बीच होने वाले व्यापार पर लगी रोक हटा ले. अशरफ़ ग़नी और सुषमा स्वराज ने ज़ोर दिया कि इससे क्षेत्रीय सहयोग बढ़ेगा.

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स्वराज ने कहा कि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले ट्रकों को सीधे अट्टारी सीमा पार कर भारतीय शहरों तक जाने दे. अभी यह होता है कि अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले ट्रक वाघा जाते हैं, वहां रुक कर माल उतारते हैं, भारतीय माल लादते हैं और वहीं से अफ़ग़ानिस्तान लौट जाते हैं.
पाकिस्तान ने अब तक यह मांग नहीं मानी है. वह इसे भारत-पाकिस्तान रिश्तों को बेहतर बनाने से जोड़ रहा है. दोनों देशों के बीच अनिश्चित और कई बार ग़ैर-दोस्ताना रिश्तों को देखते हुए नहीं लगता है कि निकट भविष्य में ऐसा होने जा रहा है.
फ़िलहाल तो अफ़ग़ानिस्तान के परिप्रेक्ष्य में भी भारत-पाकिस्तान सहयोग सच से परे लग रहा है.
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