बॉस्टन धमाका:अमरीकी मुसलमानों पर आफत

<link type="page"><caption> बॉस्टन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130419_boston_suspects_pp.shtml" platform="highweb"/></link> धमाके के बाद अमरीका में रह रहे <link type="page"><caption> मुसलमान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/04/130419_boston_bombing_suspects_pictures_sp.shtml" platform="highweb"/></link> मानसिक तौर पर इस बात के लिए तैयार हैं कि अगर ऐसा करने वाले लोग उनके मज़हब से हैं तो उन्हें इसकी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.
महज़ 10 साल के यूसुफ़ का अनुभव इसकी तस्दीक़ करता है.
बॉस्टन मैराथन धमाके के अगले ही दिन यूसुफ़ के साथ स्कूल में अलग तरह का बर्ताव किया जा रहा था. वह ओहायो के अपने स्कूल पहुंचा तो उसके साथी के सवाल ने उसे चौंका दिया.
यूसुफ से कुछ इन शब्दों में ये चौंकाने वाला सवाल पूछा गया, "क्या इसका मतलब यह हुआ कि यूसुफ इस स्कूल को धमाके में उड़ाने जा रहा है?"
यह बात यूसुफ के माता-पिता ने हमें बताई. उन्होंने हमसे यूसुफ का सरनेम न ज़ाहिर करने की भी गुज़ारिश की.
'ग़ैरवाजिब रवैया'
जब यह सब हो रहा था उस वक़्त यूसुफ़ अजीब सी उलझन में फंस गया. उसने अपने साथी का सवाल दोहराया और थोड़ी नोंक-झोंक हुई और फिर उसके लॉकर की तलाशी ली गई.
यूसुफ की कहानी बिल्कुल वैसी ही थी जिसकी अनुम हुसैन को आशंका थी. मुस्लिम समुदाय की बेहतरी के लिए काम करने वाले हुसैन की परवरिश सितंबर 11 के बाद के माहौल में हुई है.
हुसैन कहती हैं, "सबसे अफसोस की बात यह है कि लोगों ने पहले से ही गैरवाजिब रवैया अपना लिया है. हम सभी सांसत में हैं और प्रार्थना कर रहे हैं कि जिसने भी यह सब कुछ किया है वह मुसलमान न हों. एक आदमी की हरकत के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने से हम थक चुके हैं."
यह भावना अमरीका में रह रहे अरब, अफ्रीका, एशियाई और सिख समुदाय के लोगों में भी व्याप्त है.
संदिग्ध व्यक्ति

हालांकि सभी मुसलमान ऐसा नहीं मानते. कुछ लोगों का कहना है कि बॉस्टन हमलों के बाद जांच अधिकारियों का उनके प्रति अपनाए जाने वाले रवैये में नरमी और संयम का भाव देखा जा रहा है.
नॉर्थईस्टर्न युनिवर्सिटी की इस्लामिक सोसायटी की बैठक के बाद एक महिला ने बीबीसी से कहा, "यह हमारे देश के नेतृत्व से शुरू से होता है और अगर वे इसे आहिस्ता-आहिस्ता कर पाए तो लोगों पर इसका असर पड़ेगा."
उन्होंने कहा, "यहां तक कि पिछले सालों के बनिस्बत खबरों और इंटरनेट पर मौजूद लेखों में नर्म तेवर देखा जा रहा है. लोग यह समझ रहे हैं कि सारे मुसलमान बुरे नहीं होते."
साउदी नागरिक पर संदेह
यूसीएलए स्कूल ऑफ लॉ के फेलो खालेद बेदाउ कहते हैं, "सितंबर 11 के बाद जो थोड़े बहुत हालात सामान्य हुए हैं उसके बावजूद यह सब कुछ खत्म हो जाएगा अगर हमलावर किसी आतंकवादी की छवि में फिट बैठता हो."
सोमवार के बम हमलों के बाद से ही मुसलमान आम लोगों की नजरों में आ गए. मीडिया में आई अपुष्ट खबरों में जल्दी ही एक साउदी नागरिक पर संदेह जाहिर कर दिया गया लेकिन बाद में यह साफ हो गया कि उसका इन हमलों से किसी तरह का कोई लेना-देना नहीं था. वह धमाकों का महज एक शिकार भर था.
कई लोगों का यह भी कहना है कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि बम हमलों के लिए दोषी आदमी का मजहब क्या है.
खालेद बेदाउ कहते हैं कि इस बात का बड़ा असर होगा.
उम्मीदें बरकरार

खालेद पूछते हैं, “क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है कि वह एक काकेशियाई महिला है.”
वह कहते हैं, “नहीं, शायद नहीं... लेकिन क्या अमरीका में रह रहे लाखों मुसलमानों को इससे फर्क पड़ता है? हां, फर्क पड़ता है.”
हालांकि अनुम हुसैन बम हमलों के बाद हुई कुछ प्रतिक्रियाओं से निराश हैं लेकिन बॉस्टन के लोगों से मिले समर्थन की वजह से वह खुश भी हैं. उनकी उम्मीदें बरकरार हैं कि एफबीआई की जांच से निष्पक्ष नतीजे निकलेंगे.
अनुम हुसैन ने अपनी उम्मीदें इन शब्दों में जाहिर की, “मुझे उम्मीद है कि इन आतंकवादी हरकतों के लिए चाहे गोरा हो या काला या मुसलमान कोई भी जिम्मेदार हो, लोग समझदार बने रहेंगे. लोग इस बात को समझ लेंगे कि बम हमलों का किसी समूह या धर्म से कोई रिश्ता नहीं होता.”












