ऐसे पंचायतीराज में आधा पाकिस्तान क्या करे?

पंचायत चुनाव के दौरान महिलाएं, पाकिस्तान

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    • Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए

पाकिस्तान में पिछले साल से चार सूबों में पंचायती चुनाव का जो सिलसिला शुरू हुआ वो शनिवार को मुकम्मल हो गया.

हालांकि पाकिस्तानी संविधान के अनुसार संसद और सूबाई एसेम्बलियों के चुनाव के साथ-साथ लोकतंत्र के तीसरे पायदान यानी पंचायती हुकूमतों के वक्त पर लाजमी चुनाव की बात भी ज़ोर देकर कही गई है, लेकिन आजतक किसी राजनीतिक सरकार ने पंचायती चुनाव नहीं करवाए थे.

अगर करवाए भी तो अयूब खान, ज़िया-उल-हक़ और परवेज़ मुशर्रफ की फ़ौजी सरकारों ने.

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने सीधी-सीधी चेतावनी दी कि अगर सूबाई सरकारों ने स्थानीय निकाय चुनाव नहीं करवाए तो उन्हें कठघरे में बुलवाकर निपटा जाएगा.

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मरता क्या न करता. सबसे पहले बलूचिस्तान ने पंचायती चुनाव करवाए फिर ख़ैबर-पख़्तुनख़्वा प्रांत ने और फिर उसके बाद पंजाब और सिंध में ये चुनाव बहुत ज्यादा मुक्की-लात और खून खराबे के बगैर मुकम्मल हुए.

जहां ये आम जनता के लिए ख़ुशी की बात है कि निचले पायदान तक इख्तेयारात पहुंचेंगे और स्थानीय मसले स्थानीय लोग ही निपटाएंगे, वहीं वोटरों की आधी संख्या यानी महिलाएं कुछ ज्यादा खुश नहीं क्योंकि राजनीतिक गुटों ने उन्हें आटे में नमक के बराबर टिकट दिए.

मसलन पंजाब में स्थानीय पंचायतों के सीटों के एक लाख से ज्यादा उम्मीदवारों में से महिलाएं ज्यादा से ज्यादा 1500 थीं. बाकी तीन सूबों में भी यही हालात रहें.

परवेज़ मुशर्रफ ने जो पंचायती निज़ाम दिया था उसमें इख्तेयार भी ज्यादा था और पैसा भी.

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महिलाओं के लिए हर लोकल कौंसिल, नगरनिगम और म्युसिंपल कॉरपोरेशन में 33 फ़ीसदी सीटें रखी गई थीं जिन्हें सीधे वोट से चुना जाता था.

मगर मुशर्रफ़ के जाते ही पंचायती क़ानून बनाने का इख्तेयार भी केंद्र से सूबे के पास चला गया.

पंजाब ने महिलाओं का कोटा घटाकर 20 फ़ीसदी कर दिया और सिवाय ख़ैबर पख़्तुनख़्वा बाकी तीन सूबों में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए रिजर्व सीटों पर सीधे चुनाव खत्म कर दिया गया.

अब जीतने वाले मर्द मुस्लिम कौंसिलर महिलाओं और पांच फ़ीसदी अल्पसंख्यक नुमाइंदों को अपनी पसंद से चुनेंगे.

परवेज़ मुशर्रफ

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पंजाब में लोकल इलेक्शन के आख़िरी चरण में 31 हज़ार सीटों पर सिर्फ 90 महिला उम्मीदवार और लगभग 50 गैर-मुस्लिम उम्मीदवार ही चुनाव लड़ पाए.

और इनमें से बहुत कम जीत पाए. यही हाल सिंध में भी रहा. हालांकि वहां हिंदुओं की संख्या सबसे ज्यादा है.

अब अगर पार्लियामेंट और राज्य एसेंबली के बाद पंचायती स्तर पर भी महिलाएं और अल्पसंख्यक पाकिस्तानी नहीं जीत सकते और उन्हें जीतने वालों की मर्जी से ही मेंबर बनना है तो ऐसे पंचायती राज में आधा पाकिस्तान क्या करे जो महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर मुस्तमिल है?

तो क्या भारत में भी पंचायती निज़ाम ऐसे ही काम करता है. कोई सज्जन गाइड कर दे तो बहुत मेहरबानी होगी.

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