हमीद गुल: 'भारत, अमरीका के विरोधियों के हीरो'

- Author, शाहज़ेब जिलानी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के पूर्व प्रमुख हमीद गुल, अमरीका और भारत के विरोधी माने जाते थे और जीवन के आख़िरी दौर में विवादों में भी घिरे रहे.
उनकी 79 साल की उम्र में मृत्यु हुई.
वो 1980 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सेना के ख़िलाफ़ मुजाहिदीन के समर्थन और फिर भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथ संबंधित विवादास्पद भूमिका निभाने के लिए जाने जाते हैं.
उनकी मौत के बाद पाकिस्तानी मीडिया और सोशल मीडिया में कई आम लोग और नेता थे जिन्होंने उन्हें श्रद्धांजलि दी.
श्रद्धांजलि
प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और पूर्व क्रिकेटर और राजनेता इमरान ख़ान ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी.
सेना के क़रीब समझे जाने वाले और इस्लामी विचारधारा के नेताओं ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी है.
जमात उद दावा के प्रमुख हाफ़िज़ मोहम्मद सईद ने गुल के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है.
सईद ने ट्वीट किया, "गुल के निधन से मुझे गहरा दुख हुआ है. वह अच्छे दोस्त और सच्चे पाकिस्तानी थे. अल्लाह उनकी आत्मा को शांति दे."
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान के लिए उनकी सेवाएं हमेशा याद की जाएंगी. पाकिस्तान ने एक सच्चा और ईमानदार बुद्धिजीवी खो दिया है. वह हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे.
विवादित शख्सियत क्यों?

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हमीद गुल को सेना के क़रीबी और इस्लामी जेहादी मानसिकता के लोग, या फिर ये कहें, जो भारत और अमरीका के ख़िलाफ़ रहे हैं, वो हीरो मानते हैं.
हमीद गुल बहुत खुलकर बोलते थे और यही बात लोगों को प्रभावित करती थी.
वो 1987-89 तक सिर्फ़ दो साल के लिए पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के चीफ़ रहे और 1992 में रिटायर हो गए.
लेकिन पिछले दो दशक से ज़्यादा से वो अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर छाए रहे.

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जब भी मीडिया को पाकिस्तानी सेना के बारे में बात करनी होती, तो हमीद गुल को तरजीह दी जाती क्योंकि वो बहुत ही खुलकर बोलते थे और इससे बाहरी दुनिया हिल जाती थी.
चाहे कश्मीर का मुद्दा हो, अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा हो या भारत-अमरीका से रिश्तों की बात हो, हमीद गुल पाकिस्तान में एक ख़ास मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते थे.
80 के दशक में जब पूरी दुनिया अफ़ग़ानिस्तान को मदद कर रही थी तो वो मदद पाकिस्तान के रास्ते जा रही थी.
अमरीका और सऊदी अरब मुजाहीदीन की मदद के लिए पाकिस्तान को ही पैसे और हथियार दे रहे थे.
उस समय अफ़ग़ान मुजाहीदीन का साथ देना अच्छा समझा जाता था. ऐसे में पाकिस्तान और आईएसआई ने मुजाहीदीन की बढ़-चढ़कर मदद की.
ओसामा की कभी आलोचना नहीं की

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जब 1988-89 सोवियत यूनियन की सेना अफ़ग़ानिस्तान छोड़ कर चली गई तो अमरीका की भी रुचि अफ़ग़ानिस्तान में कम हो गई.
इस बात पर हमीद गुल जैसे पाकिस्तानी जनरलों में भी बड़ा ग़ुस्सा था. उन्हें लगता था कि अमरीका अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में दिलचस्पी नहीं ले रहा है.
ऐसे में उस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान की मदद के लिए जो डॉलर और हथियार आए हुए थे और जो मुजाहीदीन उन्होंने तैयार कर रखे थे उन्हें कश्मीर की ओर करना शुरू कर दिया गया.
ग़ौलतलब है कि 1989-90 में कश्मीर में भी चरमपंथ बढ़ गया था और हमले और हिंसा होने लगी.

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अफ़ग़ानिस्तान और कश्मीर ऐसे जुड़े हुए थे कि बीच में पाकिस्तान दोनों के हथियार-असले-लड़ाकुओं की सप्लाई लाइन संभाल रहा था और इसमें हमीद गुल की बड़ी अहम भूमिका थी.
हमीद गुल खुले तौर पर अमरीका का विरोध करते थे. लेकिन पाकिस्तान सरकार ने कभी उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की, क्योंकि पाकिस्तानी सेना का बड़ा हिस्सा ये मानता है कि अमरीका ने हमेशा पाकिस्तान का इस्तेमाल किया. पाकिस्तान का मुश्किल वक़्त में साथ नहीं दिया.
पाकिस्तान के जनरल भी ये मानते रहे हैं कि अमरीका ऊपर से कुछ कहता है और अंदर से कुछ और है. हमीद गुल इन विचारों को खुलकर जाहिर करते थे.
इसलिए ही उन्होंने हमेशा तालिबान का समर्थन किया. कभी भी ओसामा बिन लादेन की आलोचना नहीं की और सितंबर 2001 के हमलों को लेकर भी उनकी अपनी अलग राय थी.
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