'तालिबान तो जानते हैं, डर विदेशी लड़ाकों से है'

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सोमवार को तालिबान लड़ाकों ने अफ़गानिस्तान के उत्तरी शहर कुंदूज़ पर कब्ज़ा कर लिया था. उसके बाद नैटो के समर्थन वाली अफ़गान सेना और तालिबान के बीच जंग जारी है.
गुरुवार को अफ़गानिस्तान ने दावा किया कि उसने शहर पर वापस कब्ज़ा कर लिया है.
लेकिन जब हमला हुआ तो कुंदूज़ के नागरिकों ने क्या किया? कुछ हिंसा से बचकर भागे लेकिन कुछ नहीं. इनमें से कुछ लोगों के अनुभव.
'एक भी गोली चलाए बिना चले गए अधिकारी'
कुंदूज़ के उत्तर में इमाम साहिब ज़िले में रहने वाले छात्र मोहम्मद याक़ूब

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(30 सितंबर) दोपहर बाद हमारे ज़िले के सभी अधिकारी- पुलिस प्रमुख, ज़िला प्रमुख और बाकी सब तजाकिस्तान की सीमा पर बसे शेरख़ान बंदार चले गए थे.
सुरक्षा बल बिना एक भी गोली चलाए निकल गए. करीब 15 मिनट बाद तालिबान आ पहुंचे और पुलिस मुख्यालय और ज़िला प्रमुख कार्यालय पर अपने झंडे लहरा दिए.
सारी दुकानें बंद हैं, बाज़ार भी. कोई बाहर गली में निकलने की हिम्मत नहीं कर रहा. कोई भी सो नहीं सकता.
तालिबान लड़ाके ज़िले में पैदल और मोटरसाइकिलों पर चक्कर लगा रहे हैं और सब यही इंतज़ार कर रहे हैं कि आगे क्या होगा.

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स्थानीय तालिबान तो हमें जानता है लेकिन हम उनके साथ आए विदेशी लड़ाकों से डर रहे हैं.
'कई लोग निकलने की कोशिश कर रहे हैं'
शहर छोड़कर निकल चुके 37 वर्षीय व्यवसायी मोहम्मद पूया
शुरुआती हमला बहुत तेज था. तालिबान रॉकेट लॉंचर्स और एक-47 के साथ आए और अफ़गानिस्तान के सुरक्षा बल बस ढह गए. सुबह तक तालिबान सिटी सेंटर में थे.
उनके पास मेगाफ़ोन थे जिनसे वह लोगों को अपनी दुकानें खोलने और आम ज़िंदगी बिताने को कह रहे. वह वायदा कर रहे थे कि किसी को नुक़सान नहीं पहुंचाएंगे. शुरुआत में कुछ लोग यह देखने के लिए बाहर आए कि क्या हो रहा है लेकिन जल्द ही सब घर लौट गए और फिर बाहर निकलने की हिम्मत नहीं की.
घमासान लड़ाई चल रही है. दुकानें, व्यवसाय और शहर के बाज़ार बंद हैं. कुछ परिवारों में खाने की किल्लत होने लगी है.
ऐसे लोग जिनके किचन बाहर आंगन में हैं वह गोलीबारी के खतरे से खाना बनाने में डर रहे हैं. मैं खुद एक रिश्तेदार के घर शिफ़्ट हो गया हूं क्योंकि ज़्यादा परिजनों के बीच सुरक्षित महसूस हो रहा है.

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तालिबान ऐसे किसी भी आदमी के घर की तलाशी ले रहे हैं जिसके सरकार के लिए काम करने या अफ़गान सेना का सदस्य होने का शक हो. वह घर से जो ले जा सकते हैं ले जा रहे हैं और बाकी को आग लगा दे रहे हैं.
उन्होंने सारी सरकारी गाड़ियों पर कब्ज़ा कर लिया है. वह सड़कों पर जवान लड़कों को रोक रहे हैं और तलाशी ले रहे हैं, इसलिए उनके लिए ख़तरा ज़्यादा है.
कई लोग शहर छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. मैं आज सुबह (30 सितंबर) को मुख्य टैक्सी स्टैंड तक पहुंचने में कामयाब हो गया. मुझे परस्पर गोलीबारी के बीच से गलियों के बीच निकलकर आना पड़ा.
वहां बमुश्किल की कोई गाड़ी थी और जो ड्राइवर वहां थे भी वह सामान्य वक़्त के मुकाबले पड़ोस के प्रांत, तखार, जाने के लिए पांच गुना पैसा मांग रहे थे.
उनका कहना था कि वह अपनी ज़िंदगी ख़तरे में डाल रहे हैं और उन्हें यह भी चिंता थी कि तालिबान उनकी गाड़ियों को ज़ब्त कर लेगा.
'कई लोगों को गोलियां लगी हैं'
कुंदूज़ अस्पताल के 45 वर्षीय डॉक्टर

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यहां हमारे पास एक बड़ा अस्पताल है जिसमें 200 बेड हैं. लेकिन यहां इतने ज़्यादा घायल लोग आ रहे हैं कि हम मुश्किल से स्थिति संभाल पा रहे हैं. हमने मरीज़ों को गलियारे में लिटाया हुआ है क्योंकि हमारे पास बेड ख़त्म हो गए हैं.
कई लोग घावों के साथ आ रहे थे. हाल ही में हमें बम के टुकड़ों से घायल लोग भी मिले हैं- ये उसके बाद मिले हैं जब अफ़गानिस्तान सेना ने तालिबान के लक्ष्यों पर बम गिराने शुरू किए.
तालिबान किसी भी डॉक्टर को अस्पताल से जाने नहीं दे रहे हैं. उन्होंने हमें कहा है कि वह हमारी रक्षा करेंगे लेकिन हमें काम करते रहना होगा.
यहां महिला डॉक्टर भी हैं. मेरे कुछ सहयोगी पिछले 48 घंटे से अपने घर नहीं गए हैं.
'तालिबान की सीमा चौकियां'
शहर छोड़ चुके 40 वर्षीय अयूब ख़ान

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मैंने आज सुबह (30 सितंबर) शहर छोड़ा. लड़ाई चल रही थी और सड़कें बंद थी. बहुत सारे लोग शहर से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे और खानाबाद ज़िले जा रहे थेय
हमें शहर में अपने सिरों के ऊपर हैलीकॉप्टरों का शोर सुनाई दे रहा था. सबको उम्मीद थी कि सरकार पलटवार करेगी इसलिए लड़ाई के तेज होने से पहले लोग निकलने की कोशिश में थे.
हमारे बच्चे गोलियों की आवाज़ों और लड़ाई से बहुत डरे हुए हैं.
शहर के बाहरी इलाक़ों में तालिबान ने सीमा चौकियां बनाई हुई हैं. उन्होंने हमें रोका और पूछा कि हम कहां जा रहे हैं. मैंने बताया कि ख़ानाबाद तो उन्होंने जाने दिया.
उन्होंने ज़्यादा कुछ नहीं कहा. जब आपके साथ महिलाएं और बच्चे होते हैं तो वह आपको परेशान नहीं करते.
(बीबीसी संवददाता दाउद क़रीज़ादा और बीबीसी अफ़गान सेवा के सहकर्मियों द्वारा लिए गए साक्षात्कार पर आधारित. नाम बदल दिए गए हैं.)
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