आखिर कितना पोर्न है इंटरनेट पर?

- Author, मार्क वार्ड
- पदनाम, तकनीक संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
पोर्न के बारे में कई बातें बढ़ाचढ़ाकर पेश की जाती हैं जिनमें इंटरनेट पर मौजूद अश्लील सामग्री के आंकड़े भी शामिल हैं.
बच्चों और किशोरों पर पोर्नोग्राफ़ी के प्रभाव के बारे में ब्रिटेन में जबरदस्त बहस छिड़ी है और यही वजह है कि इस बारे में सही आंकड़ों की ज़रूरत महसूस की जा रही है.
इन बहसों में अलग-अलग आंकड़े सामने आ रहे हैं. लेकिन इनमें से कुछ ही वास्तविकता की कसौटी पर खरे उतरते हैं?
एक आंकड़ा ये है कि इंटरनेट पर मौजूद कुल सामग्री में से 37 प्रतिशत पोर्नोग्राफी से जुड़ी है. कई लोगों ने बहसों में इस आंकड़े का उल्लेख किया है. नेट फिल्टरिंग फ़र्म ऑप्टेनेट ने जून 2010 में जारी एक प्रेस रिलीज में ये आंकड़ा दिया था.
फ़र्म के एक प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा, “ये आंकड़ा अप टू डेट नहीं है और ये इंटरनेट की आज की स्थिति को बयान नहीं करता है.”
अध्ययन
स्कैडिनेवियन रिसर्च सेंटर सिनटैफ के मुताबिक इंसानी प्रजाति ने अब तक जितना डेटा तैयार किया है उसमें से 90 प्रतिशत पिछले दो साल में बनाया गया है. वेब, और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रचलन इसके लिए ज़िम्मेदार है.
लेकिन सवाल उठता है कि साल 2010 में ही सही, 37 प्रतिशत आंकड़ा कितना सटीक था. ऑप्टेनेट ने कहा कि ये आंकड़ा वेब कंटेंट के डेटाबेस से लिए गए लगभग 40 लाख यूआरएल के प्रतिनिधिक नमूने पर आधारित था.

लेकिन उसी साल प्रकाशित सेक्स पर आधारित अब तक के सबसे व्यापक अध्ययन में इस बारे में अलग ही आंकड़ा दिया गया था कि इंटरनेट की सबसे लोकप्रिय साइटों में कितनी पोर्न से संबंधित हैं.
शोधकर्ताओं ने दुनिया की दस लाख सबसे लोकप्रिय साइटों का अध्ययन किया और पाया कि इनमें से केवल चार प्रतिशत साइटें ही पोर्न से जुड़ी थीं.
इन दो अध्ययनों का पैमाना भी समान नहीं था. ऑप्टेनेट ने जहां पेजों को अपना आधार बनाया वहीं दूसरे शोध में साइटों के आधार पर निष्कर्ष निकाला.
कंटेंट
यहां ये बात काबिले गौर है कि किसी साइट पर पेजों की संख्या से इसके प्रभाव या दर्शकों की संख्या का पता नहीं चलता है. दूसरे अध्ययनों से पता चलता है कि पोर्न साइटें अपेक्षाकृत बहुत बड़ी होती हैं क्योंकि उन्हें हर दिन नया कंटेंट देना पड़ता है.
इन अध्ययनों से ये बात तो तय है कि पोर्न साइटों का आर्काइव बहुत बड़ा होता है लेकिन इसकी तुलना में इनके पेजों को देखने वाले लोगों की संख्या बहुत कम होती है.
साल 2010 में हुए व्यापक अध्ययन 'ए बिलियन थॉट्स' के सह लेखक डॉक्टर ओगी ओगास का कहना है कि साइट के बजाए उन्हें विजिट करने वाले लोगों की संख्या देखना बेहतर है.
अब ये सवाल उठता है कि लोग बड़ी संख्या को क्यों चुनते हैं?
मिथक
डॉक्टर ओगास ने कहा, “बड़ी संख्या ज़्यादा सनसनी पैदा करती है लेकिन ये बड़ी संख्याएं हमेशा से ही शहरों का मिथक रहा है.”
'एक्सट्रीम टेक' में छपे एक लेख के मुताबिक इंटरनेट पर देखी जाने वाली चीज़ों में 30 प्रतिशत पोर्न साइटें हैं. इस आंकड़े को निकालने के लिए एक लोकप्रिय पोर्न साइट पर प्रतिदिन आने वाले ट्रैफिक को ऐसी दूसरी दर्जनों वेबसाइटों के साथ गुणा किया गया.
लेकिन इस गुणा-भाग में कई पेंच हैं. पहला ये कि एक दिन में इंटरनेट पर कुल कितना डेटा इधर-उधर होता है, इसे कम आंका गया है.
एक्सट्रीम टेक के मुताबिक 2012 में इंटरनेट पर कुल डेटा एक एक्साबाइट से कम था लेकिन नेटवर्क हार्डवेयर कंपनी सिस्को के मुताबिक ये आंकड़ा 1.4 एक्साबाइट था.
ऑनलाइन ट्रैफिक अनुमान पर सवाल उठाने के और भी कारण हैं. एक्सट्रीम टेक का कहना है कि उसने जिस साइट को नमूने के तौर पर लिया था उसे हर दिन 10 करोड़ विजिटर देखते हैं.
विजिटर

लेकिन बीबीसी को बताया गया कि इस साइट और दूसरी पोर्न साइटों पर विजिटर्स की संख्या कम होती है. मैनविन ऐसी साइटों को चलाने का हक़ रखती है.
मैनविन के मुताबिक उसकी सभी साइटों पर हर दिन सात करोड़ विजिटर आते हैं. लेकिन ये आंकड़ा भी बढ़कर हो सकता है. दूसरे अध्ययनों से ये बात साबित होती है कि पोर्न साइटें क्लिक जेनरेटर होती हैं. यानी हर वीडियो और स्टिल पर एक बार माउस क्लिक करने से दूसरी साइटें, विज्ञापन या पॉप अप खुल सकते हैं.
ऐसे में पोर्न साइटों को विजिट करने वाले लोगों और इनसे जेनरेट होने वाला ट्रैफिक कम होना चाहिए.
डॉक्टर ओगास ने कहा कि अगर इंटरनेट पर लोगों के दावे से कम पोर्न भी मौजूद है तब भी ये बहुत है. उन्होंने कहा, “14 प्रतिशत सर्च और चार प्रतिशत वेबसाइटें सेक्स से संबंधित हैं और ये एक बहुत बड़ी संख्या है.”
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