मिस्र में अल-जज़ीरा के पत्रकारों पर मुक़दमा शुरू

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मिस्र की राजधानी काहिरा में गुरुवार को बीस पत्रकारों पर मुक़दमे की कार्रवाई शुरू हुई.
इन सभी पत्रकारों पर चरमपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड की मदद करने का आरोप है.
पिछले साल दिसंबर में मुस्लिम ब्रदरहुड को चरमपंथी संगठन घोषित करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया गया था.
<link type="page"><caption> मिस्र में अल जज़ीरा के पत्रकार गिरफ़्तार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/12/131230_al_jazeera_journos_arrested_ar.shtml" platform="highweb"/></link>
इन 20 में आठ अभियुक्त पुलिस की हिरासत में हैं. इनमें अल-जज़ीरा के मिस्र-कनाडा ब्यूरो चीफ़ मोहम्मद आदेल फहमी और ऑस्ट्रेलियाई संवाददाता पीटर ग्रेस्टे भी शामिल हैं. पीटर ग्रेस्टे बीबीसी के संवाददाता रह चुके हैं.
जिन लोगों पर मुक़दमा चल रहा है उनमें दो ब्रितानी पत्रकार भी हैं. इन दोनों पत्रकारों पर उनकी ग़ैर-मौजूदगी में मुक़दमा चलाया जाएगा.
अल-जज़ीरा ने कहा है कि जिन लोगों पर मुक़दमा चलाया जा रहा है उनमें केवल नौ लोग ही उसके कर्मचारी हैं और वो लोग केवल मिस्र के हालात की रिपोर्ट दे रहे थे.
पत्रकारों पर आरोप

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मिस्र की अंतरिम सरकार ने इस अंतरराष्ट्रीय न्यूज संस्था पर मोहम्मद मोर्सी और अन्य धर्मनिरपेक्ष विपक्षियों से जुड़े मानव अधिकार के मामलों से जुड़ी पक्षपातपूर्ण ख़बरें चलाने का आरोप लगाया है.
गुरुवार को काहिरा के तोरा जेल परिसर में 16 मिस्र निवासियों पर चरमपंथी संगठन के लिए काम करने और देश की एकता और अमन को 'नुकसान' पहुँचाने के लिए मुक़दमा चलाया जा रहा है.
<link type="page"><caption> मिस्र में 20 पत्रकारों पर मुक़दमे की तैयारी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/01/140129_egypt_journalist_charge_ss.shtml" platform="highweb"/></link>
विदेशी नागरिकों पर मिस्र के इन नागरिकों की पैसे, साजो-सामान, सूचना देकर मदद करने का आरोप है.
उन पर बाहरी दुनिया को यह बताने के लिए मिस्र में गृहयुद्ध चल रहा है, इसके लिए ग़लत ख़बर चलाने का भी आरोप है.
इन आरोपों में से पाँच से पंद्रह साल की सजा हो सकती है.
मिस्र में पिछले सात महीने में तक़रीबन 1000 लोग मारे गए हैं. मरने वालों में ज़्यादातर पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी के समर्थक थे.
रात में गिरफ़्तारी

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ग्रेस्टे, फहमी और मिस्र के स्थानीय प्रोड्यूसर को काहिरा के एक होटल से 29 दिसंबर को गिरफ़्तार किया गया था.
उस समय ये लोग अल-जज़ीरा के लिए रिपोर्ट तैयार कर रहे थे. मिस्र के अभियोजन पक्ष का कहना है कि ये लोग ग़ैर-क़ानूनी रूप से काम कर रहे ते क्योंकि उनके पास प्रेस पास नहीं थे.
इन पत्रकारों की गिरफ़्तारी के चार दिन पहले ही मिस्र की अंतरिम सरकार ने मुस्लिम ब्रदरहुड को 'चरमपंथी संगठन' घोषित किया था.
अंतरिम सरकार ने इस घोषणा के लिए सुरक्षा ठिकानों और अधिकारियों पर हुए ताज़ा हमलों का हवाला दिया था. हालांकि इसके लिए कोई प्रमाण प्रस्तुत किया गया.
अमरीकी सरकार ने मिस्र पर पत्रकारों एवं अन्य को निशाना बनाने का आरोप लगाया है.
विरोधी की आवाज़

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मिस्र में अदालत में पहुँचे पीटर के भाई एंड्रयू ने कहा, "मैं मिस्र के कानून का विशेषज्ञ नहीं हूँ लेकिन मुझे इसके कई पक्षों के बारे में समझाया गया है, फिर भी मुझे लगता है कि मैं ऐसी स्थिति में नहीं हूँ कि आज कोई उम्मीद कर सकूँ. इसलिए मुझे लगता है कि हमें बहुत उम्मीद है लेकिन अगर चीज़ें हमारी उम्मीद से उलट होती हैं तो भी हम इसके लिए भी तैयार हैं"
<link type="page"><caption> इराक में अल-जज़ीरा समेत 10 टीवी चैनलों पर प्रतिबंध</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130428_iraq_channel_suspended_rd.shtml" platform="highweb"/></link>
मानव अधिकार संस्था ह्यूमन राइट वॉच के मध्य-पूर्व के उप निदेशक जोई स्टॉर्क ने कहा, "पत्रकारों को अपना काम करने के लिए मिस्र की जेल में सजा काटना सही नहीं है. विरोध करने वालों और अकादमिक जगत लोगों के उत्पीड़न के बाद इन पत्रकारों को मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों से बात करने के लिए सजा देने से यह पता चलता है कि मिस्र में विरोध के स्वर के लिए जगह ख़त्म होती जा रही है."
पिछले महीने 25 मिस्र निवासियों पर 'अदालत के अपमान' के लिए मुक़दमा चलाने की बात कही थी. इनमें प्रोफ़ेसर और पूर्व सासंद अम्र हम्ज़ावी भी शामिल थे. उन्होंने ट्विटर पर अदालत के एक फ़ैसले पर सवाल उठाया था.
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