'पाकिस्तान का इस्तक़बाल करें लोकतांत्रिक देश'

पाकिस्तान के चुनाव में हिस्सा लेने वाले सभी राजनीतिक दलों का कहना है कि वे भारत के साथ बेहतर रिश्ता कायम करना चाहते हैं. हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान न तो भारत और न ही कश्मीर के बारे में कोई खास बात की गई.
यह एक अनोखा चुनाव है जिससे यह संदेश मिल रहा है कि जो भी पार्टी सत्ता में आएगी वह भारत के साथ अपने ताल्लुक बेहतर करने की कोशिश करेगी. मेरे ख्याल से अब उनकी मानसिकता बदल रही है.
उन्हें भी यह महसूस हो रहा है कि भारत को दुश्मन समझने के बजाय अगर रिश्ते को बेहतर बनाया जाए तो इसमें उनका ही फायदा है.
हालांकि वहां अमरीका को लेकर आम जनता में गुस्सा है क्योंकि अमरीकी ड्रोन का शिकार वहां की आम जनता बनी है.
सबका कहना है कि भारत-पाकिस्तान के बीच कई मसले हैं लेकिन इसका हल जंग से नहीं बल्कि बातचीत से निकाला जा सकता है.
मुझे लगता है कि जिस तरह पाकिस्तान में लोगों की मंशा में बदलाव आया है वैसा बदलाव भारत में नहीं देखा जा रहा है. हम पुरानी बातों पर ही टिके हुए हैं.
मैं मानता हूं कि जो भी पार्टी सत्ता में आए हमें उसके साथ वार्तालाप करना चाहिए और इसे जारी रखने की कोशिश करनी चाहिए तभी मसलों का हल निकल पाएगा.
इमरान खान पर इस तरह के इल्ज़ाम लगाए गए हैं कि सैन्य प्रतिष्ठान से उनके नज़दीकी संबंध होंगे लेकिन मुझे नहीं लगता है कि वह कठपुतली की तरह काम करेंगे. मेरे नजरिये में हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पाकिस्तान की सत्ता में पीएमएल (एन), पीटीआई या पीपीपी आए.
नवाज़ शरीफ ने अपने भारतीय टेलीविज़़न के साक्षात्कार में यह संकेत दिया कि वह भारत के साथ 1999 के बाद से बंद पड़े मामले की फिर से शुरुआत करना चाहते हैं.
लेकिन जब वार्तालाप शुरु होता है तो दोनों पक्षों को यह समझना चाहिए कि थोड़ा बहुत अंतर आने वाले है और उसी के आधार पर हल निकल सकता है. मुझे लगता है कि जिस तरह पाकिस्तान में लोगों की मंशा में बदलाव आया है वैसा बदलाव भारत में नहीं देखा जा रहा है. हम पुरानी बातों पर ही टिके हुए हैं.
मुझे लगता है कि जिस तरह पाकिस्तान में लोगों की मंशा में बदलाव आया है वैसा बदलाव भारत में नहीं देखा जा रहा है. हम पुरानी बातों पर ही टिके हुए हैं.
यही भावना दूसरी पार्टियों में भी है. मुझे लगता है कि यदि उनके संसद में भी भारत के साथ बातचीत से जुड़े मसले पर चर्चा शुरू होती है तो सभी पार्टियों का समर्थन मिलेगा. इस माहौल का फायदा उठाना भारत के हित में है.
हालांकि वहां चुनाव प्रचार के वक्त कश्मीर पर कोई बात नहीं की गई इसका मतलब यह नहीं है कि कश्मीर को लेकर हमारे बीच कोई मतभेद नहीं है. हालांकि उन्होंने इस मुद्दे को भावनात्मक लहज़े में दोहराया नहीं है.
पाकिस्तान में हो रहे चुनाव को लेकर दिख रहे उत्साह की अगर भारतीय चुनाव से तुलना की बात हो तो मैं यह कहूंगा कि दो साल पहले कश्मीर के जो पंचायत चुनाव हुए थे उस वक्त भी उम्मीदवारों और जनता को चरमपंथियों ने जान से मारने की चुनौतियां मिली थीं.
इसके बावजूद कुपवाड़ा और पुलवामा जैसे इलाकों में भी 70-80 फीसदी लोगों ने बड़े उत्साह से बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया.
कुछ ऐसा ही रुझान पाकिस्तान में देखने को मिला. पाकिस्तानी जनता दिखा रही है कि उन्हें फौज का शासन पसंद नहीं है और वे यह भी संकेत दे रहे हैं कि उनका तालिबान से कोई लेना-देना नहीं है.
उनको लगता है कि पाकिस्तान के चुनाव में अगर कोई कप्तान है तो वह वहां की आवाम है जो कह रही है कि जम्हूरियत की जंग में जम्हूरियत को ही जीतना चाहिए.
लोकतांत्रिक देशों की बिरादरी को अब पाकिस्तान का इस्तबाल करने के लिए तैयार रहना चाहिए.
(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे के साथ हुई बातचीत पर आधारित)
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