आदिवासियों की लड़ाई का चेहरा बना फ़ेसबुक

सोशल मीडिया के तेज़ी से बढ़ते इस्तेमाल को नकारात्मक मानने वालों की कमी नहीं है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसने लोगों को अभिव्यक्ति का एक अभूतपूर्व मंच प्रदान किया है.
लैटिन अमरीकी देश ब्राज़ील सोशल मीडिया वेबसाइट फ़ेसबुक का इस्तेमाल करने में ना सिर्फ़ अग्रणी है बल्कि वहां के जनजाति समूह इसके ज़रिए अब अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं.
पिछले दिनों ब्राज़ील के सिदरोलैंडिया में पुलिस की गोलीबारी में ओज़ील ग्रैबिएल नामक एक आदिवासी की मौत हो गई. इस पुलिसिया कार्रवाई की भर्त्सना करते हुए इस ख़बर का वीडियो और तस्वीरें मिनटों में फ़ेसबुक पर आ गईं.
ओज़ील जिस आदिवासी समूह से संबंध रखते थे उसने ये तस्वीरे अपने समर्थकों तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया और इसका अभूतपूर्व असर भी देखा गया. ब्राज़ील के न्याय मंत्री ने तुरंत बयान जारी करते हुए जांच का भरोसा दिलाया.
ये सिर्फ़ एक घटना नहीं है. ब्राज़ील के जनजातीय समूहों का कहना है कि वो अब सोशल मीडिया वेबसाइटों का इस्तेमाल अपने विचारों को फैलाने और स्थानीय मीडिया में उनके प्रति मौजूद पूर्वाग्रहों को ग़लत साबित करने के लिए कर रहे हैं.
पेशे से वक़ील लुई हेनरिक एलॉय का कहना है, "खेती से जुड़े विवादों पर अख़बार और टेलीविज़न आमतौर पर आदिवासियों के बजाए स्थानीय किसानों का पक्ष लेते हैं".
जानकारी का मंच

एलॉय बताते हैं कि "मीडिया भी इसी आम धारणा को प्रचारित करता है कि ग़ैर सरकारी संगठन और सरकार का भारत-मामलों का दफ़्तर फुनेई इन आदिवासी समूहों को भड़काते हैं ताकि वो किसानों की ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लें."
हालांकि गुआरानी काओवा जनजाति से संबंध रखने वाले मानव विज्ञान के एक छात्र टॉनिको बेनाइट्स कहते है कि वास्तविकता इससे काफ़ी अलग है.
बीबीसी ब्राज़ील से बातचीत में टॉनिको ने बताया कि "एनजीओ और फ़ुनेई को तो आदिवासी समूहों के बैठकों से अक्सर निकाल दिया जाता है क्योंकि वो ज़मीन पर क़ब्ज़े जैसी कार्रवाइयों का विरोध करते हैं. पहल करने वाले हमेशा मूल निवासी और उनके नेता होते हैं. आख़िर लड़ाई वही लड़ेंगें और गोली भी वही खाते हैं."
दरअसल एलॉय और बेनाइट्स आदिवासी नेताओं के उस समूह का हिस्सा हैं, जो तेज़ी से उच्च शिक्षा हासिल कर लोगों की मांगों की लड़ाई आगे ले जा रहा है. विश्विद्यालय में ये लोग इंटरनेट की सुविधा का इस्तेमाल अपने संदेश पहुंचाने के लिए करते हैं और गांव या फिर विवाद ग्रस्त क्षेत्र में वापसी के बाद सोशल मीडया के प्रयोग के लिए मोबाइल फ़ोन इनका हथियार बनता है.
आदिवासियों की अनदेखी

आदिवासियों के अंदर ये भावना है कि सरकार ने पूरी तरह से उनकी अनदेखी की है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि 2011 में सत्ता संभालने के बाद से राष्ट्रपति डिल्मा रोसेफ़ ने एक बार भी आदिवासी समूहों से मुलाक़ात नहीं की है.
हालांकि अपने जनजाति समूह गुआरानी काओवा पर एक फ़ेसबुक पेज चलाने वाले टॉनिको बेनाइट्स कहते हैं, "सोशल मीडिया की इस वर्चुअल दुनिया ने ब्राज़ील में उनके हक़ में राय कायम करने में मदद की है जो पहले नहीं था."
बेनाइट्स बताते हैं कि उनका समूह मध्य और दक्षिणी ब्राज़ील में अपने पुरखों की ज़मीन के लिए लड़ रहा है लेकिन लालफ़ीताशाही और खेतीहर समूहों द्वारा पैदा की गई क़ानूनी अड़चनों के चलते इसमें दशकों लग गए हैं.
दूसरी तरफ़ ब्राज़ील के राष्ट्रीय कृषि परिसंघ का कहना है कि आदिवासी अपनी भूमि से वंचित नहीं हैं. आबादी का केवल एक प्रतिशत होने के बावजूद उन्हें देश की 12 प्रतिशत ज़मीन दी गई है.
पिछले महीने ब्राज़ील सरकार ने घोषणा की थी कि आदिवासी भूभाग के वर्तमान वितरण में बदलाव किया जाएगा और इसमें कृषि मंत्रालय की बड़ी भूमिका होगी.
इस घोषणा के बाद पूरे देश में आदिवासी प्रतिरोध भड़क उठा क्योंकि उन्हे डर है कि इस प्रक्रिया के बाद उनके लिए अपनी पुश्तैनी ज़मीनें हासिल करना और भी मुश्किल हो जाएगा.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक कर सकते हैं</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












