'...मैंने मलबे में दबी बेटी को निकाला'

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भूकंप के दौरान अगर आपको सिर्फ एक चीज़ बचाने का मौका मिले तो आप क्या चुनेंगे?
करीब तीन महीने पहले नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप में हज़ारों लोगों की मौत हो गई. राजधानी काठमांडू और आसपास का इलाका तबाह हो गया.
उस भूकंप में बचे नौ लोगों ने उस कीमती जीवन या चीज के बारे में बताया जिसे वो भूकंप में बचाने में कामयाब रहे.
मीना

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33 साल की मीना ने भूकंप के बाद मलबे में दबी अपनी सात महीने की बेटी सुंदरी को बचाया.
जब भूकंप के झटके महसूस हुए उस वक्त मीना अपनी बेटी को एक टोकरी में सुलाकर आटा चक्की पर गई थीं.
भूकंप के झटके महसूस होते ही वो घर लौटीं लेकिन तब तक उनका मकान ढह चुका था. मलबे के बीच से आती सुंदरी की आवाज़ से जाहिर था कि वो ज़िंदा है.
वो कहतीं हैं, "मैंने अपने पति के साथ मिलकर मलबा हटाना शुरू किया. वक्त ज्यादा लगने लगा तो मैं पड़ोसियों की मदद लेने के लिए गई लेकिन वो सभी परेशान थे."
मीना के मुताबिक अपनी बेटी को निकालने के लिए उन्होंने पूरा मलबा खोद डाला. कुछ पड़ोसी भी मदद के लिए आ गए और सुदंरी को बाहर निकाल लिया गया. उसे कुछ खरोंचे आई थीं लेकिन गंभीर चोट नहीं लगी थी.
दाल्ली माया माजी

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दाल्ली की उम्र 65 साल है और वो चांदनी गांव में रहती हैं. भूकंप में इस गांव के कई लोगों की मौत हो गई. दाल्ली का घर भी मलबे में बदल गया.
इस मलबे में से उन्होंने पीतल का जग बाहर निकाला.
वो कहती हैं, "मुझे याद नहीं मैंने कितनी देर इसकी तलाश की. मैंने खेतों में घंटों काम करके पैसे बचाए और ये जग ख़रीदा था. जग पास होने का मतलब है कि घर आने वालों को मैं तुरंत पानी पिला सकती हूं."
संगाता तमांग

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संगाता भूरे और काले मनकों की माला और पीतल की छोटी घंटियों को हमेशा अपने साथ रखती हैं.
41 साल की संगाता कहती हैं, "अगर ये चीजें हमेशा के लिए खो जातीं तो मुझे बहुत बुरा लगता. ये मनके बहुत पवित्र हैं और हमारी पूजा के लिए अहम हैं."
रहार सिंह तमांग

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रहार सिंह तमांग की उम्र साठ साल है. भूकंप में उनका घर पूरी तरह टूट गया.
भूकंप के बाद उन्होंने जिस कीमती चीज को बचाया, वो है लाल पुर्जा. लाल रंग का कागज इस बात का सर्टिफिकेट है कि वो अपने घर और ज़मीन के मालिक हैं.
उन्होंने पीला कागज भी निकाला, जो बताता है कि उन्होंने टैक्स अदा किया है.
वो कहते हैं, "मैं लाल पुर्जे को काले रंग के छोटे बक्से में ताला लगाकर रखता था. भूकंप के दस दिन के बाद मैंने घर में दाखिल होने की हिम्मत की और बक्से को बाहर निकाला."
पंच माया तमांग

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हिरण की खाल से बनी ढपली 40 साल की पंच माया के लिए बेशकीमती है.
वो शादियों और धार्मिक उत्सवों में ढपली बजाती हैं. भूकंप के बाद वो इसे बचाने के लिए बेताब थीं.
पंच माया कहती हैं, "ये ढपली हमेशा मेरे साथ रहती है. ख़ास मौक़ों पर संगीत हमारे लिए ज़रूरी है. भूकंप की त्रासदी के बीच भी हमें संगीत की ज़रूरत है. इसलिए ये ढपली मेरे, परिवार और समुदाय के लिए ज़रूरी है."
कृस्मा लामा

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19 बरस की कृस्मा बालथाली गांव में रहती हैं. उन्होंने भूकंप आने के पहले अपने स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट को सुरक्षित कर लिया था.
वो कहती हैं,"मुझे सर्टिफिकेट हासिल करने पर गर्व है. मैंने इसे अल्मारी में सुरक्षित तरीक़े से बंद कर दिया था. भूकंप के बाद भी ये सुरक्षित है."
श्याम बहादुर तमांग

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70 साल के श्याम बहादुर बताते हैं कि भूकंप के बाद उनका मकान इतना असुरक्षित हो गया था कि सेना ने उसे गिरा दिया.
उन्होंने जो कीमती सामान बचाया वो है खपच्चियों से बुना हुआ सूप जिसका इस्तेमाल अनाज को साफ करने के लिए किया जाता है.
सुकू माया तमांग

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35 साल की सुकू बताती हैं कि जब भूकंप के झटके महसूस हुए तो उनका पांच साल का बेटा घर के बाहर खेल रहा था और 15 बरस की बेटी पास के खेतों में काम कर रही थी.
वो कहती हैं, "जब धरती हिली तो बेटे को संभालना मुश्किल था. वो लगातार हाथ से फिसलता जा रहा था. पता नहीं कैसे लेकिन मैं घर के अंदर गई और एक बोरा चावल लेकर बाहर आ गई. मैं बोरे और अपने बेटे को पकड़े हुए पहाड़ी से उतरी."
रामा नापाल

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भूकंप के झटके महसूस हुए तो खेतों में काम कर रही 53 साल की रामा अपने घर की तरफ दौड़ीं. उन्हें परिवार की चिंता थी.
उसके बाद उन्हें अपनी बछिया गजाली की याद आई.
रामा बताती हैं कि भूकंप में उनकी दो गाएं और पांच बकरियों की मौत हो गई. तीन दिन मलबा खोदने के बाद उन्हें गजाली मिली.
वो कहती हैं, "मलबे की खुदाई के दौरान मुझे गजाली की कोई आवाज सुनाई नहीं दी. तीसरे दिन मैंने उसकी पूंछ हिलती देखी. मैं खुशी से चिल्ला उठी. ये मेरी खास बछिया है. मैं इसे कभी नहीं बेचूंगी"
(तस्वीरें और साक्षात्कार साभार कैफोड)
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