क्या इंटरनेट हमारे दिमाग पर असर डालता है?

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    • Author, टॉम स्टैफ़ोर्ड
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

आधुनिक जीवनशैली की चिंताएं भी एकदम नए किस्म की हैं. जहाँ अब तक शारीरिक फ़िटनेस और वज़न पर ध्यान रखना पड़ता था, अब एक नई चिंता सामने पर चर्चा होने लगी है.

क्या इंस्टेंट मैसेजिंग, एसएमएस और व्हाट्सऐप से हमारे ब्रेन की एकाग्रता पर असर पड़ रहा है?

क्या सोशल मीडिया - फ़ेसबुक और ट्विटर के कारण हम लोगों से आमने-सामने बात करने या मानवीय रिश्ते बनाने की क्षमता खो रहे हैं.

कहा तो ये भी जा रहा है कि ईमेल दिमाग में ऐसे रसायन रिलीज़ करती है जैसे कोकीन के इस्तेमाल से रिलीज़ होते हैं.

तो क्या सुडोकू से जो दिमागी वरज़िश होती है, वही हमें एक्रग्रता खो चुके, सामाजिक रिश्ते बनाने में अक्षम व्यक्ति बनने से बचा रही है?

मैं पहले इन सभी चिंताओं का समाधान कर दूँ, फिर आपको इसके पॉज़िटिव पहलुओं के बारे में बताऊँगा.

दिमाग पर असर

सबसे अहम बात तो यह है कि हम जो भी करते हैं, उसका असर हमारे दिमाग पर होता है. हर चीज़ का. हर छोटी या बड़ी सोच का असर हमारे दिमाग पर होता है.

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दरअसल यह हमारे तंत्रिका तंत्र की कोशिकाओं की वायरिंग और री-वायरिंग जैसा होता है. आप इससे बच नहीं सकते.

यानी इंटरनेट, भी आपके दिमाग की रि-वायरिंग करता है. ऐसा टीवी देखते हुए भी होता है. एक कप चाय पीते समय भी हो सकता है और एक कप चाय के न मिलने से भी ऐसा हो सकता है.

आपके जीवन की हर बात, हर काम, आपके दिमाग पर असर डालता है.

तो फिर इंटरनेट को लेकर इतनी चिंता क्यों? समाज में किसी भी बदलाव, ख़ास तौर पर तकनीकी बदलाव को लेकर इस तरह का भय व्यक्त होता रहा है.

सुकरात की चिंता

पहली बार जब किताबें लोकप्रिय होने लगीं, तो यही डर महसूस किया जाने लगा था.

यूनान में, सुकरात ने भी लिखने के दिमाग पर असर को लेकर चिंता जताई थी. सुकरात को चिंता थी कि इससे लोगों के याद करने की क्षमता प्रभावित होगी.

फिर जब टेलीविजन और टेलीफ़ोन आए, तब भी ऐसी ही चिंता जताई जाने लगी.

इन तकनीकों ने हमारे जीवन को बदला जरूर लेकिन यह ख़तरनाक साबित नहीं हुईं.

चाहे इंटरनेट के इस्तेमाल का प्रत्यक्ष असर फ़िलहाल दिमाग पर नज़र न आए, फिर भी लोग चिंता करते हैं कि कहीं कोई बुरा असर न हो. मैं इसको लेकर ज़्यादा चिंतित नहीं हूं और इसकी कई वजहें हैं.

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हम नियमित तौर पर कुछ ना कुछ ऐसा करते ही हैं जो हमारे दिमाग पर असर डालता है- चाहे वह पढ़ना हो या फिर खेलना.

वैज्ञानिकों ने उन लोगों पर नजर रखी जो हजारों घंटे एक तरह का काम करते हैं, तो उनके दिमाग में क्या बदलाव होते हैं.

टैक्सी ड्राइवर घंटों तक गाड़ी चलाते हैं और उनके दिमाग का वो हिस्सा बड़ा होता है जो नैविगेशन तय करता है.

संगीतकारों का दिमाग के हिस्से वाद्ययंत्रों के मुताबिक ज़्यादा सक्रिय होते हैं, जैसे वायलिन बजाने वालों या फिर पियानों बनाने वालों का दिमाग.

इंटरनेट से दिमागी अभ्यास?

मतलब साफ़ है कि अभ्यास से हमारे दिमाग पर असर होता है. ऐसे में अगर हम इंटरनेट का नियमित तौर पर इस्तेमाल करते हैं, तो हम किस चीज़ का अभ्यास कर रहे होते हैं?

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किसी पक्के सबूत के अभाव में, मेरा अनुमान है कि हंटरनेट का ज़्यादातर इस्तेमाल सूचनाएं हासिल करने के लिए करते हैं या फिर संवाद के लिए करते हैं. ईमेल और सोशल मीडिया के उपयोग के लिए करते हैं.

ऐसे में इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए हमारा दिमाग इन चीज़ों में बेहतर होता है? सूचनाएं हासिल करने से चीज़ें बेहतर होती हैं.

इंटरनेट का इस्तेमाल तभी चिंता का विषय बनेगा यदि हम इसके इस्तेमाल के कारण ज़िंदगी के किसी अन्य स्किल का इस्तेमाल बंद कर देते हैं.

अगर आप फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हो और अपने दोस्तों से 'फेस टू फेस' नहीं मिल पाते हैं तो ये नुकसानदायक होगा.

हममें से ज़्यादातर लोग इंटरनेट का इस्तेमाल संवाद के तरीके के तौर पर करते हैं, विकल्प के रूप में नहीं.

कोई भी नुकसान नहीं

ऐसे में तय है कि इंटरनेट से हमें कोई ख़तरा नहीं है. टीवी और उस से पहले किताबों की तरह से ही, इंटरनेट से कुछ चीज़ों का अभ्यास होता है और इससे हमारे दिमाग पर असर होता है, किसी भी आदत की तरह.

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यह भी अहम है कि हम लोग इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं, यह हमारे साथ होने वाला कोई एकतरफ़ा हादसा नहीं है.

ये आप पर निर्भर करता है कि आप इंटरनेट पर कितना समय लगाते हैं और उस समय में क्या करते हैं- फिर यदि आप बिल्लियों की तस्वीरें ही लोड करते हैं तो ये आपकी च्वाइस है.

इससे आपके दिमाग पर कोई नुक़सान नहीं होगा, ना ही इससे दिमाग की फ़िटनेस बेहतर होगी.

अगर आप ऐसा सोचते हैं कि इंटरनेट वह अभ्यास मुहैया कराएगा जिसकी आपके दिमाग को जरूरत है तो ये मूर्खता होगी, और अगर आप इंटरनेट का फ़ायदा नहीं उठाते, तब भी.

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