अवैध प्रवासियों पर कड़ाई: ब्रिटेन क्या कर रहा है ऑस्ट्रेलिया की नकल

यूके के प्रधानमंत्री

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    • Author, टिफ़नी टर्नबुल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इंग्लिश चैनल को पार कर देश में घुसने वाली छोटी नावों को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार नया इमिग्रेशन बिल ला रही है.

नई नीति के लिए जो नारा सुर्खियां बटोर रहा है करीब वैसा ही नारा एक दशक पहले ऑस्ट्रेलिया में सुनाई दिया था.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक से 'नावों को रोकने' की बात सुनना ऑस्ट्रेलिया के कई लोगों के लिए नया नहीं है. वो ऐसा ही दौर पहले देख चुके हैं.

एक दशक पहले ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी एबॉट ने ऐसे ही शब्दों का इस्तेमाल किया था जिससे उन्हें चुनाव जीतने में मदद मिली थी.

उस वक्त ऑस्ट्रेलिया के सामने वैसी ही स्थिति थी जैसे कि इस वक्त ब्रिटेन के सामने है.

पिछले साल 45 हज़ार से ज़्यादा प्रवासी छोटी नावों की मदद से इंग्लिश चैनल को पार कर ब्रिटेन पहुंचे.

2013 में ऑस्ट्रेलिया के लोगों ने देखा कि 20 हज़ार प्रवासी इंडोनेशिया, ईरान और श्रीलंका जैसे देशों से इसी तरह की ख़तरनाक यात्राएं करके उनके देश आए थे.

इस तरह की ख़तरनाक यात्राओं के दौरान कई लोग बीच रास्ते में ही मारे भी जाते हैं. ऑस्ट्रेलिया में उस वक्त चुनाव अभियान के दौरान दक्षिणपंथी लिबरल पार्टी के नेता टोनी एबॉट ने नावों को रोकने के लिए कड़े सीमा नियमों को लागू करने का वादा किया था.

उनकी 'ऑपरेशन सॉवरेन बॉर्डर्स' नीति के तहत, प्रवासी नावों का पता लगाकर उन्हें वहीं वापस भेज दिया जाता था, जहां से वे चली थी या फिर नावों में मौजूद लोगों को विदेशी द्वीपों पर बने डिटेंशन सेंटर में भेज दिया जाता था.

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री टॉनी एबॉट

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फिर सुनाई दिए वो तीन शब्द

मानवाधिकार समूह लंबे समय से ऑस्ट्रेलिया की बॉर्डर पॉलिसी की आलोचना करते रहे हैं लेकिन डेनमार्क जैसे दूसरे देश इस नीति से प्रेरित हैं.

साल 1970 में नाव के ज़रिये वियतनाम से ऑस्ट्रेलिया भागकर आए ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के लेक्चरर किम ह्येनह कहते हैं,"ऑस्ट्रेलिया ने पूरी तरह से इस प्लेबुक को लिखा है और हम अभी भी इसे लिख रहे हैं."

ब्रिटेन में कंजरवेटिव्स ने पहले से ही ऑस्ट्रेलिया जैसे 'प्वाइंट बेस्ड इमिग्रेशन सिस्टम' को अपनाया हुआ है लेकिन सवाल है कि इस बार वे किस हद तक ऑस्ट्रेलिया के पीछे चल रहे हैं?

ब्रिटेन ने ऑस्ट्रेलिया के 'नावों को रोको' नारे को पूरा का पूरा कॉपी कर लिया है. इसके साथ ही इसे लेकर बयानबाजी और इस्तेमाल किए जानी वाली भाषा भी आश्चर्यजनक रूप से एक जैसी है.

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व गृह मंत्री पीटर डटन ने कई बार कहा है कि देश ने हत्यारों, बलात्कारियों और बाल यौन शोषण करने वालों को नाव के जरिए शरण लेने से रोक दिया है.

साल 2017 में उन्होंने बयान दिया था कि ऑस्ट्रेलिया में शरण लेने वाले नकली शरणार्थी थे जो ऑस्ट्रेलियाई करदाताओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे. इस बयान के बाद उन्हें काफी आलोचना का सामना करना पड़ा.

ब्रिटेन की गृह मंत्री सुएला ब्रेवरमैन ने कहा था कि उनका काम दक्षिणी तट पर 'नावों के जरिए होने वाले आक्रमण को रोकना है.'

2022 के आखिर में ब्रिटेन आने वाले अल्बानियाई लोगों की संख्या में गिरावट आई है. पिछले हफ्ते सांसदों को बताते हुए उन्होंने कहा था कि अल्बानिया जैसे सुरक्षित देशों से आने वाले प्रवासियों में से कई सारे युवा पुरुष थे. ये युवा पुरुष देश में घुसने के लिए आपराधिक गिरोहों को हजारों पाउंड देने में सक्षम थे.

ब्रिटेन

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डॉ. किम ह्येनह कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में एक जैसी भाषा सुनाई देती है क्योंकि दोनों देशों की आबादी की मानसिकता एक जैसी दिखाई देती है और यह राजनीतिक रूप से काम करती है. ये बाहरी लोगों में डर का भाव पैदा करती है.

और फिर इसकी मार्केटिंग होती है और दोनों देश मानवीय मदद पर जोर देने की बात करते हैं.

ब्रेवरमैन ने पिछले हफ्ते संसद को बताया था कि ब्रिटेन की सरकार दृढ़ संकल्प, संवेदना और समानता के साथ काम कर रही थी, जबकि 2014 में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने एक ऐसी नीति की बात की थी जो लोगों का जीवन बचा रही थी.

उन्होंने कहा था, "जब तक नौकाएं आती रहेंगी, समुद्र में लोग मरते रहेंगे, ऐसे में सबसे सभ्य, मानवीय और दया की चीज जो आप कर सकते हैं वो है नावों को रोकना."

प्रवासियों को लेकर आती नाव

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नीति में क्या समानताएं हैं?

ब्रिटेन के सामने माइग्रेशन के मुद्दे वैसे नहीं हैं जैसे ऑस्ट्रेलिया ने दस साल पहले देखे हैं. इसलिए जो नीति ब्रिटेन बना रहा है वो बिल्कुल वैसी नहीं है जो ऑस्ट्रेलिया में टोनी एबॉट के समय थी. बावजूद इसके तुलना की जा सकती है.

ऑस्ट्रेलियाई नीति नाव से आने वालों प्रवासियों को पापुआ न्यू गिनी और प्रशांत क्षेत्र के नौरू द्वीप में बने डिटेंशन सेंटर भेजने की थी. इसमें प्रवासियों को उनके देश लौटने की पेशकश की गई और मान्यता प्राप्त शरणार्थियों को कहीं और पुनर्वास करने को कहा गया.

अब नावों का आना बंद हो गया है और 2014 के बाद से किसी को भी बाहर के द्वीपों पर बने डिटेंशन सेंटर में नहीं भेजा गया है.

ब्रिटेन सरकार अवैध रूप से आने वाले लोगों को उनके देश में वापस भेजना चाहेगी, नहीं तो शरण मांगने वालों को तीसरे किसी देश में भेजा जाएगा, जो शरणार्थियों के लेने के लिए तैयार हैं.

इसमें अठारह साल के कम उम्र के बच्चे, जो स्वास्थ्य कारणों से विमान यात्रा नहीं कर सकते या जिस देश से उन्हें निकाला जा रहा है वहां उनकी जान को गंभीर खतरा है तो उन्हें बाहर ले जाने का समय दिया जाएगा.

अब तक रवांडा एकमात्र देश है जो प्रवासियों को लेने के लिए सहमत हुआ है. पहले साल वहां 200 लोगों को भेजा जाना था लेकिन कानूनी चुनौतियों के चलते अभी तक वहां कोई नहीं जा सका है.

डिटेंशन सेंटर

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डिटेंशन में रहना ही होगा

ऑस्ट्रेलिया की नीति के अनुसार अभी भी नावों से आने वालों को हिरासत में लिया जाता है और डिटेंशन सेंटर में भेज दिया जाता है.

ज्यादातर लोगों को तभी रिहा किया जाता है जब शरण मांगने के उनके दावे हल हो जाते हैं. ये दावे हल करने के लिए या तो उन्हें वापस भेज दिया जाता है या फिर उनका नाम किसी दूसरे देश में पुनर्वास के लिए बनी लिस्ट में जोड़ दिया जाता है.

ब्रिटेन में प्रस्तावित कानून के तहत प्रवासियों को तब तक रखा जा सकता है जब तक कि गृह मंत्री ये मानती हैं कि उन्हें वापस भेजने की संभावना है. इसमें कम से कम 28 दिनों के लिए जमानत के लिए आवेदन नहीं कर सकते हैं. हालांकि एक बार रवांडा जाने के बाद वो आने और जाने के लिए स्वतंत्र होंगे.

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इमेज कैप्शन, ब्रिटेन में आप्रवासियों के खिलाफ नकारात्मक अभियानों को देखते हुए कुछ लोग सदभावना कार्यक्रम चला रहे हैं

नागरिकता पर रोक

ऑस्ट्रेलियाई सरकार की नीति के अनुसार किसी दूसरे देश में भेजे गए प्रवासी को ऑस्ट्रेलिया में भी दोबारा नहीं बसाया जाएगा, भले ही उन्हें शरणार्थी के रूप में मान्यता मिली हो. हालांकि ये नियम ऑस्ट्रेलिया के कानून में नहीं है.

ब्रिटेन से बाहर निकाले गए लोगों को वापस लौटने पर या भविष्य में ब्रिटिश नागरिकता नहीं दी जाएगी.

साल 2013 में ऑस्ट्रेलियाई नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू समुद्र में नावों को वापस मोड़ना था, जिसका इस्तेमाल 2001 से 2003 के बीच भी हुआ था.

एबॉट सरकार ने ऑस्ट्रेलिया पहुंचने वाली नावों को बीच रास्ते से ही वापस उसी दिशा में मोड़ने का काम किया था जहां से वे चली थी. इससे नावों के ऑस्ट्रेलिया पहुंचने में कमी आई थी. सरकार ने दावा किया था कि उन्हें सुरक्षित तरीके से वापस भेजा गया.

अप्रैल 2022 में ब्रिटेन सरकार ने छोटी नावों को फ्रांस वापस भेजने की योजना को छोड़ दिया क्योंकि रॉयल नेवी ने साथ देने से मना कर दिया था. ब्रिटेन की सेना ने ऑस्ट्रेलियाई सेना की तरह नावों को वापस भेजने के लिए अभ्यास भी किया था.

ब्रिटेन ने 10 मार्च को घोषणा की कि वो समुद्र तटों पर अतिरिक्त पुलिस गश्त और उत्तरी फ्रांस में एक नए डिटेंशन सेंटर के लिए पेरिस को तीन सालों में करीब 50 करोड़ पाउंड देगा.

29 सितंबर 2013 को सिडनी में शरणार्थियों के लिए स्वागत रैली आयोजित की गई

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इमेज कैप्शन, 29 सितंबर 2013 को सिडनी में शरणार्थियों के लिए स्वागत रैली आयोजित की गई

ऑस्ट्रेलिया की नीतिकाम आई?

ऑस्ट्रेलिया का ऑपरेशन सॉवरेन बॉर्ड्स विवादास्पद बना हुआ है. देश में दोनों प्रमुख पार्टियां, दक्षिणपंथी लिबरल और वामपंथी लेबर अभी भी इन नीतियों का समर्थन करती हैं. उनका कहना है कि मिलकर काम करने से ही शरणार्थियों को रोका जा सकता है जिससे देश का भला होगा.

लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि प्रवासियों को किसी दूसरे देश में भेजने से कोई फायदा नहीं हुआ.

2012 में लेबर पार्टी ने इसे फिर से पेश किया और पापुआ न्यू गिनी और नाउरू में प्रवासियों के लिए बनी जगह जल्द भर गईं.

शरणार्थी कानून विशेषज्ञ मैडलिन ग्लीसन कहती हैं, "सरकार कह रही थी कि दो महीने में इतने लोग आ चुके हैं जिन्हें हम किसी दूसरे देश में पुनर्वास नहीं कर पाएंगे, इसलिए हम कुछ लोगों को ऑस्ट्रेलिया में बसाने जा रहे हैं."

और इसलिए लेबर सरकार ने फिर से प्रयास करने से पहले केंद्रों को खाली किया और प्रवासियों को ऑस्ट्रेलिया लाया गया. सरकार ने कहा कि नाव से ऑस्ट्रेलिया में शरण लेने वाले किसी भी व्यक्ति को कभी यहां नहीं बसाया जाएगा, भले ही वे शरणार्थी हों.

ग्लीसन कहती हैं कि इससे नावों की संख्या में कमी नहीं आई है.

जब 2013 के आखिर में लिबरल नेशनल गठबंधन की सरकार सत्ता में आई तो उन्होंने नावों को वापिस करने की नीति का रुख किया. ये वैसा था जिसका लेबर पार्टी ने विरोध किया था. इसके बाद प्रवासी नावों के ऑस्ट्रेलिया पहुंचने में गिरावट दर्ज की गई.

साल 2014 में एक नाव आई थी, इससे पहले के साल में नावों की संख्या 300 थी. इसके बाद से कोई दूसरी नाव ऑस्ट्रेलिया नहीं आई है. हालांकि यह मालूम नहीं है कि कितनी नावों को रोका गया और कितनी नावों को ऑस्ट्रेलियाई तटों पर पहुंचने से पहले ही वापस भेज दिया गया.

2015 में गृह मंत्री पीटर डटन ने कहा कि इन उपायों ने ऑस्ट्रेलिया की सीमाओं की सुरक्षा की है लेकिन इसके लिए उन्हें एक कीमत चुकानी पड़ी है. अनुमान के अनुसार इसके लिए सालाना बजट करीब 65 करोड़ डॉलर रखा गया. इसमें वे बिल भी शामिल हैं जो शरणार्थियों के इलाज पर खर्च किए गए.

डॉ. किम ह्येनह कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया ने दिल और आत्मा के स्तर पर भी कीमत चुकाई है.

ऑफशोर डिटेंशन सेंटर में ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने हिरासत में रखे हुए बच्चों के साथ जो व्यवहार किया उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी आलोचना हुई. संयुक्त राष्ट्र ने उसे यातना जैसे बताया.

ऑस्ट्रेलिया पर शरणार्थियों के प्रति अपने दायित्वों को भूलकर अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया.

नावों को रोकने की तैयारी

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क्या इसी तरह के कदम ब्रिटेन में कारगर होंगे?

ब्रिटेन की गृह मंत्री सुएला ब्रेवरमैन ने स्वीकार किया है कि नई योजना अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाओं को आगे बढ़ाती है.

ब्रिटेन सरकार को बॉर्डर पॉलिसी के मामले में मदद करने वाले ऑस्ट्रेलिया के पूर्व विदेश मंत्री और राजनयिक अलेक्जेंडर डाउनर का कहना है कि नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए देश को अपने कानूनों को बदलना होगा.

संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी यूएनएचसीआर ने पहले ही कहा है कि वह ब्रिटेन सरकार की नई योजना से गंभीर रूप से चिंतित है.

ग्लीसन कहती हैं कि ब्रिटेन के लिए इन नीतियों को ऑस्ट्रेलिया के मुकाबले लागू करना कठिन होगा, क्योंकि ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया से पूरी तरह से अलग है.

ऑस्ट्रेलिया के उन कई देशों के साथ समझौते भी हैं जहाँ से प्रवासी यात्रा करते हैं, लेकिन फ्रांस ने साफ कर दिया है कि ब्रिटेन के साथ इस तरह के समझौते की संभावना नहीं है.

अपने उफान पर साल 2013 में ऑस्ट्रेलिया में नावों की कुल संख्या ब्रिटेन में मौजूदा सालाना आंकड़े के आधे से भी कम थी और उन्होंने देश के सिस्टम को हिला दिया था.

ग्लीसन कहती हैं,"अगर हमारे लिए यह बहुत ज्यादा था तो ब्रिटेन इसे कैसे करेगा?"

वो कहती हैं कि ऑस्ट्रेलिया ने अंतरराष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं. उनके पास ब्रिटेन की तरह मानवाधिकार अधिनियम या मानवाधिकार पर यूरोपीय सम्मेलन के जैसे कानूनी रूप से माने जाने वाले फ्रेमवर्क नहीं है. ऐसे में मुझे लगता है कि यह एक बड़ा कानूनी मुद्दा बनने जा रहा है."

अतिरिक्त रिपोर्टिंग- पॉल केर्ली

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