'अपने दोस्तों, मुंडी और हड्डियों का ख़्याल रखना'

इमेज स्रोत, anish facebook
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए
प्यारे अनीश अहलूवालिया, उम्मीद है कि जयपुर पुलिस के हाथों लगने वाली कुटास के बाद तुम्हारे और तुम्हारे दोस्त आर्टिस्ट चिंतन उपाध्याय के होश ठिकाने आ गए होंगे.
देखो भाई दस बारह साल ब्रिटेन में रहने, बीबीसी की नौकरी करने और फिर दुनिया भर में आवारागर्दी से तुम जैसे हल्कों की आदत फट से बिगड़ जाती है.
अरे भईया ये यूरोप नहीं जहां कुछ भी कह लो, सुन लो, बना लो बिगाड़ लो तो लोगबाग और सरकार में से कोई नहीं पूछेगा.
ये अपना इंडिया और पाकिस्तान है. यहां लोगबाग अपना मुंह नहीं फेरते, सामने वाले की सुने बग़ैर मुंह तोड़ कर रख देते हैं.
आइंदा तुम या सिद्धार्थ करावल जैसा कभी भी कोई मूर्तिकार गलियों-सड़कों पर मारी-मारी फिरने वाली लावारिस गायों और दूसरे पशुओं की तकलीफ़ को धातु, प्लास्टिक या पत्थर की मूरत में ढालने की कोशिश मत करना.
और ऐसी कोई हरकत कर भी लो तो शहर के बीचोंबीच उसकी नुमाइश से ख़ुद को रोके रखना.

इमेज स्रोत, Siddhartha Kararwal facebook
तुम्हारा ख़्याल है? ऐसी चित्रकारियों और फ़नकारियों से लोगबाग शर्मिंदा होकर अपने गिरेबान में मुंह डाल लेंगे और पशु-पक्षियों की हालत सुधारने निकल पड़ेंगे?
यार हमारे यहां सगे बेटे सगी माँ को घर से निकाल देते हैं, ओल्ड होम में छोड़ देते हैं या अलग कुटिया में फेंककर कुछ ख़र्चा-पानी हाथ पर रखके समझते हैं कि जन्मजली का हक़ अदा हो गया.
और जब मर जाए तो याद करके दुनिया दिखावे के लिए टेसुएं भी बहा लेते हैं.
हम जैसे मिडल क्लास वाले बस बाग़बान जैसी फि़िमें देखकर पांच मिनट के लिए शक्ल ही बिसूर सकते हैं. लेकिन कोई तुम जैसा हम जैसों को शर्म दिलाने की कोशिश करेगा तो साले की मुंडिया उतारकर हाथ पर ना धर देंगे क्या?
हमें बता रहा है कि हमें क्या करना है?

इमेज स्रोत, KUMAR HARSH
और तुम चले हो जागरूकता पैदा करने कि गौमाता और दूसरे जीवों को गलियों-सड़कों पर बेसहारा ना छोड़ो, कचरा ना खाने दो, प्लास्टिक बैग खाने से उनका दम घूंट जाता है वग़ैरह-वग़ैरह.
कुछ बातें करने की नहीं बस देखने की होती है. अब वो ज़माना नहीं रहा, होश में आ जाओ.
शुक्र करो तुम्हें और चिंतन को जयपुर की मेहरबान पुलिस ने थोड़ी सी धक्कमपेल करके लॉकअप में बंद कर दिया और मज़लूम गाय का मुजस्समा भी हटा दिया कि लोगबाग शर्मिंदगी छिपाने के लिए ग़ुस्से में ना आ जाएं.
वर्ना तो कलबुर्गी, अख़लाक़ अहमद, ढाका का ब्लॉगर अजीत राय और मुल्तान में मानव अधिकारों का वकील राशिद रहमान बनते और ज़मीन पर तड़पते देर थोड़े ही लगती है.
अनीश, आज के माहौल में ख़ुद को ज़िंदा रखना और सांस लेना ही बहुत बड़ा संघर्ष है और तुम चले हो दूसरों को शर्म दिलाने.

इमेज स्रोत, Surendra Jain Paras
यार, तुमसे ज़्यादा तो हमने यहां पाकिस्तान में सीख लिया. जब भी बाहर निकलता हूं सारा दर्द, सारा लिबरलिज़्म घर पर छोड़ कर निकलता हूं.
लोगों की सिर्फ़ सुनता हूं और फिर अक्षरों में ऐसे पेंट करने की कोशिश करता हूं कि बात हो भी जाए और गिरेबान भी ना फटे.
वैसे अगर तुम कराची में होते तो इतना भाषण देने की मुझे ज़रूरत ना होती ख़ुद ही सीख लेते.
अब अपने दोस्तों, मुंडी और हड्डियों का ख़्याल रखना. एकदम पहले जैसा मस्त, हां?
तुम जैसे पागलों का दोस्त वुसअत.
(पाकिस्तान से वुसअतुल्लाह ख़ान का ब्लॉग. ये लेखक के निजी विचार हैं)
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> आप यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












