मरने वाले को क्या कि वो क्यों मरा?

जस्टिस मार्कंडेय काटजू
    • Author, वुसतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान

जस्टिस मार्कंडेय काटजू बनारस यूनिवर्सिटी में दिन दहाड़े यह कह सकते हैं कि मैं अगर बीफ़ खाऊं तो कौन रोकेगा मुझे.

क्योंकि जस्टिस काटजू बिसहड़ा गांव के अख़लाक़ अहमद नहीं.

शोभा डे धड़ल्ले से बोल सकती हैं कि मैंने अभी-अभी बीफ़ खाया है, आओ मुझे मार डालो क्योंकि शोभा डे अख़लाक़ अहमद की मां असग़री नहीं हैं.

लालू यादव सवाल कर सकते हैं कि बीफ़ और बाक़ी गोश्त में क्या फ़र्क़ है.

क्योंकि लालू, एहसान जाफ़री नहीं.

जैसे पाकिस्तान में किसी को भी मारने के लिए मस्जिद के लाउडस्पीकर पर एलान कर के भीड़ इकट्ठी हो सकती है कि फ़लाने ने क़ुरान का अपमान किया.

उसी तरह भारत में भी किसी भी मंदिर से एलान-ए-जंग हो सकता है कि फ़लाने मोहम्मद सलीम ने गाय के बछड़े की खाल कचरे में फेंकी है या फ़लाने फ़र्नांडीस ने फ़लाने जीवनराम की लड़की छेड़ दी.

दिमाग़ी ग़ुलामी

इमेज स्रोत, Hindustan Times

जैसे पाकिस्तान में किसी हिंदू को भारतीय जासूस या किसी ईसाई को अंग्रेज़ की औलाद कहना सब एक हल्का-फुल्का मज़ाक़ समझते हैं.

उसी तरह भारत में किसी मुसलमान को पाकिस्तानी या देशद्रोही कहना या अहमदाबाद के मोहल्ला बटावा को पुलिस रिकॉर्ड में बंटा हुआ पाकिस्तान और थाणा ज़िले के मोहल्ले निलास पाड़ा को डाक कर्मचारी की तरफ़ से छोटा पाकिस्तान कहना और लिखना भी सबको क़बूल हैं.

जब हम दूसरे धर्म मानने वालों से सिर्फ़ इसलिए संपर्क ना रखें कि कहीं बाक़ी लोग बुरा न मान जाएं तो उसके बाद हमारा मन और दिमाग़ उन्हीं बाक़ी लोगों का ग़ुलाम बनता चला जाता है.

और हमें पता भी नहीं चलता कि हमारी आत्मा और नज़र का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में चला गया?

किस-किस घटना पर रोएं

बीफ

इमेज स्रोत, AP

मेरे दोस्त गुजरात के एक पत्रकार राजीव खन्ना बताते हैं कि एक दिन जब वो पुराने अहमदाबाद में खजूर ख़रीदने जा रहे थे तो उनके साथ चलने वाला एक अंग्रेज़ पत्रकार हैरानी से पूछने लगा, "राजीव भाई आप भी खजूर खाते हैं. मैं तो समझता था कि खजूर बस मुसलमान खाते हैं."

और किसी के कहने पर किसी की जान लेने का काम तब शुरू होता है जब किसी के मुंह पर पहला चांटा पड़े और आसपास के लोग इस व्यक्ति की हिमायत इसलिए ना करें क्योंकि उसकी नस्ल, धर्म और संस्कृति अलग है.

चूंकि इस बुनियाद पर पहली बार थप्पड़ मारने का हौसला और बढ़ जाता है, फिर यह हौसला बढ़ते-बढ़ते अगली वारदात में दो चांटों और फिर एक चाक़ू और फिर एक पिस्तौल और फिर भीड़ के हमले और फिर पूरी बस्ती फूंक देने में बदल जाता है.

हम ख़ुद को यही कहते रह जाते हैं कि इतने बड़े देश में अब किस-किस घटना पर रोएं.

संवेदनहीनता का इंजेक्शन

बीफ बैन विरोध, कश्मीर

इमेज स्रोत, AP

यही छोटी-छोटी बातें समाज की माला में पिरोती-पिराती इतना बड़ा हार बन जाती हैं जिससे पूरे समाज को फांसी दी जा सकती है.

जिसके हाथ में यह रस्सा है, अगर वो इससे हम सबको फांसी ना दे तो यह हमारी कोई अच्छाई नहीं, उसकी मेहरबानी है.

समाज बीफ़ या सूअर खाने से नहीं, वहशीपन या संवेदनहीनता के इंजेक्शन से मरता है.

ख़ुद की तसल्ली के लिए कारण कोई भी गढ़ लें. कारण की बहस अक्सर हत्यारे के काम आती है.

मरने वाले को क्या कि वो क्यों मरा?

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>