मोदी को घेरने दिल्ली पर चढ़ाई करेंगे लालू?

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- Author, अरविंद मोहन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बिहार चुनावों में महागठबंधन की जीत के बाद लालू यादव की नज़रें राष्ट्रीय राजनीति में अपने लिए नए मुक़ाम पर होंगी.
लालू पहले ही कह चुके हैं कि वह भाजपा के ख़िलाफ़ प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में बड़ी रैली कर अभियान की शुरुआत करेंगे.

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महागठबंधन में राजद के बड़े पार्टनर के रूप में सामने आने पर हालाँकि ये अटकलें भी लगाई जा रही हैं, लालू क्या सरकार को नियंत्रित करेंगे?
लेकिन अभी इन अटकलों पर बात करना बहुत जल्दबाज़ी होगी, क्योंकि लालू कह चुके हैं कि सरकार नीतीश कुमार के नेतृत्व में काम करेगी और वह दिल्ली पर चढ़ाई करेंगे.

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महागठबंधन की जीत के बाद लालू और नीतीश दोनों को राष्ट्रीय राजनीति में खुला मैदान मिल गया है. लालू और नीतीश ग़ैरभाजपा राजनीति के केंद्र में आ गए हैं.
अब ये ब्लॉक में सिफारिश, वित्तीय मामलों या प्रोजेक्ट्स पर कब्जे की राजनीति में ही जमे रहे तो मात खाएंगे, लेकिन अगर बिहार से बाहर निकलकर मोदी को चुनौती देंगे तो इसमें काफी गुंजाइश है.
इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि राष्ट्रीय राजनीति में अभी पूरा मैदान खाली है. सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव इस लड़ाई से बाहर हैं, मायावती भी हाशिए पर हैं. हिंदी पट्टी में कोई दूसरी ताक़त दिखाई नहीं दे रही, कांग्रेस भी इस स्थिति में नहीं है.

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पश्चिम बंगाल, पंजाब के चुनावों में भाजपा के लिए राह आसान नहीं है. लालू और नीतीश के लंबे राजनीतिक अनुभव को देखते हुए वे राष्ट्रीय राजनीति में खाली पड़ी जगह को भरने में समर्थ हैं.
ये सही है कि लालू और नीतीश का अपना प्रभामंडल बिहार तक ही सीमित है, लेकिन ये दोनों भाजपा विरोधी सियासत की अगुवाई कर सकते हैं. अभी कांग्रेस को भी इन दोनों का सहारा है.
कांग्रेस अगर उत्तर भारत की क्षेत्रीय पार्टियों के साथ सहयोग नहीं करेगी तो उसके उबरने के मौके नहीं हैं. कांग्रेस रेस से इसलिए बाहर नहीं हुई है कि भाजपा ताक़तवर हुई है, बल्कि इसलिए भी पिछड़ी है कि जो ताक़तें मंडल के बाद उभरी हैं, वो कांग्रेस को अपना नहीं मानते.

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बिहार में महागठबंधन की जीत के बाद मायावती, मुलायम, ममता पर दबाव बनेगा कि वे भाजपा के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए साथ आएँ.
हालाँकि जितनी संभावनाएं भाजपा के लिए बिहार में थी, उतनी संभावनाएं भाजपा के लिए पंजाब या असम में नहीं हैं. उत्तर प्रदेश में अगर कोई दो ग़ैर भाजपा पार्टियाँ एक साथ आ गईं तो भाजपा की राह मुश्किल हो जाएगी.
बिहार चुनाव में भाजपा की करारी शिकस्त के बाद पार्टी अध्यक्ष की शाही कार्यशाली सवालों के घेरे में है. इस हार के बाद उन पर एनडीए पार्टनर ही नहीं बल्कि पार्टी के भीतर से भी हमले होना तय है.

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जहाँ तक हार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर असर पड़ने का सवाल है, तो ये बहुत ज़्यादा नहीं होगा. इन नतीजों के बाद वो अपनी नीतियों और कार्यशैली में कुछ बदलाव ज़रूर कर सकते हैं, लेकिन बिहार की गाज अमित शाह पर पड़ सकती है.
हालाँकि अमित शाह का कार्यकाल जनवरी में खत्म होना है, लेकिन बहुत संभव है कि उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया जाए.

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बिहार में हार के बाद एनडीए के घटक दल मोदी पर हमले बोलेंगे. शिवसेना और अकाली दल भाजपा को आँख दिखा सकते हैं. पार्टी अगर मौजूदा कार्यशैली को बदल लेती है तो पार्टी को बिहार के झटके से उबारा जा सकता है.
पार्टी ने जिस तरह शत्रुघ्न सिन्हा, आरके सिंह की नाराजगी को नज़रअंदाज़ किया, वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी को अलग-थलग किया, उस शैली का बिहार चुनाव में फर्क पड़ा.
बिहार में अमित शाह और मोदी के चेहरे को आगे रखकर लड़ने की रणनीति ग़लत थी, ये चुनाव के दौरान ही दिखने लगा था.
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