इसराइल में यहूदियों से ही 'भेदभाव'

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- Author, प्रोफ़ेसर योसी मेकलबर्ग
- पदनाम, चैटहैम हाऊस
इथियोपियाई यहूदियों के इसराइल में अप्रवास की कहानी इसराइली समाज के सर्वश्रेष्ठ और सबसे बुरे रूपों का प्रतीक है.
इसराइल ने 1980-90 में इथियोपिया से यहूदियों को सुरक्षित निकालने का महंगा और ख़तरनाक अभियान शुरू किया था.
भुखमरी, गृह-युद्ध और धार्मिक उत्पीड़न के शिकार हज़ारों यहूदी इसारइल लाए गए.
इसराइल पहुँचने पर इन अलग दिखने वाले लोगों को डराने वाले भेदभाव और नस्लवाद का सामना करना पड़ा.
इसराइली में पहले से रह रहे लोगों ने इन इथियोपियाई यहूदियों की इथियोपिया में उन्हें होने वाली दिक़्कतों को न समझा और न ही उनके इसराइल पहुँचने के सफ़र की मुश्किलों को.
प्रशासनिक संवेदनहीनता और अक्षमता ने उनके लिए हालात और ख़राब कर दिए.
इथियोपियाई समुदाय के हाल के दिनों में हुए प्रदर्शनों में जो अस्वभाविक हिंसा दिखी है वो कई सालों से पुलिस और देश के प्रति इकट्ठा हो रहे रोष का सीधा नतीजा है.
कौन है इथियोपियाई यहूदी

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इथियोपिया में यहूदियों का इतिहास तलाशने में सबसे बड़ी मुश्किल विश्वसनीय दस्तावेज़ न होना है. इसलिए उनके मूल को लेकर कई तरह की दावे किए जाते हैं.
कुछ का मानना है कि वे विलुप्त हिब्रू डेन क़बीले के वंशज हैं.
जबकि दूसरा मत है कि वे राजा सुलेमान और शबा की रानी माकेदा के बेटे इब्न अल हकीम (जिन्हें मेनेलिक प्रथम भी कहा जाता है) के साथ आए लोगों के वंशज हैं.
इथियोपियई यहूदी समाज के प्रमुखों का मानना है कि वे यहूदी साम्राज्य के पतन के बाद मिस्र आए यहूदियों के वंशज हैं.
बीसवीं शताब्दी तक इथियोपियाई यहूदी बाक़ी दुनिया के यहूदी समुदायों से पूरी तरह कटे हुए थे, हालांकि वे सदियों से बाइबिल में वर्णित यहूदी धर्म को मानते आ रहे हैं.
वे इसराइल कैसे पहुँचे

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1977 में इसराइल के प्रधानमंत्री बने मेनाख़िम बेगिन ने इथियोपियाई यहूदियों के लिए इसराइल के दरवाज़े खोले थे.
इथियोपिया में कर्नल मेन्जिस्टू के मार्क्सवादी-लेनिवादी सरकार के दौरान हुए उत्पीड़न, भुखमरी और राजनीतिक अशांति से यहूदियों को बचाने के लिए ऐसा किया गया था.
शुरुआत में इसराइल की ख़ुफ़िया सेवा मोसाद ने सूडान में शरणार्थी कैंपों के ज़रिए यहूदियों को इसराइल लाने का अभियान चलाया और क़रीब सात हज़ार यहूदी इसराइल पहुँचे.
अगले कुछ सालों में इसराइल की ख़ुफ़िया सेवा ने 'ऑपरेशन मोसेज़' और ऑपरेशन सुलैमान चलाया और 20,000 यहूदी बाहर निकाले गए.
नब्बे के दशक में मेन्जिस्तू के सत्ता से हटने के बाद 90 हज़ार यहूदी इथियोपिया से इसराइल पहुँचे.
तनाव की जड़ क्या है?

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इसराइल पहुँचने के 30 साल के बाद से ही ये भावना प्रबल है कि इसराइल इथियोपियाई यहूदियों को स्वीकारने में नाकाम रहा है.
इसराइली इथियोपियाई यहूदियों के इसराइल पहुँचने के ख़तरनाक सफ़र की मुश्किलों और अपने घर-परिवार और दोस्तों को पीछे छोड़ने के दर्द को नहीं समझ पाए.
उन्हें इसराइल पहुँचने पर घर, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा तो मिली लेकिन उन्हें इसराइली प्रशासन की संवेदनहीनता और भेदभाव का सामना करना पड़ा.
कुछ ने तो उनके यहूदी होने पर ही सवाल खड़े कर दिए.
1990 में पता चला कि इसराइल की राष्ट्रीय ब्लड बैंक एचआईवी संक्रमण के डर से इथियोपियाई यहूदियों का दान दिया ख़ून नष्ट करती रही थी.
भेदभाव

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इससे इसराइल का दोहरा मापदंड सामने आ गया और इथियोपियाई यहूदी ख़ुद को बाक़ी समाज से अलग-थलग महसूस करने लगे.
इथियोपियाई बच्चे भी अमूमन इथियोपियाई स्कूलों में ही पढ़ते है और बाक़ी समाज से घुल मिल नहीं पाते.
वे इसराइली समाज का सबसे ग़रीब तबका हैं. जबकि गिरफ़्तारियों और पुलिस जाँच का उन्हें औसत से ज़्यादा सामना करना पड़ता है.
हाल के दिनों में इसराइली पुलिस और इथियोपियाई यहूदियों के बीच हुए झड़पें, सालों से चले आ रहे भेदभाव, नस्लवाद, ग़रीबी, निराशा और अपराधों में शामिल होने के इस चक्र का ही नतीजा है.
अब इसराइल के सामने अपने गिरेबान में झांकने और अपने समाज के कमज़ोर तबके के साथ अपने व्यावहार को सुधारने की चुनौती है.
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