'कराची जल रहा है और तुम बांसुरी बजा रहे हो'

- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉटकॉम, कराची
जितने ऑपरेशन अभी तक कराची के हुए हैं, अगर किसी मरीज़ के किए होते तो अब तक या तो वो भला चंगा हो जाता या अगले जहान के लिए सिधार चुका होता.
और अगर ये ना भी होता तो कम से कम ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर ही कुछ सीख गए होते. लेकिन यहां तो वो आलम है जिसके बारे में किसी शायर ने कहा था:
मरीज़-ए-इश्क पर रहमत ख़ुदा की,
मर्ज़ बढ़ता गया ज्यूं ज्यूं दवा की.
नवाज़ शरीफ़ की पहली सरकार में कराची में ऑपरेशन जारी था. जिन्नाहपुर के नक्शे बरामद हो रहे थे, हर मुहल्ले में एक टॉर्चर सेल मिल रही थी.
कोरंगी और लालू खेत में लड़के फौजियों के साथ आंख-मिचौली खेल रहे थे और उस वक्त तक ब्रेकिंग न्यूज इज़ाद नहीं हुई थी.
इसीलिए शाम को पत्रकार भाई ईधी सेंटर (गैर सरकारी संगठन जो मुफ़्त एंबुलेंस सेवा देता है) को फ़ोन घुमाते, अस्पतालों का चक्कर लगाते, शाम को एक दूसरे से पूछते कि आज क्या स्कोर हुआ है.
खबर फाइल करते और फिर चाय-समोसे पर शहर के हालात पर विलाप करते.
ऐसी ही एक शाम को एक महिला पत्रकार आईं और सब को ये कह कर डांटा कि कराची जल रहा है और तुम लोग बैठे समोसे खा रहे हो. उस वक्त कराची की आबादी एक करोड़ से कम ही थी.
सबकी मंजिल कराची
एक और ऑपरेशन के लिए फिर थिएटर तैयार किया जा रहा है. जर्राह दस्ताने पहन रहे हैं और मरीज को बताया जा रहा है कि थोड़ी तकलीफ तो होगी लेकिन अब नश्तर के अलावा कोई चारा नहीं है.
कराची की आबादी इस वक्त दो करोड़ से ज्यादा हो चुकी है. मुझे नहीं लगता है कि कराची के लोग बाकी पाकिस्तानियों से ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं.

आबादी में इस बढ़ोत्तरी की बुनियादी वजह ये है कि पाकिस्तान के कई इलाकों में हालात कराची से भी ज्यादा खराब हैं या फिर देश के बड़े हिस्से तक ये जानकारी नहीं पहुंची है कि कराची बोरी बंद लाशों, वसूली करने वालों, कब्जा करने वालों और गैंगवार करने वालों का शहर है.
अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्यों लोग अब भी यहां खिंचे चले आते हैं.
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के मीरपुर से अगर कोई मैनचेस्टर नहीं जा सकता है तो नौकरी की तलाश में कराची आता है, ख़ैबर पख्तून ख्वाह के बालाकोट में जब भूकंप आता है तो प्रभावित लोग कराची का रुख करते हैं, पंजाब के सराइकी इलाके में जब किसानों की फसल बाढ़ में बह जाती है तो वो कराची आने वाली बस में सवार हो जाते हैं. बलूचिस्तान में लड़का बीए पास करे तो कहां जाए? कराची.
और ये तो पिछले चंद सालों का रुझान है. इससे पहले बांग्लादेश, नेपाल, ईरान और अफगानिस्तान से लोग शरण और रोजगार की तलाश में यहां आते रहे हैं.
बुनियादी सवाल
हर ऑपरेशन से पहले आवाज़ें उठती हैं कि कौन किस को मार रहा है, नो गो एरिया कहां है, किस राजनीतिक पार्टी की सशस्त्र शाखा है और किस सशस्त्र शाखा ने राजनीतिक पार्टी बना ली है. ये सवाल कोई नहीं पूछता कि आखिर ये दो करोड़ इंसान जिंदा कैसे रहते हैं. लाशें कौन उठाता है, कूड़े का धंधा कितने का है, लोग घर से काम तक कैसे पहुंचते हैं, कुछ इलाकों में ज़मीन का कब्ज़ा किसके पास है.
हथियार ज्यादा ल्यारी में हैं या डिफेंस में. शहर में मोबाइल फोन ज्यादा हैं या कचरा उठा कर दिहाड़ी कमाने वाले.
शहर में इतने कव्वे कहां से आए और बाकी पक्षी कहां चले गए.
न सिर्फ ये कि इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं, बल्कि किसी को ये सवाल पूछने की परवाह भी नहीं है. कराची वालों को पहले यह कह कर डराया जाता था कि आगे समंदर है. अब इसका इलाज ढूंढ लिया गया है. अब समंदर को पीछे ढकेल कर अब डिफेंस का नया फेज़ बना लिया जाता है और बेचने के लिए लॉटरी निकाली जाती है.
और फेज़ तो जब बनेगा तब बनेगा, इससे पहले प्लॉट की फाइल हाथों हाथ बिक जाती है. तो यूं कहिए कि कराची के कारीगर समंदर को फाइल में बंद करके बेच देते हैं.
खून सस्ता, जमीन महंगी
कराची के हालात पर अकसर विलाप करने वाले पूछते पाए जाते हैं कि यहां इंसानी खून इतना सस्ता क्यों है.

जवाब सबके सामने है. इसलिए कि जमीन बहुत महंगी है. डिफेंस फेज़ 8 में प्लॉटों की कीमतें देखिए.
और डिफेंस क्या, कराची में तो झुग्गी बस्तियां भी खून मांगती हैं. निसार बलोच गटर बागीचा बचाने के चक्कर में था कि उसके बच्चों के पास खेलने के लिए कोई जगह हो.
परवीन रहमान कराची के कोठों की गिनती करती थी और गरीबों को नालियां और गटर बनाना सिखाती थीं.
दोनों को दोस्तों ने समझाया था कि मारे जाओगे, पर बाज नहीं आए और मारे गए. कोई ऑपरेशन नहीं हुआ.
अतीत में जो ऑपरेशन हुए हैं वो इस तरह के थे जिनमें सर्जन ऑपरेशन के बाद कभी तौलिया पेट में भूल जाता है और कभी कैंची.
और कभी ऑपरेशन दाएं गुर्दे का करना होता है तो चाकू बाएं पर चल जाता है. शायद यही वजह है कि मरीज़ ऑपरेशन तो करवाना चाहता है, लेकिन उसे सर्जन की नीयत और उसकी दक्षता के बारे में काफी शक हैं.
कराची प्रेस क्लब के बाहर जहां पूरा कराची अपने दुखड़े सुनाने आता है, कभी कभी वहां एक युवा बांसुरी बजाता हुआ पाया जाता है.
हो सकता है कि दिल का रांझा हो लेकिन यहां इस उम्मीद में आता है कि शायद कोई उसकी बांसुरी खरीद ले.
कराची पहुंच कर रांझा भी सेल्समैन बन जाता है. कभी दिल करता है कि उसे छेंडू और कहूं कि 'कराची जल रहा है और तुम यहां बैठे बांसुरी बजा रहे हो.'
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