ब्रिटेन की इकोनॉमी, अमेरिका और ईयू से पिछड़ती क्यों जा रही है?

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- Author, लुसी हुकर
- पदनाम, बिजेनस रिपोर्टर, बीबीसी न्यूज़
ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था कई दिक्कतों से जूझ रही है. लोग महंगाई की मार से परेशान हैं. महंगाई जिस तेज़ी से बढ़ रही हैं, उस हिसाब से लोगों का वेतन नहीं बढ़ रहा है.
हालात कितने खराब हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने इस साल सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ने की उम्मीद जताई है लेकिन कहा है कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में गिरावट आएगी.
बैंक ऑफ़ इंग्लैंड का आकलन है कि ब्रिटेन इस साल मंदी की गिरफ़्त में फंस सकता है. हालांकि मंदी का यह दौर छोटा होगा और पहले जिस भयावह हालात की आशंका जताई जा रही थी वैसा नहीं होगा.
इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा और खाद्य सामग्रियों के बढ़ते दाम ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को लगातार कमज़ोर ही किया है.
अनुमान हमेशा सटीक नहीं होते. अर्थव्यवस्था पर कई चीज़ों का असर होता है. इनमें जियोपॉलिटिक्स से लेकर मौसम तक शामिल हैं.
यही वजह है कि अर्थव्यवस्था के बारे में की जाने वाली भविष्यवाणी कई बार सही साबित नहीं होती. लेकिन इस तरह के आकलन बता सकते हैं कि चीज़ें किस दिशा में जा रही हैं.
लेकिन फिलहाल जो स्थिति है, उससे लगता है मौजूदा मुश्किल हालात दूसरे देशों की तुलना में ब्रिटेन को ज़्यादा परेशान कर रहे हैं.
अमीर देशों के आर्थिक प्रदर्शन पर नज़र रखने वाले संगठन ओईसीडी के मुताबिक़ कोरोना महामारी के शुरुआती महीनों में दूसरे अमीर देशों की तुलना में ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में ज़्यादा गिरावट आई है.
क्या ब्रिटेन पिछड़ रहा है?
महामारी के बाद इकोनॉमी के दोबारा खुलने पर यहां की अर्थव्यवस्था में तेज़ी से रिकवरी हुई लेकिन वो इतनी तेज़ नहीं थी कि पिछले नुक़सान की भरपाई कर सके.
हालांकि ब्रिटेन और दूसरी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच फ़ासला इतना ज़्यादा नहीं है, जितना लग रहा है क्योंकि ज़्यादातर देश अपनी सार्वजनिक सेवाओं जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा के आउटपुट का भी हिसाब लगाते हैं.
उदाहरण के लिए नर्स का वेतन का हिसाब इस पर आने वाली लागत के हिसाब से लगाया जाता है. लेकिन ब्रिटेन में इसका हिसाब अलग तरह से लगाया जाता है. यहां जो सर्विस दी जाती है उसकी क़ीमत लगाई जाती है. जैसे अस्पताल में होने वाले ऑपरेशन.
इसलिए ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर बंद स्कूल, अस्पतालों में रद्द किए गए और ऑपरेशन और हड़तालों की वजह से बंद हुए कामकाज का असर बेहतर तरीके से दिखता है.
लेकिन मोटी बात ये है कि बैंक ऑफ़ इंग्लैंड और आईएमएफ़ दोनों का कहना है कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था इस साल सिकुड़ेगी. जबकि जी7 देशों की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के इस साल बढ़ने की संभावना है.
जूलियन जेसॉप जैसे स्वतंत्र अर्थशास्त्री का मानना है कि आईएमएफ़ ब्रिटिश अर्थव्यवस्था की संभावनाओं के बारे में कुछ ज़्यादा ही निराशाजनक आकलन कर रहा है. आईएमएफ़ और स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों के आकलन में जो अंतर आ रहा है, उस पर चर्चा हो रही है.
फिर भी ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन में जो गिरावट देखी जा रही है, उसकी कुछ तो वजहें हैं ही.

क्या ये ब्रेग्ज़िट का असर है?
ब्रेग्ज़िट से अर्थव्यवस्था को हुए नुक़सान का जो आकलन हुआ, उसके आंकड़ों में अंतर है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ब्रेग्ज़िट से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को सालाना 100 अरब पाउंड का नुक़सान हुआ है. अगर ब्रिटेन यूरोपीय संघ का का हिस्सा रहा होता तो शायद उसकी अर्थव्यवस्था में चार फ़ीसदी कम गिरावट आती.
स्वतंत्र थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फ़ॉर फ़िस्कल स्टडीज के डिप्टी डायरेक्टर कार्ल इमरसन ने कहा, "यूरोपीय संघ दुनिया का सबसे अमीर क्षेत्र है. लेकिन अच्छा हो या बुरा, हमने इस ग्रुप के साथ व्यापार को और मुश्किल बना दिया है. लिहाज़ा इसने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का आगे बढ़ना और मुश्किल कर दिया है."
वो कहते हैं कि कि 2016 में ब्रेग्ज़िट पर जनमतसंग्रह के समय से कारोबार में निवेश भी स्थिर हो गया है. इससे ग्रोथ और कमज़ोर हुई है. बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के एक पॉलिसीमेकर ने कहा है कि पहले यूरोपीय संघ के कामगार बेरोकटोक ब्रिटेन आते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है. इससे हॉस्पिटालिटी, एग्रीकल्चर और केयर सेक्टर के लिए पर्याप्त कर्मचारी मिलना कठिन हो गया है.
वो कहते हैं कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को निवेश में 29 अरब पाउंड के नुक़सान झेलना पड़ा है.
खुद को 'ब्रेग्जिट ऑप्टिमिस्ट' कहने वाले जूलियन जेसॉप भी मानते हैं कि हालांकि अभी ब्रेग्ज़िट से थोड़ी मुश्किलें हो सकती हैं कि लेकिन यूरोपीय संघ छोड़ने से ब्रिटेन को आगे काफी लाभ होने की संभावना है.
वो कहते हैं, "यूरोपीय संघ छोड़ने के बाद ब्रिटेन अभी बदलाव के दौर में है. यहां फिलहाल नकारात्मक चीज़ें हावी हो गई हैं. कुछ लोग इसके असर के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे हैं. लेकिन ज़्यादातर मुश्किलें अस्थायी रहने वाली हैं क्योंकि अनिश्चितताओं को ख़त्म करने और बदले हुए हालात से तालमेल बैठाने में वक्त लगेगा."

अर्थव्यवस्था पर और किन चीजों का असर?
उर्जा की क़ीमतें
यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद ग्लोबल मार्केट में एनर्जी की क़ीमतें बढ़ गई हैं. लेकिन इसका अलग-अलग देशों पर असर अलग है.
अमेरिका के पास जीवाश्म ईंधन के अपने स्रोत हैं और यूरोपीय देशों के पास वैकल्पिक ऊर्जा के ज़्यादा स्रोत हैं. इमर्सन कहते हैं कि उदाहरण के लिए फ्रांस के पास न्यूक्लियर नेटवर्क का बड़ा दायरा है और नॉर्वे के पास काफी हाइड्रोपावर है.
जूलियन जेसॉप कहते हैं कि इस मामले में ब्रिटेन खाली है. इसके अलावा ब्रिटेन में बिजली की क़ीमतें, गैस क़ीमतों पर निर्भर है. गैस से बिजली बनाना सबसे महंगा है. इसने ब्रिटेन में लोगों के बिजली बिल को काफी बढ़ा दिया है और इससे महंगाई बेकाबू होती जा रही है.
कामगारों की कमी
ज़्यादा अर्थव्यवस्थाओं में कोरोना महामारी के दौरान कामगारों की कमी देखी गई थी. लेकिन यहां भी ब्रिटेन की स्थिति दूसरों से ख़राब है. महामारी के बाद भी यहां कामगारों के लौटने की रफ्तार धीमी है.
अर्थशास्त्री इसकी वजह जानने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन फिलहाल जो स्थिति है उसमें युवा लोग काम पर लौटने के बजाय पढ़ाई में लगे हैं. बुजुर्गों ने जल्दी रिटायरमेंट ले लिया है. और बहुत सारे लोग लंबी बीमारी के एवज में मिलने वाले बेनिफिट्स का लाभ उठा रहे हैं.
हालांकि कामगारों की संख्या में इज़ाफ़े की संभावना दिख रही है. उम्मीद है इससे इस साल के अंत तक ग्रोथ और टैक्स रेवेन्यू में इज़ाफ़ा होगा.

लंबी अवधि की दिक्कतें
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्री डिएन कोयेल कहती हैं कि ब्रिटेन की अर्थव्यवय्था के ख़राब परफॉरमेंस की वजह कुछ और बुनियादी चीजें भी हैं.
वो कहती हैं कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था 2008 के वित्तीय संकट के वक्त से धीमी बढ़ती दिख रही है. लेकिन समस्या इससे और पहले से शुरू हो गई थी जब 1990 के दशक से यहां निवेश घटना शुरू हो गया था. इस वजह से यहां की अर्थव्यवस्था एक के बाद एक आए संकट यानी ब्रेग्ज़िट, कोविड और अब रूस-यूक्रेन युद्ध से पैदा दिक्कतों को नहीं झेल पा रही है.
हालांकि सरकार कह रही है ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था इन मामलों में पर्याप्त लचीलापन है.
2022 में ब्रिटेन मंदी से किसी तरह बच गया था. इसका उदाहरण देते हुए वित्त मंत्री जेरेमी हंट ने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में संकट झेलने की क्षमता है. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि 'देश अभी मुसीबतों से बाहर नहीं निकला है'.
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