पाकिस्तान में 'मदरसों' को बंद करने की मांग

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- Author, ब्रजेश उपाध्याय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन
अमरीकी कांग्रेस की एक अहम समिति ने पाकिस्तानी सरकार से उन मदरसों को बंद करने की मांग की है, जो चरमपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं.
समिति ने पाकिस्तान को लेकर अमरीकी नीति में बदलाव का सुझाव भी दिया है.
कांग्रेस की प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष एड रॉयस ने कहा कि खाड़ी देशों से आए पैसे से चल रहे पाकिस्तान के देवबंदी मदरसे नफ़रत का ऐसा पैग़ाम फैला रहे हैं, जिससे वहां आने वालों का चरमपंथ की तरफ़ रुझान बढ़ता है.
उनका कहना था, "इसमें कोई हैरत वाली बात नहीं है कि सैन बर्नारडिनो की हमलावरों में से एक, ताशफ़ीन मलिक, ऐसे ही पाकिस्तानी मदरसे में पढ़ीं जहां एक ख़ास तरह की कट्टरपंथी बातें सिखाई जाती हैं."
एड रॉयस ने यह बयान कांग्रेस में अमरीका और पाकिस्तान के रिश्तों पर हुई एक ख़ास बहस के दौरान दिया है.

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बयान ऐसे वक़्त पर आया है, जब पाकिस्तान पेशावर के स्कूली बच्चों पर हुए चरमपंथी हमले की बरसी मना रहा है और अमरीका के कई हलकों में चरमपंथ के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी फ़ौज की कारर्वाई की तारीफ़ भी हुई है.
वहीं दूसरी, तरफ़ पाकिस्तान का एक सैन्य प्रतिनिधिमंडल अमरीकी सेना के अधिकारियों के साथ बातचीत के लिए वॉशिंगटन पहुंचा हुआ है.
एड रॉयस का कहना था कि वो पाकिस्तान के साथ एक मज़बूत साझेदारी के हक़ में हैं लेकिन अमरीकी नीति में बड़े बदलाव की ज़रूरत है.
उनका कहना था कि नई नीति के तहत एक बात यह हो सकती है कि जो पाकिस्तानी अधिकारी चरमपंथी गुटों के साथ संपर्क रखते हैं, उन पर वित्तीय प्रतिबंध लगें और उनके कहीं आने-जाने पर रोक लगे.

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उनका कहना था, "इससे ये संदेश जाएगा कि पाकिस्तान और अमरीका सही मायने में तब तक सामरिक साझेदार नहीं बन सकते, जब तक पाकिस्तानी सुरक्षाबल सभी आतंकवादी गुटों से अपना संपर्क नहीं ख़त्म करते."
समिति के सभी सदस्यों ने पाकिस्तान की नीतियों की ख़ासी आलोचना की और कहा कि उन्हें हक्कानी नेटवर्क और लश्कर-ए-तैयबा समेत सभी चरमपंथी गुटों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी होगी.
कई सदस्यों ने पाकिस्तान के बढ़ते परमाणु हथियारों पर भी गहरी चिंता जताई और इन हथियारों के ग़लत हाथों, ख़ासतौर से अल क़ायदा और दूससे चरमपंथी गुटों तक पहुंचने की आशंका जताई.
अमरीकी विदेश मंत्रालय की तरफ़ से पाकिस्तान को लड़ाकू एफ़-16 विमान बेचे जाने की नीति की भी आलोचना की गई.
कुछ सदस्यों का कहना था कि पाकिस्तानी सेना इनका इस्तेमाल चरमपंथ के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि भारत के ख़िलाफ़ और बलूचिस्तान में अपने ही लोगों को निशाना बनाने के लिए कर रही है.

समिति के सदस्यों के सवालों का जवाब देते हुए पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान पर अमरीका के ख़ास दूत रिचर्ड ऑलसन का कहना था कि पाकिस्तान और अमरीका के बीच कई मामलों पर मतभेद हैं, लेकिन अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उसके साथ रिश्ते बनाए रखना अहम है.
ऑलसन का कहना था कि पिछले डेढ़ साल में पाकिस्तान की नीति में कई बदलाव आए हैं और चरमपंथ की वजह से उनके 2,000 सैनिकों और हज़ारों नागरिकों की जान गई है.
उनका कहना था, "उन्होंने लश्कर-ए-तैयबा पर प्रतिबंध लगाया है लेकिन अभी और करने की ज़रूरत है."
ऑलसन हाल तक पाकिस्तान में अमरीका के राजदूत थे और उन्होंने अपना अफ़गानिस्तान-पाकिस्तान पर अमरीका के ख़ास दूत के तौर पर अपना नया ओहदा हाल ही में संभाला है.
उनका कहना था कि क्षेत्र में शांति बनाने के लिए और ख़ासतौर से अफ़गानिस्तान के साथ रिश्ते बेहतर करने में पाकिस्तान एक सकारात्मक भूमिका निभा रहा है.
पाकिस्तान के बढ़ते परमाणु हथियारों पर उन्होंने भी चिंता जताई.

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उनका कहना था, "हमें डर है कि इन हथियारों की वजह से दक्षिण-पश्चिम एशिया में एक पारंपरिक युद्ध परमाणु यु्द्ध में बदल सकता है और इस मामले पर हम उच्च स्तर पर बात कर रहे हैं."
उनका यह भी कहना था कि अमरीका ने भारत के साथ जिस तरह का परमाणु समझौता किया, वैसा समझौता पाकिस्तान के साथ होने की कोई संभावना नहीं है.
पाकिस्तान को हथियार और अन्य आर्थिक मदद देने के लिए प्रशासन और कांग्रेस की मंज़ूरी लेनी होती है और इस तरह की बहसें प्रशासन पर ख़ासा दबाव डालती हैं.
लेकिन विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि फ़िलहाल उनकी पाकिस्तान नीति में किसी बड़े बदलाव के आसार नहीं है.
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