क्या पुतिन यूक्रेन की लड़ाई हार सकते हैं, क्या रूस टूट सकता है?

व्लादिमीर पुतिन

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

साल 2000 के मार्च के महीने में मॉस्को के एक प्रसिद्ध रेस्तरां में मैं और बीबीसी चीनी सेवा के मेरे एक साथी डिनर करने गए थे. वहां कुछ युवा लड़कियां एक लोकगीत पर नाचती हुई बारी-बारी से हर टेबल पर जा रही थीं और हर टेबल से एक रूसी युवक को डांस फ़्लोर पर लाकर उन्हें सैन्य वर्दी में तैयार कर रही थीं.

विषय युद्ध और लोकगीत रूसी सैनिकों की बहादुरी के क़िस्सों पर आधारित था. पारंपरिक गांव की पोशाक पहने लड़कियाँ युवकों को युद्ध के लिए तैयार कर रही थीं, ठीक उसी तरह जैसे पुराने ज़माने में किया जाता रहा होगा.

बाद में एक रूसी साथी ने हमें इसकी अहमियत बताते हुए कहा कि रूस में घरों और गांवों से युवकों को जंग के मैदान में भेजना देशभक्ति की एक पारंपरिक मिसाल है, देश के लिए बलिदान देना लोक कथाओं का हिस्सा है.

इसकी झलक यूक्रेन पर रूसी आक्रमण में शामिल रूसी सैनिकों में मिलती है, जो रूस के कई प्रांतों, गांवों और शहरों से सेना में शामिल हुए हैं. रूस के बाहर लोगों को इस बात का कम अंदाज़ा है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की यूक्रेन के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई के कारण उनकी लोकप्रियता काफ़ी बढ़ी है.

वीडियो कैप्शन, रूस-यूक्रेन युद्ध: पुतिन अब आगे क्या करने वाले हैं?

उनकी ये लोकप्रियता 22-23 साल पहले चेचन्या के विद्रोह को कुचलने में उनके योगदान के समय भी महसूस की जा सकती थी.

दरअसल, हम साल 2000 में राष्ट्रपति चुनाव पर रिपोर्टिंग करने रूस गए थे.

चेचन्या में विद्रोह को कुचलने के बाद व्लादिमीर पुतिन एक नेशनल हीरो बन गए थे और उनका राष्ट्रपति चुना जाना केवल एक औपचारिकता थी. वो भारी मतों से जीते. लेकिन 23 साल बाद पुतिन के आलोचक कहने लगे हैं कि उनके दौर में देश में लोकतंत्र काफ़ी कमज़ोर हो चुका है और तानाशाही मज़बूत हुई है.

पिछले साल फ़रवरी में यूक्रेन पर हमले के बाद से पश्चिमी देशों में रूसी विशेषज्ञ कहने लगे हैं कि पुतिन की ये सैन्य कार्रवाई देश के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है. उनके अनुसार यूक्रेन में हार के बाद आकार में दुनिया का सबसे बड़ा देश रूस बिखर सकता है, ठीक उसी तरह से जिस तरह से 1991 में सोवियत यूनियन टूट गया था.

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

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रूसी संघ बिखर सकता है?

रूसी मामलों के विशेषज्ञ और लेखक जानुस बुगाज्स्की ने 'फेल्ड स्टेट: ए गाइड टू रूसीज रैप्चर' किताब पिछले साल के अंत में प्रकाशित की थी, जिसमे वो कहते हैं, "ये विरोधाभासी है लेकिन व्लादिमीर पुतिन ने रूस के विघटन को रोकने के लिए सत्ता संभाली थी, लेकिन अब उन्हें देश के पतन के लिए सबसे अधिक याद किया जा सकता है."

ख़ुद रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने भी पिछले एक साल में कई बार पश्चिमी देशों और नेटो पर रूसी संघ के टुकड़े-टुकड़े करके इसे छोटे-छोटे राज्यों में बांटने की कोशिश करने का संगीन आरोप लगाया है.

पिछले महीने के अंत में सरकारी टीवी चैनल 'रोसिया' के साथ एक इंटरव्यू में राष्ट्रपति पुतिन ने कहा कि यह साज़िश सोवियत यूनियन के पतन के बाद से चल रही है.

लेकिन दिलचस्प बात ये है कि राष्ट्रपति एक तरफ़ पश्चिमी देशों पर रूस के टुकड़े करने का इल्ज़ाम लगा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ वे अपने देश का आकार बढ़ाते ही जा रहे हैं.

पिछले साल सितंबर में राष्ट्रपति पुतिन ने मॉस्को में एक रंगारंग समारोह में यूक्रेन के चार प्रांतों, यानी डोनेत्सक, खेरसॉन, लुहांस्क और ज़ापोरीझिया को रूस में शामिल कर लिया. उन्होंने इन प्रांतों में तथाकथित "जनमत संग्रह" आयोजित कराया था. इसी तरह के "जनमत संग्रह" के बाद 2014 में क्राइमिया पर भी 'अवैध रूप से' क़ब्ज़ा कर लिया गया था.

रूसी संघ की सरहदें पूर्वी यूरोप से लेकर पश्चिमी एशिया तक हैं और क्षेत्र के हिसाब से ये दुनिया का सबसे बड़ा देश है. लेकिन 15 करोड़ के साथ इसकी आबादी लगभग बिहार राज्य के बराबर है. रूस की अर्थव्यवस्था दुनिया में नौवें नंबर पर है. पहले रूसी संघ में 83 क्षेत्र, राज्य, शहर और प्रान्त शामिल थे. अब इनकी संख्या 89 हो गयी है. इनमे 21 प्रान्त ऐसे हैं जो ग़ैर-रूसी जातीय अल्पसंख्यक समुदायों के हैं.

जोनाथन पर्लमैन

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जोनाथन पर्लमैन "ऑस्ट्रेलियन फॉरेन अफ़ेयर्स" के संपादक और अपने देश के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

वो कहते हैं, "ऐसा कोई संकेत नहीं है कि अमेरिका रूसी संघ को ख़त्म करने की कोशिश कर रहा है. पुतिन ने पिछले फरवरी में यूक्रेन पर हमला किया, अमेरिका और पश्चिमी देश अब यूक्रेन को समर्थन दे रहे हैं जिसका मकसद है यूक्रेन की रक्षा करना और रूस को उस पर कब्ज़ा जमाने से रोकना."

अजय पटनायक दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रूसी और मध्य एशियाई अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर हैं.

अजय पटनायक

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बीबीसी हिंदी से एक बातचीत में वो कहते हैं, "मेरे हिसाब से रूस नहीं बिखर सकता है. रूस को टूटने के लिए या तो उनके देश में युद्ध हो और वो हार जाए तब ही ये संभव हो सकता है. वियतनाम युद्ध में हार के बाद अमेरिका बिखर नहीं गया. युद्ध हारने के बाद लीडरशिप बदल सकती है लेकिन रूस के हारने की संभावना नहीं है, यदि युद्ध एक डेड एंड पर पहुँच जाता है या अगर रूस कुछ इलाक़ो में हार भी जाता है तब भी उसका असर मामूली ही होगा."

पटनायक के मुताबिक़ रूस में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना भी कम है.

वो कहते हैं, "इसके कई कारण हैं. युद्ध रूस के अंदर नहीं हो रहा है. अगर रूस को टेरिटोरियल लॉस भी होता है तो यूक्रेन में होगा. दूसरे रूस पर लगे प्रतिबंध का कोई ख़ास असर उस पर नहीं हो रहा है. प्रतिबंध से रूस में कोई आर्थिक संकट पैदा नहीं हो रहा है. हाँ अगर रूसी सैनिक भारी संख्या में मरने लगें तो देश में विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं, जिससे लीडरशिप बदल सकती है."

पुतिन

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"तीसरी वजह है यूक्रेन से रूस में आए शरणार्थी. इनकी संख्या 27 लाख है. रूस में इस समय सबसे अधिक यूक्रेनी से शरणार्थी आए हैं जो रूसी भाषा बोलने वाले हैं और रूसी मूल के हैं और यहां तक कि सभ्यता से जुड़े हैं, वो पुतिन के साथ हैं."

वरिष्ठ पत्रकार जोनाथन पर्लमैन बीबीसी इंडिया से एक ईमेल इंटरव्यू में कहते हैं, "अगर रूस युद्ध हार जाता है, तो यह राजनीतिक रूप से पुतिन के लिए नुक़सानदेह हो सकता है, हालांकि यह जानना मुश्किल है कि उनकी जगह लेने वाला कोई व्यक्ति है भी या नहीं. लेकिन रूसी संघ का टूटना संभावित नहीं है."

"यह ध्यान देने वाली बात है कि रूस को उस तरह के आर्थिक पतन का अनुभव होने की संभावना नहीं लगती है जो राजनीतिक संकट का कारण बन सकता है. रूस तेल और गैस बेचकर अच्छी-खासी कमाई कर रहा है. इसकी अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद किसी संकट में नहीं है."

सिक्यूरिटी काउंसिल

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क्रेमलिन एक केंद्रीकृत पावर सेंटर

पश्चिमी देशों के रूसी विशेषज्ञों के मुताबिक़ पुतिन की वजह से इस विशाल देश का पावर सेंटर अब क्रेमलिन में सिमट कर रह गया है.

क्रेमलिन की इजाज़त के बिना दूर दराज़ के प्रांतों में भी कुछ नहीं होता. लेकिन अमेरिकी लेखक जानुस बुगाज्स्की आगाह करते हैं कि रूसी संघ कमज़ोर नींव पर स्थापित किया गया है जो यूक्रेन की जंग के कारण और भी कमज़ोर हो गया है और ये कभी भी बिखर सकता है.

जानुस बुगाज्स्की

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बीबीसी हिंदी से बातचीत में वो कहते हैं, "एक मज़बूत राज्य की छवि ने रूस की कई कमज़ोरियों को छिपा रखा है जिन्हें दूर करने के लिए अब तक कुछ नहीं किया गया है. ये कमज़ोरियां यूक्रेन में जारी युद्ध के कारण और भी ज़ाहिर तौर पर बाहर आ गई हैं."

"मैंने अपनी किताब में इन कमज़ोरियों का ज़िक्र किया है, चाहे वो राष्ट्रीय पहचान हो जो कमज़ोर नींव पर बनी है, या राष्ट्र का निर्माण हो या फिर आम समाज हो या फिर जातीय समाज- ये सब केवल क्रेमलिन के पावर सेंटर से एक दूसरे से जुड़े हैं, जिसे पहले कम्युनिस्ट पार्टी कंट्रोल करती थी और अब पुतिन करते हैं."

युद्ध विरोधी प्रदर्शन

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लेखक जानुस बुगाज्स्की कहते हैं, "हम सोवियत यूनियन के बिखरने के बाद से ये इल्ज़ाम सुनते आ रहे हैं कि पश्चिमी देश रूसी संघ के भी टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं. लेकिन उनके मुताबिक़ अमेरिका या यूरोप का कोई भी नेता ये नहीं चाहता कि रूसी संघ बिखर जाए."

"लेकिन मैं उन लोगों में से हूँ जो इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि रूसी संघ के बिखरने के कई फ़ायदे हैं. यह पड़ोसी देशों के लिए सुरक्षा बढ़ाएगा और रूसी संघ में रह रहे लोगों को ग़ुलामी मानसिकता से निजात दिलाएगा."

वाशिंगटन की कैथलिक यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर माइकल सी किममेज अमेरिका-रूस रिश्तों और शीत युद्ध के इतिहास के विशेषज्ञ हैं और 2014 से 2016 तक अमेरिका के विदेश मंत्रालय में वो रूस और यूक्रेन के मामलों के विशेषज्ञ भी थे.

उन्होंने बताया, "पुतिन ने पिछले 20 सालों में मिलिट्री और सीक्रेट सर्विसेज़ की मज़बूत संस्थाएं बनाई हैं. इनमें से कुछ तो उन्हें सोवियत यूनियन से विरासत में मिली थीं. और मुझे नामुमकिन-सा लगता है कि ये संस्थाएं अचानक से ध्वस्त हो जाएंगी."

प्रोफ़ेसर माइकल सी किममेज

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"रूस से अलग होने के लिए उत्तरी कॉकस के दागेस्तान, चेचन्या प्रांतों में ठोस प्रयासों का कोई सबूत नहीं है या फिर फ़ार ईस्ट में भी कोई सबूत नहीं है. ऐसा लगता है कि रूस के पास निकट भविष्य के लिए अपनी क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखने की शक्ति है."

फ़िलिप वासिल्वेस्की अमेरिका की फ़ॉरेन पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट से जुड़े हैं. वो दशकों तक अमेरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए में काम कर चुके हैं.

अपने एक लेख में यूक्रेन में रूस की संभावित हार के बाद का मंज़र खींचते हुए वो लिखते हैं, "यदि रूस की केंद्र सरकार, एक पराजित सेना और कमज़ोर सुरक्षा सेवाओं के साथ, एक सशस्त्र सत्ता संघर्ष में उलझ गयी, तो यह स्थिति रूस के भीतर कुछ जातीय गणराज्यों को इस अवसर का लाभ उठाने और अलग होने का प्रयास करने के लिए प्रेरित कर सकती है. ये स्थिति रूसी संघ को और भी अधिक अराजकता में डुबो देगी."

ऑस्ट्रेलिया के वरिष्ठ पत्रकार जोनाथन पर्लमैन के अनुसार परमाणु हथियारों के भंडार वाले रूस के पतन से पश्चिम के देशों और दुनिया भर में सुरक्षा पर ख़तरे पैदा होंगे. "अगर रूसी संघ बिखरा तो विशाल परमाणु शस्त्रागार को सुरक्षित करना बेहद मुश्किल होगा."

रूस-यूक्रेन
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इतिहास में रूस के पतन के उदाहरण

जैसा कि प्रोफ़ेसर माइकल किममेज ने तर्क दिया कि रूसी संघ के बिखरने की संभावना बहुत कम है लेकिन वो साथ ही एक इतिहासकार होने के नाते रूस के बिखरने की संभावना को पूरी तरह से ख़ारिज भी नहीं करते.

वो कहते हैं, "निश्चित रूप से आप इतिहास के पिछले दो उदाहरणों पर नज़र डाल सकते हैं. पहली मिसाल 1991 का था. आप कह सकते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में रूसी हार के कारण सोवियत संघ टूट गया."

"यह केवल मॉस्को में सरकार का परिवर्तन नहीं था बल्कि वास्तव में नया नक्शा तैयार हुआ, जहाँ सोवियत संघ 15 स्वतंत्र देशों में विभाजित हो गया था, लेकिन एक मिसाल 1917 का है. प्रथम विश्व युद्ध में रूस की पूरी तरह से हार नहीं हुई थी, बल्कि प्रथम विश्व युद्ध में रूस को कई तरह की कठिनाइयाँ थीं, जिसके कारण 1917 में एक क्रांति हुई और उस क्रांति के साथ एक गृहयुद्ध छिड़ गया, जिसके कारण रूसी साम्राज्य पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ बल्कि बड़ा पुनर्निर्माण हुआ."

रूसी मामलों के विशेषज्ञ और लेखक जानुस बुगाज्स्की रूस से बाहर भी देश के टुकड़े-टुकड़े होने की मिसाल देते हैं. वो 1990 के शुरुआती सालों में यूगोस्लाविया के टूटने का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उसका पतन धीरे-धीरे हुआ.

कहा जाता है कि पहले विश्व युद्ध में तुर्क साम्राज्य की हार के कारण 1918 से 1922 के बीच तुर्की का विघटन हुआ.

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रूसी मामलों के विशेषज्ञों के मुताबिक़ रूसी संघ का पतन होना ही है लेकिन ये धीरे-धीरे ही होगा जैसा कि लेखक जानुस बुगाज्स्की ने बीबीसी को बताया, "जहाँ तक समय का सवाल है तो ये रातों-रात नहीं होगा. ये एक प्रक्रिया होगी जिसमे समय लगेगा. याद रहे कि यूगोस्लाविया के बिखरने में दस साल लग गए थे और कुछ लोगों का तो तर्क ये होगा कि यह अभी तक समाप्त नहीं हुआ है. याद रखें हम एक बड़े देश के बारे में बात कर रहे हैं. मैं कहूंगा कि यूक्रेन में युद्ध निश्चित रूप से इस प्रक्रिया को गति देगा क्योंकि रूसी हताहतों की संख्या बढ़ रही है."

जेएनयू के प्रोफ़ेसर पटनायक के विचार में जो देश बिखरे हैं उनका संदर्भ अलग हैं.

वो कहते हैं, "1917 में दरअसल रूस युद्ध में पश्चिमी देशों के साथ था. उनकी हार की वजह थी अर्थव्यवस्था. सैनिकों के पास पहनने को बूट्स भी नहीं थे, यूनिफ़ॉर्म नहीं थे. और 1991 में सोवियत संघ जो टूटा है वो किसी युद्ध के चलते नहीं टूटा है इसको तोड़ा है रूस, बेलारूस और यूक्रेन ने. उन्होंने रातों रात अपने को सोवियत संघ से अलग कर लिया. मध्य एशिया के देशों ने कहा भी कि संघ न छोड़ें. तो फार्मूला निकाला गया कॉमनवेल्थ ऑफ़ इंडिपेंडेंट स्टेट्स (सीआईएस)."

रूस का पतन चीन के लिए ख़ुशख़बरी?

शी और पुतिन

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विशेषज्ञों का कहना है कि रूसी संघ के पतन से या इसके कमज़ोर होने से मध्य एशिया में चीन को अपना असर बढ़ाने में मदद मिलेगी. अमेरिका के विदेश मंत्रालय में काम कर चुके कैथोलिक यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर माइकल किममेज कहते हैं कि चीन का असर मध्य एशिया में पहले ही हो चुका है.

उनके मुताबिक़ चीन के लिए मध्य एशिया के देशों के साथ काम करने के लिए रास्ता खुला है. "मुझे नहीं पता है कि चीन की महत्वाकांक्षाएं किस हद तक हैं, लेकिन आप उनके लिए अधिक संभावनाएं देख सकते हैं."

प्रोफ़ेसर माइकल किममेज कहते हैं, "मुझे लगता है कि युद्ध चीन के लिए फ़ायदेमंद रहा है क्योंकि इसने रूस को चीन पर अधिक निर्भर बना दिया है. दूसरी तरफ़ यूरोप और अमेरिका यूक्रेन युद्ध में इतने सारे संसाधन झोंक रहे हैं. इन संसाधनों को इंडो पैसिफिक क्षेत्र में चीन को रोकने के लिए समर्पित किया जा सकता था."

लेखक जानुस बुगाज्स्की का मानना ये है कि चीन की निगाहें रूस की कमज़ोरी पर टिकी होंगी. वो कहते हैं, "चीन की निगाहें केवल मध्य एशिया के देशों पर ही नहीं टिकी होंगी बल्कि रूस के पूर्वी प्रशांत क्षेत्र, सीमावर्ती क्षेत्रों पर भी टिकी होंगी जो 19वीं शताब्दी में चीन का हिस्सा थे, इन इलाक़ों को रूसी जार ने चीन से छीन लिया था."

"इसे लेकर बीजिंग में अब भी काफ़ी नाराज़गी है. यह तब सामने आने वाला है जब रूस कमजोर होने लगेगा. चीन न केवल पूर्व क्षेत्रों बल्कि साइबेरिया और सुदूर पूर्व में संसाधन समृद्ध क्षेत्रों के साथ-साथ उत्तरी समुद्री मार्ग को भी देख रहा है."

चीन को रोकने के लिए पश्चिमी ताक़तों को भारत की ज़रुरत होगी, जैसा कि जानुस बुगाज्स्की कहते हैं, "हिंसा और टकराव का सहारा लिए बिना चीन की महत्वाकांक्षाओं को कैसे नियंत्रित किया जाए यह एक बड़ी चुनौती होगी लेकिन हमारे पास इस क्षेत्र में बहुत सारे सहयोगी देश हैं और मैं भारत को भी एक सहयोगी के रूप में शामिल करूंगा क्योंकि भारत इलाक़े को स्थिर करने में पश्चिमी देशों की मदद कर सकता है."

प्रोफ़ेसर अजय पटनायक कहते हैं कि चीन की भूमिका पिछले 20 सालों में मध्य एशिया के पांचों देशों में बढ़ी है. वो आगे कहते हैं, "चीन की आर्थिक ताक़त बढ़ी है. चीन ने इन देशों में बुनियादी ढांचों में काफ़ी निवेश किया है. चीन आर्थिक रूप से इन देशों के अंदर काफ़ी अंदर तक प्रवेश कर चुका है. मध्य एशिया को राष्ट्रपति येल्तसिन के ज़माने में रूस ने नज़रअंदाज़ किया"

"लेकिन पुतिन के आने के बाद इस क्षेत्र में रूस ने फिर ध्यान देना शुरू कर दिया. रूस ने ये साबित किया है कि इस क्षेत्र में वो एक भरोसेमंद पार्टनर है. 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद से ताजिक-अफ़ग़ान सीमा को रूसी सैनिक ही गार्ड करते आये हैं. ताजिकिस्तान को तो रूस ने गृह युद्ध और कट्टरपंथी ताक़तों से बचाया है."

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

भारत की भूमिका क्या हो सकती है?

एक हारे हुए और संभवत टूटे हुए रूसी संघ का इस क्षेत्र में भारत की विदेश नीति पर क्या असर हो सकता है.

प्रोफ़ेसर पटनायक कहते हैं, "मध्य एशिया के पांचों देश बाहर से थोपे गए लोकतंत्र की कोशिशों को पसंद नहीं करते. वहां के सियासी मिज़ाज में मज़बूत नेताओं को पसंद करना शामिल है जो लोगों का देखभाल कर सकता है."

"भारत ने इन देशों से रिश्ते मज़बूत करने का सही फ़ैसला लिया है. सारे मध्य एशिया के देश आर्थिक रूप से हमारे लिए अहम हैं. सेंट्रल एशिया और यूरेशिया में भारत के लिए ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर उपलब्ध नहीं है. रूस, कज़ाकस्तान, किर्गिस्तान, बेलारूस और अर्मेनिआ ये एक यूनियन है जिसे यूरेशिया यूनियन कहा जाता है और जिनमें आपस में सामानों की आवाजाही फ्री है. भारत इस मार्केट तक ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के ज़रिए पहुंचना चाहता है. इस पर बातचीत जारी है."

वाशिंगटन के कैथोलिक यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर माइकल सी किममेज के मुताबिक़ भारत का निष्पक्ष रहना इसकी मजबूरी हो सकती है लेकिन उनके मुताबिक़ अमेरिकी प्रशासन चाहेगा कि भारत और दूसरे देश यूक्रेन का समर्थन करें.

वे कहते हैं, "मैंने अमेरिकी विदेश विभाग में काम किया है और मेरा उत्तर बहुत स्पष्ट है. आपने अमेरिकी सरकार की ओर से कई बार पहले ही यह तर्क सुना है कि यह भारत ग़लती कर रहा है. यूक्रेन का संघर्ष बहुत अहम है और यह आने वाले वर्षों या दशकों के लिए विश्व स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था इससे तय होगी."

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