सीरिया: भारत-चीन, रूस के साथ या ख़िलाफ़?

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    • Author, ज़ैनुल आबिद
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

सीरिया में रूस का सैन्य दखल एशिया की दो महाशक्तियों चीन और भारत की विदेश नीति के इम्तिहान की तरह है.

भारत और चीन दोनों ही सीरिया में किसी भी सैनिक कार्रवाई का कड़ा विरोध करते रहे हैं.

दोनों ही देश अब तक सीरिया संकट पर खुलकर कुछ नहीं बोल रहे हैं.

सीरिया के वर्तमान राष्ट्रपति बशर अल- असद का भविष्य रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव की सबसे बड़ी वजह है.

भारत और चीन इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं, इस पर भी दोनों ही देश चुप हैं.

चीन की नीति

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30 सितंबर को रूस ने सीरिया पर पहला हवाई हमला किया था. ठीक एक दिन बाद चीन ने कहा कि किसी को भी सीरिया में मनमानी नहीं करनी चाहिए.

हालांकि उस वक्त तक चीन ने सीरिया के मुद्दे पर अपनी नीति स्पष्ट नहीं की. चीन ने न तो हवाई हमलों का ज़िक्र किया और न ही बशर अल – असद के भविष्य का.

लेकिन रूस की समाचार वेबसाइट 'प्रवदा' ने रूसी सेनेटर इगोर मोरोज़ोव के 25 सितंबर के बयान के हवाले से कहा, " ये साफ़ है कि चीन सीरिया में हमारे सैन्य अभियान से जुड़ चुका है. एक चीनी जहाज भूमध्य सागर में दाखिल हो चुका है और एक एयरक्राफ्ट कैरियर इसके पीछे जाएगा."

अगर इन ख़बरों पर यक़ीन करें तो यह मध्य-पूर्व पर चीन की नीति में एक बड़ा बदलाव दिखाता है. चीन मध्यपूर्व में किसी भी अंतरराष्ट्रीय सैन्य अभियान का विरोध करता रहा है.

इराक युद्द के दौरान भी चीन ने बार-बार सैनिक कार्रवाई को रोकने की कोशिश की थी. लीबिया पर सैनिक कार्रवाई पर चीन ने खेद जताया था. हालांकि इस मुद्दे पर यूएन में हुई वोटिंग में चीन ने भाग नहीं लिया था.

चीन की स्थिति

हालांकि कुछ विशेषज्ञ चीन पर यह आरोप भी लगाते हैं कि उसने बशर अल -असद के कार्यकाल में सीरिया को हथियार देने में उसने अहम भूमिका अदा की. टोक्यो की एक वेबसाइट 'डिप्लोमैट' पर अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार डेविड वोल्द्ज़्को ने लिखा है कि अमरीका के तमाम विरोधों के बाद भी चीन ने सीरिया को बड़ी संख्या में हथियार बेचे.

जानकारों की राय है कि चीन की इस नीति में बदलाव भविष्य में रूस का समर्थन पाने के लिए हुआ है. इसके पीछे अमरीका और पश्चिमी देशों के उसके सहयोगियों को नीचे दिखाने की एक कोशिश भी हो सकती है.

चीन को इसका भी डर है कि बशर अल- असद के बाद सीरिया अस्थिर होगा और यह चीन के व्यापारिक हितों पर असर डाल सकता है.

फिलहाल मध्य-पूर्व के देशों से ही चीन अपनी ज़रूरत का आधा तेल आयात करता है.

भारत की नीति

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चीन के उलट भारत सीरिया संकट और व्यापक तौर पर पूरे मध्य-पूर्व को लेकर अपनी स्थिति को स्पष्ट रूप से सामने रखता रहा है. यह पूरा क्षेत्र भारत की सुरक्षा और ऊर्ज़ा की ज़रूरतों से जुड़ा है.

इसलिए भारत बशर अल- असद के समर्थन में खड़ा है. उसका मानना है कि सीरिया में युद्ध में शामिल सभी पक्षों के बीच बातचीत से मसले का समाधान निकाला जाए.

लेकिन सीरिया पर रूस के हमलों ने भारत को संकट में डाल दिया है. भारत की नीति सीरिया में किसी भी तरह के बाहरी सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ है.

संयुक्त राष्ट्र में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के भाषण में भी इसका कोई ज़िक्र नहीं था.

सवाल है कि क्या ऐसी स्थिति में भारत अपने पुराने मित्र रूस के साथ खड़ा होगा? या फिर रूस की कार्रवाई का विरोध नहीं करके अमरीका के साथ बन रहे अपने ख़ास संबंधों को ख़तरे में डालेगा?

भारत इस मुद्दे पर खामोशी की नीति को सबसे बेहतर मान रहा है. लेकिन इससे सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता पाने की उसकी कोशिश को धक्का लग सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय मसलों पर ज़्यादा जिम्मेदार होना पड़ेगा. भले ही दुनिया नए शीतयुद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ रही हो भारत को गुटनिरपेक्ष रहने की अपनी नीति छोड़नी चाहिए.

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