सीरिया संकट में शामिल देशों की स्थिति?

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सीरिया संकट में दुनिया की महाशक्तियां भी शामिल हो गई हैं.
इनमें से कुछ राष्ट्रपति बशर अल असद का समर्थन कर रही हैं तो कुछ उनके ख़िलाफ संघर्ष छेड़ने वाले असंख्य विद्रोही गुटों के पक्ष में हैं.
इस विवाद में किस देशों की क्या स्थिति है, आइए डालते हैं एक नज़र:
रूस
रूस असद सरकार का सबसे अहम अंतरराष्ट्रीय सहयोगी है. उसके लिए सीरिया में अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार को समर्थन देना ज़रूरी है.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में राष्ट्रपति असद के ख़िलाफ़ एक प्रस्ताव को रूस ने रोक दिया था और अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं के बावजूद उसने सीरियाई सेना को हथियार देना जारी रखा हुआ है.

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काला सागर की उड़ानों के लिए मॉस्को का एकमात्र नेवी बेस सीरियाई पोर्ट टार्टस में लीज़ पर दिया गया है, जबकि असद के शिया अलावाइत गढ़ लटाकिया में उसका एक एयर बेस है.
पिछले महीने से रूस ने विद्रोहियों के ख़िलाफ़ हवाई बमबारी शुरू कर दी है. लेकिन ख़बरें हैं कि पश्चिमी देशों के समर्थित समूहों पर भी हमला हुआ है.
हालांकि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि विवाद को राजनीतिक हल के मार्फ़त ही ख़त्म किया जा सकता है.
अमरीका
सीरिया में बड़े पैमाने पर हो रही हिंसा के लिए अमरीका राष्ट्रपति असद को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है और उनसे गद्दी छोड़ने की मांग कर रहा है.
लेकिन अमरीका ने बातचीत से विवाद को ख़त्म करने और एक अंतरिम सरकार बनाए जाने की ज़रूरत पर सहमति दी है.

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अमरीका सीरिया के मुख्य विपक्षी गठबंधन ‘नेशनल कोएलिशन’ का समर्थन करता है और ‘उदार’ विद्रोहियों को सीमित संख्या में हथियार भी मुहैया कर रहा है.
सितम्बर 2014 से जिहादी समूहों के ख़िलाफ़ बने गठबंधन के हिस्से के रूप में अमरीका इस्लामिक स्टेट और अन्य जिहादी संगठनों पर हवाई बमबारी कर रहा है, लेकिन सीरिया में वह हस्तक्षेप नहीं कर रहा है.
सीरिया में 5,000 विद्रोहियों को ट्रेनिंग और हथियारबंद कर आईएस के ख़िलाफ लड़ने के लिए भेजने की योजना पहले ही विफल हो चुकी है.
सऊदी अरब
सुन्नी बहुल खाड़ी के इस देश का कहना है कि किसी भी समाधान में राष्ट्रपति असद हिस्सा नहीं ले सकते है और उन्हें तुरंत अंतरिम सरकार को सत्ता सौंप देनी चाहिए या उन्हें ज़बरदस्ती हटा दिया जाना चाहिए.
सऊदी अरब विभिन्न विद्रोही संगठनों, जिनमें इस्लामी चरमपंथी विचारधारा वाले संगठन भी शामिल हैं, को सैन्य और आर्थिक मदद देता है.

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इसने सीरिया की सरकारी फ़ौजों की बमबारी से नागरिकों को बचाने के लिए नो फ़्लाई ज़ोन लागू करने की वक़ालत की है.
साल 2013 में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का असद पर आरोप लगने के बाद भी सीरिया में हस्तक्षेप न करने के अमरीका के फैसले से सऊदी नेता नाराज़ हैं.
बाद में सऊदी अमरीका के नेतृत्व में आईएस के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान में शामिल होने पर मान गए.
तुर्की
सीरिया में विद्रोह शुरू होने के समय से ही तुर्की सरकार असद की कड़ी आलोचक रही है.
राष्ट्रपति एर्डोगन कह चुके हैं कि सीरियाई जनता के लिए एक ऐसे तानाशाह को सहन करना असंभव है जिसकी वजह से साढ़े तीन लाख लोगों की मौत हुई है.

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तुर्की सीरियाई विपक्ष के प्रमुख समर्थकों में से एक है और उसे क़रीब 20 लाख शरणार्थियों को पनाह देनी पड़ी है.
लेकिन विद्रोही लड़ाकों, हथियारों की खेप और शरणार्थियों को अपने इलाक़े में अनुमति देने से आईएस में शामिल होने वाले भी इसे ट्रांज़िट रूट की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.
बीती जुलाई में आईएस के एक हमले के बाद तुर्की ने अपने एक एयर बेस को सीरिया के ख़िलाफ़ बमबारी करने के लिए इस्तेमाल करने की इजाज़त दी है.
हालांकि वह सीरियन कुर्दिश पॉपुलर प्रोटेक्शन यूनिट (वाईपीजी) को दिए जा रहे गठबंधन देशों के समर्थन का आलोचक है.
वाईपीजी तुर्किश कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) से संबंधित है और जिसे तुर्की, ईयू और अमरीका एक चरमपंथी संगठन मानते हैं.
ईरान
माना जाता है कि क्षेत्रीय शिया ताकत ईरान राष्ट्रपति असद और इसकी अलवाइत बहुमत वाली सरकार को बनाए रखने के लिए अरबों डॉलर खर्च कर रहा है.

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ईरान सीरियाई सरकार को रियायती दरों पर हथियार, सैन्य सलाहकार, पैसा, तेल मुहैया करा रहा है.
असद अरब देशों में ईरान के सबसे क़रीबी दोस्त हैं और लेबनानी शिया इस्लामी आंदोलन, हिज़बुल्लाह तक ईरानी हथियारों को पहुंचाने के लिए सीरिया मुख्य रास्ता है.
यह भी माना जाता है कि असद समर्थित बलों की मदद के लिए सीरिया में अपने लड़ाके भेजने के हिज़बुल्ला के फैसले के पीछे भी ईरान का प्रभाव है.
ईरान और ईराक के लड़ाके भी शियाओं के पवित्र स्थल की रक्षा करने के नाम पर सीरियाई बलों का साथ दे रहे हैं.
ईरान ने सीरियाई संकट के शांतिपूर्ण हल के लिए निष्पक्ष और बहुदलीय चुनाव का प्रस्ताव दिया है लेकिन संयुक्त राष्ट्र समर्थित बहुपक्षीय शांति वार्ता में यह शामिल नहीं किया गया है.
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