भारत और सऊदी अरब के रिश्तों के पीछे क्या है?

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- Author, क़मर आग़ा
- पदनाम, रक्षा मामलों के जानकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
आम नज़रों से परे इस्लामी दुनिया के सबसे ताक़तवर देशों में से एक सऊदी अरब और भारत के रिश्ते मज़बूत होते जा रहे हैं.
चंद रोज़ पहले भारत में एक सऊदी राजनयिक पर लगे आरोपों के मामले पर शुरुआती हंगामे के बाद जिस तरह से ,सरकार ने इस मामले पर तनाव घटाने की कोशिश की, उससे अंदाज़ मिलता है कि भारत के लिए ये संबंध कितने अहम हैं.
दरअसल दोनों देशों को एक दूसरे की बेहद ज़रूरत है.
पाक-सऊदी समीकरण
पहले बात करते हैं सऊदी अरब के नज़रिए से. सऊदी अरब लंबे समय तक पाकिस्तान का सबसे बड़ा मददगार रहा है. पर हालात तेज़ी से बदल रहे हैं.

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पाकिस्तान से बिगड़ते हुए रिश्तों के कारण भी सऊदी सरकार का रूझान भारत की ओर बढ़ा है.
सऊदी शासक, ओसामा बिन लादेन की अमरीकी सैनिको द्वारा हत्या के बाद से, पाकिस्तान पर विश्वास नहीं करते.
उनका मानना है कि पाकिस्तान उन 'आतंकवादियों' को अपने देश में शरण देता है जो सऊदी अरब के विरोधी हैं और वो अपने स्वार्थपूर्ती के लिए आतंकवादी संगठनों को अफ़ग़ानिस्तान में इस्तेमाल करता है.

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पाकिस्तान को सऊदी अरब ने पिछले 35 सालों में कई अरब डॉलर की आर्थिक तथा सैन्य सहायता दी थी. समझा जाता है कि उसने परमाणु हथियार बनाने के लिए गुप्त रूप से अरबों डॉलर दिए थे.
लेकिन जब सऊदी अरब को यमन में युद्ध के लिए सैनिकों की ज़रूरत पड़ी, तब पाकिस्तान ने इंकार कर दिया.

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सऊदी अरब-पाकिस्तान रिश्तों में जो दूरी आई है वह निकट समय में ख़त्म होती नज़र नहीं आती.
अब सऊदी अरब के लिए यह संभव नहीं होगा कि वह अधिक समय तक पाकिस्तान की भारत विरोधी नीतियों को समर्थन देता रहे.

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सऊदी अरब के शासक भारत-ईरान के बढ़ते हुए संबंधों से भी काफ़ी चिंतित हैं और वे नहीं चाहते कि भारत पूरी तरह से ईरान की नीतियों का समर्थन पश्चिम और मध्य एशिया में करे.
भारत का मानना है कि सऊदी अरब, अरब और इस्लामिक जगत का एक महत्वपूर्ण देश है और उसका प्रभाव दक्षिण एशिया के सुन्नी मुसलमानों पर लगातार बढ़ रहा है.
भारत-सऊदी सैन्य सहयोग

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भारत सऊदी अरब के साथ व्यापारिक संबंधों के साथ सैन्य संबंध भी बना रहा है जो उसको आने वाले समय में बढ़ते हुए चरमपंथ को रोकने में मदद करेगा.
जब से भारत ने रक्षा क्षेत्र में उत्पादन के लिए 49 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) की अनुमति दी है, सऊदी अरब भी भारत के सुरक्षा क्षेत्र में निवेश करना चाहता है.
इसके अतिरिक्त दोनों देश सैन्य सहयोग भी बढ़ाने के इच्छुक हैं.
भारत फारस की खाड़ी शांति में चाहता है. यहां से भारत का 70 प्रतिशत से भी अधिक कच्चा तेल आयात होता है.
इस क्षेत्र में 70 लाख से भी अधिक भारतीय काम करते हैं जो हर साल 25 से 30 अरब डॉलर भारत भेजते हैं.
तेज़ी से बदलती क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भारत और सऊदी अरब के संबंधों को घनिष्ठ बनाने में मदद कर रही हैं.
इराक़ में सद्दाम हुसैन के शासन की समाप्ति के बाद सऊदी शासकों को इराक़ से आने वाले संकट से निजात भी मिल गई और वे सुन्नी मुस्लिम देशों के नेता के रूप में उभरकर सामने आए.
दूसरी ओर सऊदी अरब भारत के लिए कच्चे तेल का एक बड़ा निर्यातक बन गया.
भारत की ज़रूरत

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भारत लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल सऊदी अरब से प्राप्त करता है, जिसकी सालाना क़ीमत 28.2 अरब डॉलर है और इन दोनों देशों का व्यापार 2013-14 में 39.4 अरब डॉलर था.
इसके अतिरिक्त सऊदी अरब में लगभग 27 लाख 30 हज़ार भारतीय काम करते हैं, जिनसे देश को करोड़ों डॉलर प्राप्त होता है.
उम्मीद है कि सऊदी अरब आने वाले समय में वो भारत के ढांचागत क्षेत्र में भी अपना निवेश बढ़ाएगा.
सऊदी अरब भारत का चौथा बड़ा व्यापारिक साझेदार उस समय बना जब भारत के पश्चिमी देशों से संबंधों में सुधार हुआ और उसका आर्थिक विकास बढ़कर 6 से 8 प्रतिशत हुआ.
यह वही समय था जब अमेरिका में शेल ऑयल के निकलने से सऊदी अरब से निकलने वाले तेल पर उसकी निर्भरता समाप्त हो रही थी.

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इस कारण सऊदी अरब को नए बाज़ार की तलाश थी. जिसमें भारत एक प्रमुख भरोसेमंद देश था.
बिगड़ता रिश्ता
इसी समय बाज़ार में प्रतिबंध के कारण गृहयुद्ध के चलते इराक़ी तेल में कमी भी हो गई.
इस कारण तेल के दाम बढ़कर 150 डॉलर पहुंच गए. तेल की क़ीमत में बढ़ोतरी के कारण सऊदी अरब को अपनी अतिरिक्त पूंजी (सरप्लस मनी) भारत, चीन तथा दूसरे देशों में लगाने पर मजबूर होना पड़ा.
यहां सबको अच्छा लाभ मिलने की संभावना थी. अब तेल के दामों में कमी के कारण उन्हें वैकल्पिक साधनों की तलाश है.
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