ईरान पर समझौता क्यों अहम है?

ईरान से समझौता
    • Author, जोनाथन मार्कस
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ईरान पर आर्थिक पाबंदी बढ़ाने की वजह यही थी कि उसे समझौते की मेज़ पर लाया जा सके और उसके परमाणु कार्यक्रम पर किसी क़रार तक पहुंचा जा सके.

समझौते की मेज़ तक लाने की एक और वजह थी कि बाक़ी सभी विकल्प- इसराइल या अमरीका की सैन्य कार्रवाई या दोनों की मिली-जुली कार्रवाई, ठीक नहीं थे.

इस कार्रवाई के पहले से ही अस्थिर क्षेत्र में ऐसे नतीजे हो सकते थे जिनका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता, लेकिन अगर ये कार्रवाई बहुत हद तक कामयाब भी होती, तब भी इससे ज़्यादा से ज़्यादा ईरान के परमाणु कार्यक्रम को कुछ साल पीछे धकेला जा सकता था.

जेनेवा में पहले चरण की बातचीत कुछ-कुछ परखने के लिए थी, सद्भावना के कुछ क़दम स्थापित करने के लिए थी, भरोसा बढ़ाने के लिए थी और कुछ समय हासिल करने के लिए थी ताकि इस दौरान वार्ताकार ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े जटिल मुद्दों को सुलझाने की कोशिश करें और ऐसे समझौते तक पहुंचा जा सके जिससे पूरा मसला हमेशा के लिए सुलझ जाए.

ऐसे में इस <link type="page"><caption> अंतरिम क़रार</caption><url href="131124_iran_deal_akd" platform="highweb"/></link> को कैसे आंका जाना चाहिए?

मक़सद

ईरान समझौता

पहली नज़र में यह अच्छा लगता है- निश्चित रूप से बड़े देशों के नज़रिए से. पहले विश्लेषकों ने जैसा आंका था, यह शायद उससे थोड़ा आगे जाता है.

इसका मुख्य मक़सद था ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम के साथ आगे बढ़ने से रोकना.

कुल मिलाकर बात करें तो अराक रिएक्टर में और काम नहीं होगा, न प्रयोग होगा.

पश्चिमी विशेषज्ञ यह मानकर चल रहे थे कि एक बार शुरू होने पर इसके प्लूटोनियम का इस्तेमाल ईरान परमाणु बम बनाने के दूसरे रास्ते के तौर पर कर सकता है.

मोटे तौर पर इससे ईरान का परमाणु कार्यक्रम रुक जाएगा और इसे लेकर छह महीने की बातचीत की शुरुआत होगी.

इसके बदले में ईरान को वह मिला है, जिसे अमरीका आर्थिक प्रतिबंधों के संदर्भ में 'सीमित, अस्थाई और पलटे जाने लायक' राहत मानता है.

सीमित असर

इस सौदे से अमरीकी और ईरानी, दोनों को ही, कुछ न कुछ हासिल हुआ है. दोनों पक्ष कह सकते हैं कि उन्हें कुछ रियायत मिली है, लेकिन इसका असर सीमित होगा.

असली कामयाबी यह होगी कि आगे की अहम बातचीत के लिए ज़मीन तैयार हो चुकी है.

प्रतिबंध से मिली राहत स्पष्ट है. अमरीका ने ज़ोर देकर कहा है कि मौजूदा प्रतिबंध जारी रहेंगे. ईरान परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगा रहा है लेकिन उसके कई सेंट्रीफ़्यूज काम नहीं कर रहे थे. ईरान वैसे भी संवर्धन को किसी कारण से सीमित कर रहा था और अराक रिएक्टर अब भी शुरू होने से दूर है.

इसराइल, प्रधानमंत्री
इमेज कैप्शन, इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू इस समझौते को ऐतिहासिक ग़लती मानते हैं.

इसलिए न तो ईरान ज़्यादा क़ीमत चुका रहा है और न ज़्यादा फ़ायदा हासिल कर रहा है.

बड़े देश ईरान से इस बारे में सहमति हासिल कर चुके हैं कि वो उसके परमाणु संयंत्रों की जांच कर सकेंगे - अगर कोई व्यापक समझौता होना है तो उसके लिए यह अहम हो सकता है.

वो इस बारे में भी ज़ोर दे सके कि ईरान की बीती गतिविधियों - जिनमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम का सैन्य पक्ष भी है - को भी हल किया जाएगा. यह भी भविष्य के लिए अहम है.

अहम बातचीत

हालांकि ईरान को एक अहम रियायत मिली है, जिससे वह यूरेनियम संवर्धन का बुनियादी स्तर बनाए रख सकता है.

शायद यही वह बात है जिससे इसराइल सचेत है. ईरान ने हमेशा ये बात कही है कि उसे यूरेनियम संवर्धन का हक़ है. अमरीका ने इसे मानने से हमेशा इनकार किया है.

व्यावहारिक तौर पर देखें तो ईरान शायद ही संवर्धन को छोड़े - इस अंतरिम दौर में तो निश्चित तौर पर नहीं - और कहा जा सकता है कि भविष्य में होने वाले किसी व्यापक क़रारा में भी नहीं.

इस अंतरिम समझौते की अहमियत को अतिनाटकीय बनाना किसी के लिए लाभकारी नहीं है. इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू इसे "ऐतिहासिक ग़लती" के तौर पर देखते हैं.

दूसरों ने कहा है कि इससे मध्य पूर्व का चेहरा ही बदल जाएगा: दोनों ही बढ़ा-चढ़ाकर बात कर रहे हैं.

यह वह समझौता है, जिससे धुंध छंटती है और भविष्य की अहम बातों के लिए रास्ता साफ़ होता है, जो सफल हो भी सकती है और नहीं भी.

ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा मध्य पूर्व और दुनिया के लिए अहम है.

इसके हल होने से युद्ध की एक संभावित वजह ख़त्म हो जाएगी. लेकिन इससे एक अहम तथ्य में बदलाव नहीं आएगा कि ईरान अब महत्वपूर्ण क्षेत्रीय ताक़त है. अमरीका और उसके दोस्तों ने यह बात तभी समझ ली थी, जब उन्होंने ईरान के पुराने दुश्मन- इराक़ में सद्दाम हुसैन सरकार को हटाया था.

अहम दांव

अमरीका का जो मौजूदा रास्ता है उससे इसराइल और खाड़ी के कई देश- ख़ासतौर पर सऊदी अरब- बहुत बेचैन हैं.

ईरान
इमेज कैप्शन, ईरान अराक संयंत्र पर पहले की तरह तेज़ी से काम नहीं कर रहा.

नीति, भरोसा और आपसी ग़लतफ़हमी के मुद्दे तनाव के एक मिश्रण में बंधे हुए हैं.

वे पूछते हैं कि क्या एक ऐसे अमरीकी प्रशासन पर ईरान पर दबाव डालने का भरोसा किया जा सकता है जो सीरिया पर हमला करने से कतरा गया था?

अगर परमाणु क़रार होता है तो क्या इससे ईरान की इलाक़े में बढ़ती अहमियत को मान नहीं लिया जाएगा?

और ईरान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव घटने का ईरान के प्रभाव के दूसरे क्षेत्रों के लिए क्या मतलब होगा?

ये सब जायज़ सवाल है, लेकिन प्रसार, ख़ासतौर पर परमाणु प्रसार अलग ही चीज़ मानी जाती है.

परमाणु हथियारों वाला ईरान इस क्षेत्र में रणनीतिक समीकरणों को नाटकीय तौर पर बदल देगा. इससे दूसरे कई देश भी परमाणु हथियार हासिल करने की होड़ करेंगे.

ऐसा हुआ तो मध्य पूर्व कभी पहले जैसा नहीं रहेगा. यही वजह है कि अगले छह महीनों को लेकर जुनून बहुत होगा और दांव बहुत ऊंचे हैं.

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