'कश्मीर मुद्दे पर डटे रहने का यही वक़्त है'

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की रद्द हो चुकी बैठक और कश्मीर को एजेंडे में रखने पर तनातनी की पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में ख़ूब चर्चा में रही.
रोज़नामा ‘इंसाफ़’ का संपादकीय है - कश्मीर समस्या.. इस पार या उस पार.
अख़बार का कहना है कि भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की मुलाक़ात से पहले संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी दूत ने कश्मीर मुद्दे को उठाकर भारत के इरादों को नाकाम बना दिया.
अख़बार के मुताबिक़ भारत नहीं चाहता था कि संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर और पाकिस्तान में भारत की दहशतगर्दी का मुद्दा उठे.
कश्मीर मुद्दे के हल पर ज़ोर देते हुए अख़बार लिखता है कि ये भारत और पाकिस्तान के बीच का विवाद नही है, बल्कि मामला कश्मीरियों के बुनियादी हक़ का है.
बेकार की कवायद?

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‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि पाकिस्तान के लिए यही वक़्त है जब उसे कश्मीर मुद्दे पर डट जाना चाहिए.
अख़बार लिखता है कि नवाज़ शरीफ़ की सरकार तो भारत से दोस्ती और तिजारत के लिए क़दम उठाती रही है कि लेकिन भारत की बीजेपी सरकार की आक्रमक नीति ने उसे कश्मीर कॉज़ को आगे बढ़ाने और देश की संप्रभुता के तकाज़ों को पूरा करने के लिए मजबूर कर दिया है.
अख़बार लिखता है कि अगर भारत कश्मीर के मुद्दे पर अब भी बातचीत से पीछे हटता है तो दुनिया के लिए कश्मीरी जनता के रुख़ का समर्थन करना और आसान होगा.
रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ लिखता है कि कश्मीर को एक तरफ़ रख कर व्यापार वैग़रह को बढ़ाने पर बात करने से न अतीत में फ़ायदा हुआ, न अब होगा, इसलिए दोनों देश बड़े मुद्दे को हल करें.
कराची में हो अमन

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‘जंग’ ने कराची का दौरा करने वाले प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के इस बयान को अपने संपादकीय में तवज्जो दी है कि शहर में जारी ऑपरेशन किसी सूरत में नहीं रुकेगा और शहर को हर तरह के जुर्म से मुक्त करने तक जारी रहेगा.
अख़बार के मुताबिक़ नवाज़ शरीफ़ ने साफ़ किया कि ये ऑपरेशन आपराधिक तत्वों के ख़िलाफ़ है न कि किसी राजनीतिक पार्टी के ख़िलाफ़. उनका इशारा एमक्यूएम की तरफ़ था जिसके सदस्य इस ऑपरेशन के विरोध में राष्ट्रीय और प्रांतीय एसेंबली से इस्तीफ़े दे चुके हैं.
वहीं ‘एक्सप्रेस’ ने एमक्यूएम के नेता रशीद गोडेल पर हुए कातिलाना हमले का जिक्र करते हुए लिखा है कि कराची में शांति क़ायम करना सब पार्टियों की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए क्योंकि कराची में अमन होगा, तो पूरे देश में अमन होगा.
वहीं रोज़नामा ‘दुनिया’ ने अपने संपादकीय में सवाल उठाया है कि जब तेल के दामों में कमी आ रही है तो इसका फ़ायदा पाकिस्तानी जनता को क्यों नहीं मिल रहा है?
‘संजीव भट्ट को सलाम’

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रुख़ भारत का करें तो ‘जदीद ख़बर’ का संपादकीय है-संजीव भट्ट को सलाम.
अख़बार कहता है कि बर्खास्त किए गए वरिष्ठ आईपीएस संजीव भट्ट उन चंद अफ़सरों से हैं जिन्होंने 2002 के दंगों के दौरान राज्य सरकार की ज़ालिमाना और मुसलमान विरोधी सोच पर सवाल उठाया था.
भट्ट को निलंबित किए जाने पर अख़बार का कहना है कि अब वो ज़ालिम और ख़तरनाक सरकार के चंगुल से मुक्त हो गए हैं और उन ताक़तों के साथ पहले से ज़्यादा मज़बूती से मुक़ाबला करेंगे.
वहीं रोज़नामा ‘ख़बरें’ ने भारत और पाकिस्तान के संबंधों पर लिखा है जिन रिश्तों को संवारने की कोशिश की जा रही है, उन पर फिर गतिरोध के बादल छा गए हैं.
अख़बार की टिप्पणी है कि भारत और पाकिस्तान कभी दुश्मनी की दीवारों को लांघने पर ग़ौर नहीं करते हैं और लगातार एक दूसरे पर आरोपों और प्रत्यारोपों का दरवाज़ा खुला रखते हैं.
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