बहुत कठिन है डगर शरीफ़ की....

नवाज़ शरीफ़ तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन सकते हैं. चुनाव जीतकर उन्होंने इतिहास तो रच दिया है, लेकिन पाकिस्तान के आगे मौजूद चुनौतियों से निपटना उनके लिए आसान नहीं है.
अख़बारों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल-एन) प्रमुख को बधाइयां तो दी ही जा रही हैं लेकिन इसके साथ ही चुनौतियों से आगाह भी किया जा रहा है.
ज़्यादातर अख़बार अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और आतंकवाद को चुनौती मान रहे हैं.
आर्थिक दैनिक बिज़नेस रिकॉर्डर कहता है कि चुनावों ने देश को “फिर से बनाने का एक दुर्लभ अवसर” प्रदान किया है, जिसका पूरा फ़ायदा उठाकर उसे दुनिया में अपनी जगह बनानी चाहिए.
अर्थव्यवस्था और आतंकवाद

अखबार आगे कहता है कि चूंकि शरीफ़ एक व्यापारिक घराने से हैं इसलिए उन्हें विदेशी निवेशकों का विश्वास जीतने में आसानी होगी.
डेली टाइम्स के अनुसार, “अर्थव्यवस्था, ख़ासतौर पर ऊर्जा पर तुरंत ध्यान देने की ज़रूरत है. लेकिन आतंकवाद देशी और विदेशी पूंजी निवेश की राह में एक बड़ी बाधा बना रहेगा.”
द नेशन अख़बार भी देश में जारी घोर ऊर्जा संकट को ही मुख्य समस्या मानता है, “बिजली कटौती का दानव और उससे जुड़ी दिक्कतें पीएमएल-एन सरकार की राह देख रहे हैं.”
स्तंभकार मुर्तज़ा हैदर डॉन अख़बार में लिखते हैं, “लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, करीब-करीब पूरी तरह तबाह आधारभूत ढांचा, बिजली कटौती, ईंधन की कमी, बेरोज़गारी और आतंकी हिंसा... कुछ चुनौतियों में से हैं जिनका सामना नई सरकार को करना होगा.”
शरीफ़ ने इन मुद्दों से निपटने के लिए कई वादे किए हैं. लेकिन हैदर कहते हैं कि उन्हें सावधानी से आगे बढ़ने चाहिए, “कुछ ही महीनों में सबको नौकरी, 90 दिन में भ्रष्टाचार का खात्मा, बिजली कटौती पर जल्दी- ये ऐसे वादे हैं जिन्हें कोई भी सरकार इतनी जल्दी पूरा नहीं कर सकती.”
एक अन्य स्तंभकार तारिक रहमान भी एक्सप्रेस ट्रिब्यून में बिजली की कमी और अर्थव्यवस्था की चुनौतियों की बात करते हैं.
पाकिस्तान टुडे हिंसा की धमकियों के बावजूद मतदान करने के लिए लोगों की तारीफ़ करता है. अख़बार कहता है कि नई सरकार को इस इशारे को समझकर सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर आतंकवाद पर रोक लगानी चाहिए.
डेली टाइम्स कहता है, “यह मुद्दा (आतंकवाद) उन्हें (नवाज़ शरीफ़) सेना के साथ ज़रूरी तालमेल बैठाने का मौका देगा.”
द नेशन अख़बार कहता है कि आतंवाद का शैतान एक डरावनी हकीकत बन गया है और इससे निपटने के लिए एक सोची-समझी रणनीति की ज़रूरत है.
सुलह की पहल
नवाज़ शरीफ़ ने पड़ोसी देशों भारत, अफ़गानिस्तान और ईरान के साथ ही अमरीका से भी बेहतर संबंध बनाने की वकालत की है.
पाकिस्तान में मीडिया उनके इस विचार का व्यापक तौर पर समर्थन कर रहा है.
डेली टाइम्स कहता है, “विकास और समृद्धि के लिए पाकिस्तान को अपने घर और क्षेत्र में शांति चाहिए.”

अख़बार यह भी कहता है कि शरीफ़ भारत के साथ संबंध सुधारने की बात कर रहे हैं लेकिन उनकी प्राथमिकताओं में अफ़गानिस्तान सबसे ऊपर होना चाहिए क्योंकि 2014 में अमरीकी सैनिक वहां से जा रहे हैं.
बिज़नेस रिकॉर्डर के अनुसार, “भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को लेकर शरीफ़ सही दिशा में हैं.”
एक्सप्रेस ट्रिब्यून कहता है, “उन्हें अपनी सुलह की नीति को आगे बढ़ाना होगा जिसके परिणाम स्वरूप अटल बिहारी वाजपेयी (भारत के पूर्व प्रधानमंत्री) ऐतिहासिक यात्रा में लाहौर आए थे.”
अख़बार आगे कहता है, “उन्हें पाकिस्तानी सैनिकों की जान बचाने के लिए एकतरफ़ा तौर पर सियाचिन से उन्हें हटा लेना चाहिए. उन्हें कश्मीर पर शांति बनाने की भी पहल करनी चाहिए.”
भारत और ईरान
भारतीय मीडिया भी यह उम्मीद ज़ाहिर कर रहा है कि वह क्षेत्र में शांति की कोशिश करेंगे.
द हिंदू अख़बार कहता है कि शरीफ़ के “भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर संबंधों की स्पष्ट और मजबूत बात से” काफ़ी उम्मीद बंधती है.
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, “भारत के साथ संबंध सामान्य करना शरीफ़ के उन दो चीज़ों के हिसाब से ठीक है जिन पर शरीफ़ आने वाले वक्त में ध्यान देना चाहेंगे- भारत के साथ आर्थिक संबंध मज़बूत बनाना और पाकिस्तानी सेना को नागरिक सरकार के नियंत्रण में लाना.”
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, “शरीफ़ की सत्ता में वापसी से भारत-पाकिस्तान के बेहतर संबंधों की उम्मीद जगी है क्योंकि उन्होंने वादा किया था कि वह जीते तो संबंध बेहतर करने के लिए काम करेंगे.”
ईरान में ज़्यादातर प्रतिक्रिया मुबारकबाद की है. सुधारवादी अख़बार एत्माद लिखता है कि तालिबान की हिंसा की धमकियों के बावजूद चुनाव हुए जो शांतिपूर्ण भविष्य के लिए एक अच्छा संकेत है.
संशय में अफ़गानिस्तान

अफ़गानिस्तान में जानकारों ने शरीफ़ की जीत पर चेतावनी दी है.
टोलो टीवी पर सैन्य विश्लेषक जावेद कोहेस्तानी कहते हैं, “नवाज़ शरीफ़ पाकिस्तान की सारी अस्थिरता को अफ़गानिस्तान में धकेलने की कोशिश करेंगे.”
इसी चैनल पर चर्चा में भाग लेते हुए राजनीतिक विश्लेषक ताहेर हाशमी ज़्यादा सख़्त शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, “वे (नवाज़ शरीफ़) अफ़गानिस्तान की राजनीतिक स्थिरता पर यकीन नहीं करते.”
अफ़गानिस्तान के क्षेत्रीय शोध केंद्र के प्रमुख ग़फ़ूर लेवाल ने चैनल वन से कहा, “इस चुनाव के बाद... पाकिस्तान की नागरिक सरकार और सेना का रुख अमरीका विरोधी और अफ़गानिस्तान के समर्थन का हो जाएगा.”
खुर्शीद टीवी पर सांसद महमूद दानेशजु कहते हैं, “दुर्भाग्य से पाकिस्तान में हुई घटनाएं अफ़गानिस्तान के हक़ में नहीं हैं.”
(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. <link type="page"><caption> बीबीसी मॉनिटरिंग की अन्य खबरों को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें</caption><url href="http://www.monitor.bbc.co.uk/" platform="highweb"/></link>. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की खबरें <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/bbcmonitoring" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> फेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/BBCMonitoring" platform="highweb"/></link> पर भी पढ़ सकते हैं.)












