'देती होगी कहीं, बिहार में गाय वोट नहीं देती'

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- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए
कभी-कभी बेवक़्त का मज़ाक भी दुश्मनी का कारण बन जाता है, कई बार ज़्यादा पकाने से पकवान ख़राब हो जाता है.
अगर मोहन भागवत बिहार चुनाव से पहले कुछ कहने से परहेज़ करते तो इसका फ़ायदा भाजपा को ही होता.
जब आप अरहर की दाल आसमान से ज़मीन पर लाने की बजाय, सवा लाख करोड़ के विकासशील तारे तोड़कर वोटरों की झोली में डालने जाएंगे तो यही होता है.
जब आप जीत के सारे आंकड़े डेढ़ साल पहले की जीत के साए तले बनाएंगे तो यही होगा जो हो गया.

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हो सकता है बहुत सी जगहों में गाय वोट भी देती हो लेकिन बिहार में गाय दूध ही देती है. वरना पिछले 26 सालों में यहां एक-आध मुंबई, गुजरात या अयोध्या तो हुआ होता.
अमित शाह ने कहा- क्या तुम जंगल राज में वापस जाना चाहते हो? बिहारियों ने कहा- हां जाना चाहते हैं.
अमित शाह ने कहा- अगर महागठबंधन आ गया तो पिछड़े वर्गों से आरक्षण का कोटा छीन कर अल्पसंख्यकों (यानि मुसलमानों) को बांट दिया जाएगा. मतदाताओं ने कहा- भले बांट दे, तुम्हें क्या.

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मोदी ने कई रैलियों में से एक में कहा- यह चुनाव दिखा देगा कि 21वीं सदी में बिहार भारत और विश्व के नक्शे में कहां खड़ा है. बिहारियों ने बता दिया- देखो हम यहां खड़े हैं, तुम कहां खड़े हो?
वैसे आपस की बात है, जब एक पार्टी बिहार को पिछड़ेपन, गरीबी, अंधेरे, बेरोज़गारी, कच्ची सड़कों से मुक्त करना चाह रही थी....शिक्षा, अस्पताल, रौशनी गांव-गांव दान कर रही थी और इसके लिए एक भारी पैकेज का भी ऐलान हो चुका था...तो बिहारियों को कुछ तो विश्वास करना चाहिए था, आदर देना चाहिए था.
ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए था जैसा उन्होंने कर डाला.

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मगर भाजपा को दिल छोटा नहीं करना चाहिए, हमारे पाकिस्तान में भी ऐसे उदाहरण कई बिखरे पड़े हैं. चलिए दिल बहलाने के लिए एक किस्सा सुना देता हूं.
जैसे बिहार से गंगा मैया गुज़रती है वैसे ही हमारे पंजाब से सिंधु नदी गुज़रती है. इसी सिंधु नदी के किनारे मुज़फ़्फ़रगढ़ के इलाक़े में एक सुस्त पटवारी बहुत समय से जमा हुआ था.
कई अफ़सर आए मगर उसका कभी ट्रांस्फ़र न कर सके. दस साल बाद एक अफ़सर ने लालच देते हुए कहा कि हम तुम्हें पटवारी के पद से तरक़्क़ी देकर, तहसीलदार बनाकर मुज़फ़्फ़रनगर से राजनपुर ट्रांस्फ़र कर रहे हैं.

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पटवारी ने हाथ जोड़ दिए- हुज़ूर जब मैं तरक़्क़ी नहीं करना चाहता तो हर अफ़सर बार-बार मुझे तरक्की क्यों दिलवाना चाहता है?
काश यह किस्सा पहले सुना देता तो मोदी जी बिहार को तरक़्क़ी के रास्ते पर डालने की ज़िद न करते.
ग़रीब आदमी हो या ग़रीब राज्य, कभी-कभी बहुत सारे रुपये एक साथ देखकर डर भी जाता है.
इमरान ख़ान भी पाकिस्तानियों को बार-बार कह रहे हैं कि चलो मेरे साथ नए पाक़िस्तान की ओर. मगर वोटर हर बार यही कह देता है कि हम पुराने पाक़िस्तान में ही ठीक हैं.

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वैसे अब तक कराची के औरंगीटाउन में रहने वाले लाखों बिहारियों में से किसी एक ने भी पटाखा नहीं फोड़ा. आज्ञा दीजिए, मैं ज़रा जाकर कारण मालूम करता हूं.
(पाकिस्तान से वुसतुल्लाह ख़ान का ब्लॉग. ये लेखक के निजी विचार हैं)
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