बांग्लादेश में फांसियों पर पाक मीडिया में रोष

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    • Author, अदिति माल्या
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

पाकिस्तानी अख़बारों ने मांग की है कि बांग्लादेश में विपक्ष के दो नेताओं को युद्ध अपराधों के लिए फांसी पर लटकाए जाने पर पाकिस्तानी सरकार को विरोध दर्ज कराना चाहिए.

सलाहुद्दीन क़ादिर चौधरी और अली हसन महमूद मुजाहिद को 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की आज़ादी के लिए हुए युद्ध के दौरान युद्ध अपराधों के आरोप में रविवार को फांसी दी गई.

इन दोनों नेताओं ने युद्ध के दौरान पाकिस्तान का समर्थन किया था.

बांग्लादेश की सरकार का कहना है कि युद्ध अपराधों के मुकदमे हत्यारों को क़ानून के कठघरे तक लाने के लिए बहुत ज़रूरी हैं, जबकि पाकिस्तान कहता है कि वो इन मुकदमों में हो रही फांसी की सज़ाओं पर 'बहुत व्यथित' है

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पाकिस्तानी मीडिया में भी वहां की सरकार का रुख़ दिखाई पड़ता है.

रावलपिंडी से छपने वाले रुढ़िवादी अख़बार 'नवा-ए-वक़्त' ने लिखा है, “पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने फांसियों पर विरोध जताया है, लेकिन सिर्फ इससे काम नहीं चलेगा. पाकिस्तान की सरकार को बांग्लादेश के साथ सरकारी स्तर पर कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहिए और बांग्लादेश को इस तरह के अन्यायपूर्ण क़दम उठाने से रोका जाए.”

वहीं कराची से छपने वाले अख़बार 'इस्लाम' ने लिखा, “सरकार को बांग्लादेश के सामने इस मुद्दे को उठाना चाहिए और निर्दोष लोगों को बचाने के लिए वो अपनी भूमिका अदा करे. सरकार स्थिति का तुरंत संज्ञान ले.”

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वहीं इस्लामाबाद से छपने वाले 'औसाफ़' ने लिखा, “पाकिस्तान को बांग्लादेशी राजदूत को तलब कर पाकिस्तान का समर्थन करने वाले नेताओं की फांसी पर विरोध दर्ज कराना चाहिए. इससे बांग्लादेश में मौजूद पाकिस्तान समर्थक लोगों को लगेगा कि पाकिस्तान सरकार उनके बुजुर्ग नेताओं का सम्मान करती है.”

कराची से प्रकाशित होने वाले 'उम्मत' ने लिखा, “1971 में पाकिस्तान का साथ देने वाले विपक्षी नेताओं को ग़द्दार कहना किसी मज़ाक़ से कम नहीं है क्योंकि उस वक़्त बांग्लादेश का तो कोई अस्तित्व ही नहीं था. दोनों देशों के बीच हुए समझौते के मुताबिक़ वो ऐसे नेताओं को सज़ा नहीं दे सकते हैं.”

अख़बार लिखता है, “ये गंभीर चिंता का विषय है कि पाकिस्तान और उसकी सेना हमारा साथ देने वाले लोगों की फांसियों पर मुजरिमाना ख़ामोशी अख़्तियार किए हुए हैं.”

वहीं अंग्रेज़ी अख़बार 'नेशन' ने लिखा, “बांग्लादेश में मौजूदा हालात इंसाफ़ नहीं, बल्कि अवसरवाद और बर्बरता है. जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का कहना है कि इस तरह के मुक़दमे राजनीति से प्रेरित हैं. इस पूरी क़यावद का मक़सद विरोधियों का सफ़ाया करना है.”

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