'पहिया उल्टा चले ना चले, जूता ज़रूर चलता है'

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- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
भारत में अल्पसंख्यकों, लेखकों, पाकिस्तानी कलाकारों और यात्रियों को लेकर तरह-तरह की छिटपुट घटनाएं सामने आने के बाद से ट्विटर और फ़ेसबुक पर 'मैं एक इंडियन हूं और पाकिस्तान से नफ़रत नहीं करता' या 'मैं एक पाकिस्तानी हूं और भारत से नफ़रत नहीं करता' की कैंपन भी चल रही है.
ये भी कहा जा रहा है कि भारत में भले संविधान सेकुलर हो और पाकिस्तान में इस्लामी, मगर गिरेबान दोनों का फटा पड़ा है.
जिसमें झांकने से पता चलता है कि जात-पात और भेदभाव दोनों को एक ही तरह से निगले जा रहा है.
अगर भारत में दलित और मुसलमान टारगेट हैं तो पाकिस्तान में ईसाई, हिंदू और अहमदिया मुसलमान.
भारत में अगर बीफ़ का मुद्दा बवाल बनाया जा रहा है तो पाकिस्तान में इसका जवाब तौहीन-ए-मज़हब के क़ानून का शिकंजा है.

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भारत में अगर अलग बात करने वाले हिंदू लेखकों को जान के लाले पड़े हैं तो पाकिस्तान में बहुत से ब्लॉगर और जावेद अहमद गमदी जैसे खुली सोच वाले विद्वानों को जान से जाने का ख़तरा है.
पर अच्छी बात यह है कि प्रतिरोध भी देखने में आ रहा है.
अगर भारत में अख़लाक़ अहमद, कलबुर्गी और हरियाणा के दलित बच्चों के क़त्ल पर डिबेट आगे बढ़ रही है तो पाकिस्तान में सलमान तासीर के हत्यारे मुमताज़ क़ादरी की सज़ा-ए-मौत की सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत किया जा रहा है.
लाहौर और पेशावर की नगरपालिकाओं और कुछ सरकारी संस्थाओं की तरफ़ से सिविल सोसायटी के दबाव में पहली बार ऐसे विज्ञापन वापस लिए गए हैं जिनमें सफ़ाईकर्मियों की नौकरी के लिए ग़ैर-मुस्लिमों से दरख़्वास्त मांगी गई थी.
अब नए विज्ञापनों के हिसाब से मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम दोनों सफ़ाईकर्मी के काम के लिए आवेदन दे सकते हैं.

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इस बार के मोहर्रम में दो चरमपंथी हमले हुए और इसमें 30 लोग मारे गए.
मगर पिछले साल तो सत्तर के लगभग लोग मारे गए थे.
इस बार मोहर्रम के दस दिनों तक देश भर में डेढ़ हज़ार मौलवियों और ज़ाकिरों को घर तक पाबंद रखा गया जिनके भाषणों से आग लग जाती है.
पहले मुंह से शोले निकालने वालों की इतनी धर-पकड़ नहीं हुआ करती थी.
लेकिन पाकिस्तानी मीडिया में यह सवाल भी उठ रहा है कि सीमा पार अच्छे दिनों का बताकर नफ़रत फैलाने वाले कल से ज़्यादा आज कैसे खुले घूम रहे हैं?
और जिन्हें उनके मुंह बंद करने चाहिए वो दूसरी तरफ़ मुंह कर के क्यों खड़े हैं?

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गुलज़ार साहब जैसी हस्ती को भी क्यों कहना पड़ गया कि उन्होंने देश में इतनी नफ़रत पहले कभी नहीं देखी.
पाकिस्तान में 30-40 साल पहले ज़िया उल हक़ ने अपने ज़माने में अपना पहिया अलग से ईजाद कर के उल्टा चलाने की कोशिश की.
इस चक्कर में हाथ ज़रूर थक गए पर चक्का नहीं चल पाया.
अब भारत में कुछ लोग हज़ारों साल पुराना पहिया छोड़कर अपना पहिया अलग से चलाना चाह रहे हैं कि हो सकता है कि इस बार बात बन जाए.
लेकिन मैं पाकिस्तानी तजुर्बे की रौशनी में गारंटी देता हूं कि पहिया उल्टा चले ना चले, जूता ज़रूर चल जाता है.
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