'मैंने अपने हाथों, अपनी मां-बहनों को दफ़नाया'

सहारा रेगिस्तान में नाइजर के उत्तर में बुधवार को 87 लोगों के शव मिले हैं. ये अप्रवासी थे जो तब प्यास से मर गए जब अल्जीरिया जाते हुए रास्ते में उनकी गाड़ी ख़राब हो गई. नाइजर की 14 साल की किशोरी, शफ़ा, इस हादसे में बच गई. बीबीसी के न्यूज़डे कार्यक्रम को उसने अपनी कहानी सुनाई. शफ़ा की कहानी उसी की ज़ुबानीः
हम लोग अपने परिवार के लोगों से मिलने अल्जीरिया जा रहे थे. दो गाड़ियों के काफ़िले में हम 100 से ज़्यादा लोग थे. हमारा ट्रक ख़राब हो गया और इसे ठीक होने में पूरा दिन लग गया. इस दौरान हमारे पास पानी ख़त्म हो गया.
हम लोगों ने एक कुआं ढूंढ निकाला लेकिन इसमें बहुत कम पानी था. हममें से एक उसमें नीचे उतरा और थोड़ा सा पानी निकाला. ज़्यादातर लोग प्यासे ही रह गए.
ड्राइवरों ने हमें इंतज़ार करने को कहा जबकि अन्य पानी ढूंढने गए थे, लेकिन एक रात और दिन बाद भी वह नहीं लौटे.
तब लोगों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया. हम में से करीब 15 लोग दूसरे दिन पानी के बिना मर गए.
वह लौटकर नहीं आए
हम एक ट्रक में शवों को लेकर आगे बढ़े. तब तक दूसरा ट्रक पानी लेकर लौट आया था, ख़ुदा का शुक्र है.
हम अल्जीरियाई सुरक्षा बलों के नज़दीक पहुंचे- लेकिन ड्राइवर दूसरी ओर मुड़ गए क्योंकि यह गैरकानूनी था और वे पकड़े जाना नहीं चाहते थे.
उन्होंने हमें एक गड्ढे में छुपने को कहा. हमने एक और रात वहीं गुज़ारी- इस तरह बिना पानी के यह तीसरी रात थी.
एक महिला ने शिकायत करनी शुरू कर दी और एक ड्राइवर ने पाइप से हमें पीटा.
कई महिलाएं और बच्चे मर गए. ड्राइवरों के पास जेरीकैन में कुछ पानी था लेकिन वह उन्होंने अपने लिए रखा था.
वहां से वह हमें फिर नाइजर ले गए. पानी फिर ख़त्म हो गया था और हम वहां ट्रकों में लाशों के बीच बैठे थे- भूखे-प्यासे.

नाइजर में पहुंचने के बाद ड्राइवरों ने दफ़नाने के लिए ट्रकों से शवों को निकाल दिया. पहले माएं और फिर उनके ऊपर उनके बच्चे.
पैदल
हममें से जो भी चलने के काबिल थे उन्हें बताया गया कि हमें वापस अपने गांव ले जाया जाएगा. रास्ते में पेट्रोल ख़त्म हो गया और फिर हमसे इसे ख़रीदने के लिए और पैसे मांगे गए.
उन्होंने हमें कार से उतर जाने को कहा ताकि वह ईंधन भरवाने जा सकें. वह कभी लौटकर नहीं आए.
बगैर खाने-पानी के हमने रेगिस्तान में दो दिन तक इंतज़ार किया- उसके बाद हमने तय किया कि हम पैदल चलें.
कुछ वाहन गुज़रे, हमने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन कोई नहीं रुका. एक कार ने तो हमारे समूह के तीन लोगों को टक्कर मारकर उनकी हत्या कर दी.
तब हम आठ लोग बचे थे, जिनमें मेरी मां और मेरी छोटी बहनें भी थीं. जब हम थक गए तो हम एक पेड़ के नीचे बैठ गए और वहीं मेरी एक बहन की मौत हो गई. हमने उसे वहीं दफ़ना दिया.
हम फिर चलने लगे और एक दिन बाद मेरी दूसरी बहन की भी मौत हो गई. तीसरे दिन मेरी मां की भी मौत हो गई. मैंने खुद उन सब को दफ़न किया.

वहां से गुज़रता कोई भी वाहन रुककर मुझे ले जाने को तैयार नहीं हुआ.
दूध-पानी-केक
थोड़ी देर बाद मुझे एक पेड़ दिखा और मैं इसकी छाया में बैठ गई. तब तक मैं निराश होने लगी थी... तभी एक कार आई.
मैंने अपना ब्लाउज़ उतार दिया और इसे पागलों की तरह हिलाने लगी. गाड़ी रुक गई और उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या हुआ, मैंने उसे बता दिया.
उन्होंने मुझे दूध दिया, पानी दिया और चावल का केक दिया.
मैंने थोड़ा खाया लेकिन मैं और नहीं खा सकी. फिर उन्होंने मेरे लिए चाय बनाई.
इसके बाद ही हमने अर्लित की ओर यात्रा शुरू की, जहां मैं अपने दादा से मिली.
तो देखिए यह मैं हूं- मेरे पिता बहुत पहले मर गए थे, अब मेरी मां भी गर गई है, मेरी कोई बहन नहीं बची, कोई भाई नहीं है.
मैं अपनी एक रिश्तेदार के साथ रह रही हूं. मैंने सुना है कि सिर्फ़ मैं और एक छोटी लड़की और 18 आदमी ही उस 100 से ज़्यादा लोगों के काफ़िले में से ज़िंदा बचे हैं.
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