दूसरे विश्वयुद्ध में क्रैश हुए बॉम्बर की कहानी, जीवित बचे छह लोगों को झेलनी पड़ी लंबी यातना

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, एलेक्स मुरे
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान एक मई 1943 को एक विमान नीदरलैंड में गिर गया. इस विमान में क्रू के अधिकांश सदस्य कनाडा के थे.
इस प्लेन क्रैश के क़रीब 80 साल बाद बीबीसी ने इस घटना में बचे लोगों और उनके परिजन से बात की. बीबीसी के 'वी वर देयर' प्रोजेक्ट में उन ब्रिटिश सैनिकों की कहानियां प्रकाशित होती हैं जिन्होंने मुश्किल लड़ाई लड़ीं.
जैनेट रीले को एक मई का वो दिन अभी भी याद है जो उनके परिवार की तकदीर बदलने वाला था.
उनके पिता 'मैक' रीले अक्सर अपने दोस्त ('बडी') मैक्कैलम को फ़ोन लगाकर उन दिनों की बातें करते हैं, जिसने उनकी नौजवानी और बाद के दिनों को बदल कर रख दिया था.
जिस 'महान पीढ़ी' ने दूसरा विश्वयुद्ध लड़ा उनमें से कुछ ही बचे, उन घटनाओं को बताने के लिए.
अब उनकी उस याद को संजो के रखने की ज़िम्मेदारी अगली पीढ़ी की है.
ये कहानी भारी बमवर्षक विमान हेंडले पेज हैलीफ़ैक्स के क्रू की है जिसमें अधिकांश सदस्य कनाडा के थे और रुअर के युद्ध के दौरान इस विमान ने यूरोप के आसमान में उड़ान भरी थी.
ये विमान गठबंधन सेनाओं के 8,000 विमानों में से एक था जो बमबारी की कार्रवाई में नष्ट हो गए.
बचे हुए लोगों, उनके परिजन और कनाडा के बॉम्बर कमांड म्यूज़ियम के रिकॉर्ड के आधार पर बीबीसी ने उस पूरी घटना को संयोजित किया है कि कैसे विमान क्रैश हुआ, उन्हें नाज़ियों ने कैसे पकड़ा और वो कैसे बचे.
क्रू के मुख्य सदस्य एंडी हार्डी, मैक्कैलम और रीले ने जुलाई 1942 में पहली बार साथ काम किया था. 1943 की गर्मियों में उनके साथ टेल गनर रेड ओ'नील, फ़्लाइट इंजीनियर केन कैलोपी और अपर गनर रॉर्म वीलर भी जुड़ गए. इस क्रू में कैलोपी और वीलर ही कनाडा से नहीं थे.
इनके साथ फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट हर्बर्ट फ़िलिप्सन एटकिंसन थे, जिन्हें रॉयल कैनेडियन एयर फ़ोर्स का सबसे अच्छा पॉयलट माना जाता था.
कनाडा के बॉम्बर कमांड म्यूज़ियम के रिकॉर्ड के अनुसार, उनके स्क्वाड्रन में हताहतों की दर बहुत अधिक थी. इस तरह की कार्रवाइयों में आरसीएफ़ के केवल 15% क्रू की जान बच पाई.

इमेज स्रोत, JANET REILLEY
मिशन की वो रात...
30 अप्रैल 1943 को छह क्रू सदस्यों के साथ बमवर्षक लड़ाकू विमान को एक बहुत मुश्किल मिशन दिया गया.
उन्हें उसी रात को जर्मनी के रुअर शहर के एसेन में स्टील फ़ैक्ट्री पर बम बरसाने थे, जो कि जर्मनी के सैन्य साजो सामान बनाने के लिए बहुत ही अहम जगह थी.
विमान को जल्द निकलना था लेकिन उस समय इंग्लैंड के आसमान में धुंध की वजह से उन्होंने आधी रात को उड़ान भरी.
रात के तीन बजे थे जब एटकिंसन ने बम गिराने के लिए दरवाज़ों को खोलने का आदेश दिया. उस समय विमान स्टील फ़ैक्ट्री की विशाल भट्ठी के ऊपर था, जहां हज़ारों सर्चलाइटें जल रही थीं और एसेन की सुरक्षा में एंटी एयरक्राफ़्ट तोपों से भारी फ़ायरिंग हो रही थी.
अचानक नेविगेशन अफ़सर हार्डी चिल्लाए, "मुझे गोली लगी है." एंटी एयरक्राफ़्ट का एक गोले ने उनके दाहिने पैर को उड़ा दिया था.
मैक्कैलम ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, उन्हें बाम्बर जैकेट में लपेटा और मार्फ़ीन का इंजेक्शन दिया. लेकिन हार्डी को बचाया नहीं जा सका.
चूंकि नेविगेटर की मौत हो गई तो एटकिंसन ने रीले से बमों को तुरंत गिरा कर टार्गेट से दूर ले जाने में दिशा बताने में मदद करने को कहा.
मुश्किल ये थी कि हार्डी का लॉग और नक्शा उनके खून से धुंधला हो गया था. उसे पढ़ा नहीं जा सकता था.
इसलिए रीले ने इंग्लैंड तक लौटने के लिए तारों से दिशा का सहारा लिया.

इमेज स्रोत, MICHAEL ATKINSON
लेकिन क़िस्मत जवाब दे गई...
इसी बीच फिर कोई चिल्लाया, तोप के गोलों ने विमान के ईंधन की टंकी को हिट किया था.
वीलर ने वो पल याद किया, "हर जगह आग दिख रही थी."
मैक्कैलम ने बताया, "कैप्टन ने पहले जहाज को नीचे किया और फिर उसे ऊपर की ओर ले गए, इससे आग थोड़ी सी बुझी, लेकिन इसके बाद दोबारा आग भड़क गई और विंग पर फैल गई. हम लोग जहाज की रफ़्तार के कारण झुक गए थे."
विमान को डाईव लगाने के एटकिंसन के फैसले एक बात हुई, विमान का रुकना या चक्कर खाकर गिरना रुक गया, इससे क्रू को संभलने का समय मिल गया.
रीले और ओ'नील इससे पहले भी अक्टूबर 1942 के क्रैश में अकेले सर्वाइवर थे. वो घटना कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में माउँट हुडेमा में हुई थी. इसमें मारे गए पायलट के नाम पर इस जगह का नाम रीले ने रखा.
इस इलाक़े में क़रीब 950 ऐसी जगहें हैं जिनका नाम द्वितीय विश्वयुद्ध से जुड़ा है.
विमान से अंतिम कूदने वाले व्यक्ति थे कैलोपी, जबकि एटकिंसन विमान उड़ा रहे थे ताकि बाकी क्रू सुरक्षित निकल सके. एटकिंसन बच नहीं पाए.
लेकिन क्रू के छह सदस्य नीदरलैंड के एल्स्ट इलाक़े में पेड़ों के बीच उतरे, जहां उन्हें युद्धबंदी बना लिया गया.

इमेज स्रोत, Getty Images
क़ैद में रहते हुए...
इस घटना के सालों बाद वीलर ने याद किया कि कैसे वे ऐसी जगह उतरे जहां गायें थीं. वो अपने ऊपर वापस जाते बमवर्षक विमानों की आवाज़ सुन सकते थे और उन्हें दुख हुआ क्योंकि वो जानते थे कि आगे क्या होगा.
इन लोगों को अलग करके नाज़ी नियंत्रित इलाक़ों के अलग अलग कैंपों में भेज दिया गया.
कैलोपी और ओ'नील को उत्तरी जर्मनी, मैक्कैलम को क़ब्ज़ा किए गए लिथुआनिया और रीले, नर्स और वीलर को कब्ज़ाए गए पोलैंड में भेजा गया.
एक अफ़सर के रूप में रीले स्टैलैग लुफ्त 3 गए, जहां कै़द से निकल भागने की कोशिशें हुईं, उसी के आधार पर हॉलीवुड फ़िल्म 'द ग्रेट स्केप' बनी है.
क़ैदियों के रहने वाले क्वार्टरों से कैंप के बाहर जंगल में तीन सुरंगे खोदने की घटना को इस फ़िल्म में नाटकीय रूप दिया गया है.
लेकिन असल में योजना थी कि इस सुरंग से रॉयल एयर फ़ोर्स के 200 जवानों को जाली दस्तावेजों और नागरिक वेशभूषा के सहारे कैंप से निकाला जाए. ये सारे दस्तावेज कैंप में ही बनाए गए थे.
लेकिन केवल 76 अफ़सर ही इस सुरंग के रास्ते निकल भागने में क़ामयाब रहे और केवल तीन पकड़े जाने से बच निकले. बदले की कार्रवाई में गेस्टापो ने 50 अफ़सरों को मार डाला.
निकलने वालों में रीले का नंबर 86वां था, लेकिन जिस सुरंग को बनाने में उन्होंने मदद की थी, उसमें उन्हें जाने का मौका नहीं मिला.
शुरुआत में तो उन्हें ये भी पता नहीं चला कि वो सुरंग खोदने वाले समूह में शामिल होने जा रहे हैं. उन्होंने सोचा था कि ये एक क्रिकेट लीग है.

इमेज स्रोत, LINCOLN JOURNAL STAR
विमान से कूदने के दौरान उनके घुटने और एड़ी में चोट लगी थी. रीले बताते हैं, "मेरी ज़िम्मेदारी थी कि सुरंग खोदकर जो मिट्टी बाहर लाई जाती थी उसे छुपाया जाए. हालांकि जब मेरा घुटना जख़्मी था तो मैंने खुफ़िया वाले काम भी किये थे."
जब अन्य कैदियों के साथ उन्हें मार्च करना पड़ता था तो घुटना और तकलीफ़ देता था. युद्ध के अंत में ठंड के हालात और मुश्किल थे.
जब बड़े शहरों पर अंतिम निर्णायक हमला हो रहा था, तो बमबारी से बचने के लिए नाज़ी उन्हें मानव कवच की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे.
बचे हुए लोगों ने चार महीने तक सैकड़ों मील पैदल ही तय किया. इस दौरान उन्होंने भूख, थकान, पकड़े जाने या गोली मारे जाने जैसे सारे ख़तरों का सामना किया.
मैक्कैलम बताते हैं कि उन्होंने हाड़ कंपा देने वाली ऐसी ठंड का कभी सामना नहीं किया था.
एक बार तो ऐसा भी हुआ कि जर्मन यूनिट समझ कर अपने ही गठबंधन विमानों से मारे जाने का ख़तरा पैदा हो गया.
मैक्कैलम कहते हैं कि बिना मोजे के पैदल चलने से जो घाव हुए उसके निशान पूरी ज़िंदगी बने रहेंगे. इस पैदल मार्च में कैलोपी और ओ'नील नहीं थे.
विमान दुर्घटना के दो साल और एक दिन बाद रीले को उत्तरी जर्मनी के लुबेक से चेशायर रेजिमेंट के द्वारा आज़ाद कराया गया.
युद्ध शुरू होने के वक़्त से उनका वज़न 25 किलो कम हो गया था. मैक्कैलम को एल्बे नदी के किनारे से बचाया गया, जबकि वीलर को म्युनिख से निकाला गया.

इमेज स्रोत, THE MACCALLUM FAMILY
युद्ध के बाद ज़िंदगी...
ज़िंदा वापस आने वाले सभी छह लोगों की उम्र 20 से 30 साल के बीच थी. ये लोग युद्ध में हिस्सा लेने के लिए कनाडा से निकले थे.
मैक्कैलम के लिए घर लौटने का मतलब था रोज़मैरी से शादी करना. वे युद्ध से पहले मिले थे और तय किया था कि वापस लौटने के बाद शादी करेंगे. उन्होंने 14 जुलाई 1945 को शादी की.
मैक्कैलम 18 साल के थे जब वो सीधे स्कूल से सेना में भर्ती होने चले गए थे. इलेक्ट्रीशियन के तौर पर उनकी ट्रेनिंग हुई थी. उन्होंने अपने नए परिवार के लिए एक घर बनवाया.
शुरुआती में काम पाने में अपने ससुर से मदद मिलने के बाद बडी और रोज़ ने अपनी ज़िंदगी अपने गृह जनपद ग्राफ़्टन कस्बे में शुरू की.
कैलोपी अपने पारिवारिक कृषि फ़ार्म में लौट आए जो फ्रोबिशर गांव के किनारे था, जिसकी आबादी उस समय 150 थी.
उनकी तरह जीवन फिर से शुरू करने का मौका उन 17,000 लोगों को नहीं मिला जिन्होंने सेना में जाने के लिए वालंटियर किया था.
लेकिन उनके अनुभवों और भावनाओं में उन लोगों की स्मृतियां बनी रहीं.
रीले की बेटी जेनेट याद करती हैं कि कैसे उनके पिता ने शराब पीना छोड़ दिया जब वो तीन साल की थीं. जबकि विमान क्रैश, क़ैद के समय यातना और पैदल मार्च के दुःस्वप्न को भुलाने के लिए वो इसके आदी हो गये थे.

इमेज स्रोत, JANET REILLEY
1950 के दशक में उन्हें इस सदमे के कारण दो बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.
रीले ने बताया, "आधी रात के वक्त जब नींद नहीं आती है और धुंधली यादें ताज़ा होती हैं तो मैं सोचता हूं कि क्या ये सब सही था. फिर भी, ईमानदारी से कहूं तो इनसबके बावजूद मैं खुश हूं कि मैंने वालंटियर किया था."
जैनेट रीले को उम्मीद है कि वायेन मैक्कैलम के साथ वो युद्ध के दौरान बने पारिवारिक रिश्ते को ज़िंदा रख सकेंगी.
अस्सी साल बीत चुके हैं, लेकिन ये याद बनी रहेगी कि उस 'महान पीढ़ी' ने शांति के लिए क्या कुछ कुर्बान किया और क्या देकर गए.
ये भी पढ़ेंः-
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर,इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















