चीन में है भारत से 'ज़्यादा अंधेरा'!

दुनिया के आर्थिक नक्शे पर तेज़ी से उभरने वाले चीन का दावा है कि वहाँ हर घर बिजली से रोशन है, लेकिन मिशिगन यूनिवर्सिटी के एक शोध में कहा गया है कि वास्तव में चीन की हालत भारत से भी बदतर है.
लगभग 150 देशों में बिजली के उपयोग पर शोध करने वाले मिशिगन यूनिवर्सिटी के ब्रायन मिन इस नतीजे पर पहुँचे हैं.
मिन का मानना है कि दुनिया के विभिन्न देशों में बिजली के इस्तेमाल के आंकड़े अविश्वसनीय हैं. इसीलिए उन्होंने अपने शोध के लिए रात में सैटेलाइट के ज़रिए ली गई तस्वीरों का इस्तेमाल किया.
इन तस्वीरों के ज़रिए उन्होंने जाना कि कौन से इलाक़े रात में बिजली की रोशनी से जगमगाते हैं और कहाँ घुप अंधेरा है. शोध के नतीजे भी चौंकाने वाले रहे.

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 70 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में बिजली है, जबकि चीन दावा करता है कि उसके 100 प्रतिशत ग्रामीण इलाके बिजली से रोशन हैं.
लेकिन मिन का मानना है कि यह तुलना बेमानी है और वैसी है जैसे सेब की तुलना संतरे से करना. क्योंकि बिजली की पहुँच की सरकारों की परिभाषाएं अलग-अलग हैं.
रात को उपग्रह से क़ैद की गई तस्वीरें भी चौंका देती हैं. उपग्रह की तस्वीरों में दिखा कि चीन की लगभग एक चौथाई आबादी अंधेरे में है और भारत में भी तकरीबन ऐसे ही हालात हैं.
आईआईटी (रुड़की) में प्रोफेसर एके सराफ बताते हैं कि विद्युतिकरण मापने के लिए रात में सैटेलाइट के ज़रिए ली गई तस्वीरों का इस्तेमाल दुनियाभर में लोकप्रिय हो रहा है.
प्रोफेसर सराफ के मुताबिक, "आजकल जब भी भूकंप आते हैं तो नाइट टाइम सैटेलाइट इमेज़ेज से पता चल जाता है कि किन इलाकों में बिजली चली गई है और भूकंप का असर हुआ है."
ख़ास तौर पर जब जब रात में आसमान साफ़ हो तो तस्वीर भी बहुत साफ़ मिल जाती है.
हालांकि भारत और चीन की जनसंख्या के घनत्व में अंतर होने की वजह से तुलना पर असर पड़ सकता है पर मिन के शोध का एक दशक में फैले होने की वजह से ये मसला भी हल हो जाता है.
मिन अपने शोध में ये भी कहते हैं कि बिजली के करंट का देश के लोकतंत्र या तानाशाही होने से संबंध है.

उनका मानना है कि चुनावों की प्रतिस्पर्धा उस देश के लोगों को बिजली मुहैया कराने में मदद करती है, ख़ासकर उन क्षेत्रों में जहाँ ग़रीबी काफी अधिक है.
उदाहरण के तौर पर दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला की सरकार ने एक दशक से भी कम समय में 20 लाख से अधिक घरों तक रोशनी पहुँचाई और चुनावों में इसका असर उनके मत प्रतिशत में आए उछाल में साफ तौर पर दिखा.
भारत में भी नरेंद्र मोदी अक्सर अपने चुनाव प्रचारों में बिजली सप्लाई का जिक्र करते हैं और वादा करते हैं कि हर घर को रोशन किया जाएगा.
मिन कहते हैं कि राजनेता वोट हासिल करने के लिए पावरग्रिड को कहाँ, कब और कैसे विस्तार देते हैं, यह लोगों को बहुत अधिक प्रभावित करता है.

मिन उत्तर प्रदेश में ऊर्जा मंत्री रहे नरेश अग्रवाल के चुनावी क्षेत्र हरदोई का उदाहरण देते हैं और सबूत के तौर पर उपग्रह से ली गई तस्वीरें पेश करते हैं.
उनका कहना है कि अक्तूबर 1997 में नरेश अग्रवाल ने कांग्रेस का दामन छोड़कर अपना समर्थन भाजपा सरकार बनवाने के लिए दिया.
बदले में उन्हें ऊर्जा मंत्री का कद्दावर पद मिला. इसका सीधा असर उनकी विधानसभा हरदोई पर दिखा और 1998 के बाद से इस इलाक़े का अधिकांश हिस्सा रात में जगमगाने लगा.

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फिर अगस्त 2001 में जब नरेश अग्रवाल की मंत्रिमंडल से विदाई हुई तो हरदोई भी अंधेरे की गिरफ़्त में आने लगा और लगभग उसी स्थिति में पहुँच गया, जो नरेश अग्रवाल के ऊर्जा मंत्री बनने से पहले की थी.
तो किसको बिजली देनी है और किसको नहीं, इसे लेकर भी अमीर और विकासशील देशों के नज़रिए में कुछ फर्क है.

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मिन का मानना है कि जैसे-जैसे दुनिया अमीर हुई, बिजली का इस्तेमाल भी बढ़ता गया है. जैसे-जैसे अर्थव्यवस्थाएं पैर पसार रही हैं, ऊर्जा की प्यास भी बढ़ती जा रही है. लेकिन अब भी दुनिया की 20 फ़ीसदी आबादी बिजली से दूर है.
कहने की ज़रूरत नहीं कि ये लोग ग़रीब और विकासशील देशों में और ख़ासतौर पर ग्रामीण इलाकों में रहते हैं.
देशों की आर्थिक सेहत बिजली मुहैया कराने और इसका इस्तेमाल करने में मदद करती है, साथ ही इस बात का भी फर्क पड़ता है कि देश में सरकार कैसी है. लोकतांत्रिक विकासशील देशों में रहने वाले लोगों को तानाशाही में रहने वालों की तुलना में बिजली मिलने की संभावना अधिक है.
(लेखक ब्रायन मिन मिशिगन यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं.)
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