आईएस को ऑफ़लाइन कर पाएगी यूरोपोल?

- Author, डॉमिनिक कैसियानी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इस्लामिक स्टेट (आईएस) से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंटों को ब्लॉक करने के लिए यूरोप में एक पुलिस टीम का गठन किया गया है.
इसका उद्देश्य यह है कि नए अकाउंट खुलने के दो घंटे के अंदर ही उन्हें बंद कर दिया जाए.
यूरोपोल के निदेशक, रॉब वैनराइट, ने बीबीसी को बताया कि नई टीम एक जुलाई से काम करना शुरू कर देगी, जो "इस समस्या से निबटने का एक कारगर तरीका होगी."
इंटरनेट पर मौजूदगी
स्वयंभू इस्लामिक स्टेट का प्रचार तंत्र हमेशा सक्रिय होता है, हमेशा कोई इसे शेयर कर रहा होता है, यह हमेशा ऑनलाइन होता है. इसकी संवाद रणनीति का मूल आधार इंटरनेट है.

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यह सीरिया और इराक़ के नियंत्रण वाले 'आधिकारिक' अकाउंट का इस्तेमाल करता है लेकिन इसके समर्थकों का एक बड़ा नेटवर्क भी है जो इस वर्चुअल युद्धक्षेत्र को उतना ही महत्वपूर्ण और मुश्किल मानते हैं जितना कि ज़मीनी जंग.
बहुत से समर्थक जो ज़मीनी जंग में शामिल नहीं हो पाए हैं वह 'ऑनलाइन जिहाद' में शामिल होने की बात करते हैं.
इसका अर्थ यह हुआ कि हर ट्वीट, वीडियो, उपदेश को इस कदर शेयर किया जाता है और इतना गुंजाया जाता है कि उसे ढूंढना और रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि आईएस के समर्थक कम से कम 46,000 ट्विटर अकाउंट्स का इस्तेमाल कर चुके हैं.
बचता कैसे है आईएस?

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यह पहचान बनाए रखना चाहता है- क्योंकि सोशल मीडिया में इसकी मौजूदगी इसके संदेश को फैलाने के केंद्र में है. इसके मुख्य ऑनलाइन कर्ताधर्ता उम्मीद करते हैं कि इसकी सामग्री पर निशाना साधा जाए. नया अकाउंट बनाना उनके रोज़ के काम का एक हिस्सा भर है.
कुछ समर्थक पुलिस के उन तक पहुंचने से पहले ही पुराने अकाउंटों को डिलीट करने और नए अकाउंट खोलने की तकनीक पर काम करते हैं.
किसी संदेश को कहां और कैसे प्रसारित करना है इसके लिए ख़ास अकाउंट हैं और महत्वपूर्ण यह है कि इसे कहां पोस्ट किया जाना है इसे लेकर कोई हड़बड़ाहट नहीं होती.
ट्विटर, यूट्यूब और फ़ेसबुक सबसे ज़्यादा जानी-पहचानी जगहें हैं लेकिन इसके साथ ही आईएस बड़ी संख्या में अन्य सेवाओं का भी इस्तेमाल करता है.
कितनी कामयाब हैं कोशिशें?

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ये बहुत गड्डमड्ड हैं. यूरोपोल में पहले ही एक ख़ास गुप्त डाटाबेस है जिसमें हज़ारों दस्तावेज़ों और व्यक्तियों के ब्यौरे हैं जो ऑनलाइन हिंसक अतिवाद और चरमपंथ के प्रचार से जुड़े हैं.
लंदन की मेट्रोपॉलिटन पुलिस हर हफ़्ते अतिवादी सामग्री के 1,000 टुकड़ों को हटाने के लिए इंटरनेट कंपनियों के साथ मिलकर काम करती है.
इसके कुछ लक्ष्य विदेशों की इंटरनेट सेवाएं हैं जहां पुलिस के कदम अभी तक नहीं पहुंचे हैं.
यूरोपोल इंटरनेट रेफ़रल यूनिट का संचालन करता है जो वही काम करती है जो मेट्रोपॉलिटन पुलिस करती है लेकिन महाद्वीप के स्तर पर. हालांकि इसकी सफलता इस पर निर्भर करती है कि क्या इंटरनेट कंपनियां उस समाग्री को तेज़ी से हटाती हैं या नहीं.
इंटरनेट कंपनियां कितनी सक्षम हैं?

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एक बार फिर, उनकी प्रतिक्रिया स्पष्ट नहीं है. ऑनलाइन चरमपंथ से संबंधित सामग्री की पहचान, हटाने और निर्दिष्ट करने को लेकर उद्योग के स्तर पर मानकों पर सहमति नहीं है.
कुछ छोटे संस्थान कहते हैं कि उनके लिए इससे निपटना बहुत मुश्किल है. यूट्यूब कहता है कि सामग्री पर समाज को नज़र रखनी चाहिए और शिकायत करनी चाहिए.
हालांकि उनके आलोचकों का कहना है कि वह ऐसी सामग्री को हटाने के लिए कुछ और कोशिश कर सकते हैं.
एडवर्ड स्नोडेन के इंटरनेट निरीक्षण मामले के बाद से कई सरकारों और इंटरनेट कंपनियों के बीच संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं.
सामग्री की जांच क्यों नहीं?

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पब्लिश करने से पहले सामग्री की जांच पर इंटरनेट कंपनियों का कहना है कि वह सेंसर नहीं हैं, न ही वह यह काम करने के लिए तैयार हैं.
यूट्यूब पर हर रोज़ करीब 4,00,000 घंटों का वीडियो आता है.
महत्वपूर्ण यह है कि सारे प्रमाण इस बात की तस्दीक करते हैं कि आईएस के संदेश को एक मंच पर रोकने का मतलब है कि यह कहीं और आ जाता है.
बहुत सारी सामग्री सीधे व्यक्तियों के बीच साझा की जाती है, जिसके लिए नई पीढ़ी के ऐप का इस्तेमाल किया जाता है जिनमें उच्च स्तर के इनक्रिप्शन का इस्तेमाल होता है.
इसलिए यूरोपोल की नई योजना जहां सामग्री को हटाएगी, यह ज़रूर ही कहीं और उभर आएगी.
तो हल क्या है?

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यूरोपीय यूनियन को लगता है कि हवा में लाठी भांजने से बचने की ज़रूरत है, इसका अर्थ यह है कि लगातार अकाउंट्स को बंद करना ताकि वह कहीं और नज़र आने लगें, से बचा जाए.
इसके बजाए इसे उम्मीद है कि यूरोपोल टीम किसी सोशल मीडिया पर किसी अतिवादी संगठन के मूल आधार की पहचान करेगी ताकि राष्ट्रीय सरकारें उन्हें बेहतर ढंग से चुनौती दे सकें.
बहरहाल सिद्धांत तो यही है, लेकिन अब तक मौजूद सभी प्रमाण कहते हैं कि आईएस को ऑफ़लाइन नहीं किया जा सकता.
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