अफ़ग़ानिस्तान पर पुतिन की बैठक में डोभाल तो थे, लेकिन पाकिस्तान क्यों नहीं हुआ शामिल

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- Author, कुमारी स्नेहा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के साथ हमेशा खड़ा रहेगा - भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल का यह बयान मॉस्को में 'अफ़ग़ानिस्तान पर हुई सुरक्षा वार्ता' के बाद आया.
रूस में मौजूद भारतीय दूतावास ने इस वार्ता के बारे में एक ट्वीट में बताया, "एनएसए अजित डोभाल ने 'अफ़ग़ानिस्तान पर सुरक्षा वार्ता' के पांचवें संस्करण में हिस्सा लिया. उन्होंने बैठक में इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत अफ़ग़ानिस्तान के लोगों का साथ कभी नहीं छोड़ेगा."
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सात-नौ फ़रवरी के बीच यह बैठक मॉस्को में आयोजित हुई. भारत के एनएसए अजीत डोभाल ने इस यात्रा के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मुलाक़ात की.
ट्वीट में बताया गया कि बैठक के दौरान ख़ास तौर पर अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा स्थिति, वहां के नागरिकों के कल्याण और उनकी मानवीय ज़रूरतों पर चर्चा हुई.
बैठक में भारत और मेज़बान देश रूस के प्रतिनिधियों के अलावा ईरान, कज़ाख़स्तान, कीर्गिस्तान, चीन, तज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान के प्रतिनिधि शामिल हुए. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान का पड़ोसी देश पाकिस्तान इस बैठक में शामिल नहीं हुआ.

- 7-9 फ़रवरी को मॉस्को में अफ़ग़ानिस्तान पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक हुई.
- इसमें भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल शामिल हुए.
- पाकिस्तान इसमें शामिल नहीं हुआ.
- बैठक में अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा स्थिति पर चर्चा हुई.


पाकिस्तान ने बैठक में शामिल नहीं होने की ये वजह बताई
पाकिस्तान ने गुरुवार को बताया था कि उसने इस सप्ताह मॉस्को में होने वाली बैठक में शामिल नहीं होने का फ़ैसला किया है. विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मुमताज ज़हरा बलूच ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था कि पाकिस्तान को इस वार्ता में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था लेकिन उसने शामिल नहीं होने का निर्णय लिया.
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान ने इस बैठक में शामिल नहीं होने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि पाकिस्तान उन मंचों और वार्ताओं में बेहतर योगदान दे सकता है, जहां अफ़ग़ानिस्तान में शांति कायम करने के लिए सकारात्मक बातचीत हो."
मुमताज़ ज़हरा बलूच ने यह भी स्पष्ट किया कि रूस में आयोजित बैठक मॉस्को फॉर्मेट का हिस्सा नहीं है.
उन्होंने सीधे तौर पर वार्ता में शामिल होने का कारण नहीं बताया लेकिन पाकिस्तानी मीडिया में आई ख़बरों में यह बात कही गई कि इसके पीछे की वजह 'भारत' का इसमें शामिल होना है.
पाकिस्तान के इस बैठक में शामिल नहीं होने की वजह के बारे में पाकिस्तान मामलों के विशेषज्ञ और पत्रकार नदीम रज़ा ने कहते हैं, "पाकिस्तान क्यों ऐसे मंच पर अफ़ग़ानिस्तान पर बात करे जहां उसे बहुत तवज्जो न मिले. अफ़ग़ानिस्तान में जो भी होता है, उससे सीधे तौर पर सबसे ज़्यादा पाकिस्तान ही प्रभावित होता है."
उहोंने कहा, "पाकिस्तान ये समझता है कि मॉस्को में जो बातचीत हुई है, वह भारत की इच्छा के हिसाब से हुई है. इसलिए वह इसमें शामिल नहीं हुआ. पाकिस्तान ने उन सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शिरकत की है, जहां अफ़गानिस्तान में शांति को लेकर बातचीत हुई है, चाहे वो दोहा हो, बीजिंग हो, मॉस्को हो या अमेरिका हो. भले ही आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान ने भारत का नाम न लिया हो लेकिन वजह तो यही है."

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भारत में आयोजित हुई बैठक में भी नहीं शामिल हुआ था पाकिस्तान
इसको लेकर भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने एबीएन न्यूज़ से बातचीत में कहा, "ये इंडिया का इनिशियेटिव नहीं है. लोग ग़लत बात कर रहे हैं. ये बुनियादी तौर पर ईरान का इनिशियेटिव है और इसकी शुरुआती दो बैठकें 2018 और 2019 में ईरान में हुई है."
"इसके बाद कोविड महामारी आ गई और तीसरी बैठक 2021 में भारत हुई जिसमें पाकिस्तान ने शामिल होने से इनकार कर दिया था. चौथी बैठक दुशान्बे में हुई, उसमें भी पाकिस्तान शामिल नहीं हुआ. हमने (पाकिस्तान) कभी भी इस इनिशियेटिव से खुद को जोड़ा ही नहीं तो फिर शामिल नहीं होने की बात ही ग़लत है."
भारत में 2021 में आयोजित बैठक में पाकिस्तान और चीन दोनों ही देश शामिल नहीं हुए थे.

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मौजूदा बैठक ऐसे समय में आयोजित हुई जब पाकिस्तान में आर्थिक और सियासी हालात दोनों ही ठीक नहीं हैं.
आर्थिक संकट से उबरने के लिए वो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज़ लेने की कोशिश में है क्योंकि उसके विदेशी भंडार में केवल एक महीने के आयात के लिए ही पैसे बचे हैं. पाकिस्तान विदेशी कर्ज़े पर अधिक ब्याज़ देने तक के लिए भी सघंर्ष कर रहा है.
वहीं राजनीति के मोर्चे पर, अभी कुछ महीनों पहले ही सत्ता में आई शहबाज़ शरीफ़ सरकार पर भी दबाव कम नहीं है.
पाकिस्तान के सियासी और आर्थिक हालात पर टिप्पणी करते हुए अब्दुल बासित ने कहा, "अगर सियासी और आर्थिक स्तर पर स्थायित्व न हो तो क्या आप विदेश नीति अच्छे से चला सकते हैं. मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान अभी विदेश नीति के किसी भी मैदान में है, उसने ये सभी अभी छोड़ा हुआ है."

'मॉस्को फॉर्मेट' क्या है?
- अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर चर्चा के लिए साल 2017 में 'मॉस्को फॉर्मेट' की शुरुआत हुई थी.
- इस क्षेत्रीय चर्चा में छह देश - रूस, अफ़ग़ानिस्तान, चीन, पाकिस्तान, ईरान और भारत शामिल थे.
- इनके अलावा असमें कज़ाख़्स्तान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान भी शामिल हैं.
- इसका मक़सद क़ाबुल में मौजूद अफ़ग़ान सरकार और तालिबान के नेताओं के बीच बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और अफ़ग़ानिस्तानमें शांति कायम करना था.
- इसके पहले संस्करण में अफ़ग़ानिस्तान और केंद्रीय एशिया में हिंसा और अस्थिरता के बढ़ने के ख़तरा पर चर्चा हुई.
- दूसरे संस्करण में चर्चा का मुद्दा रूसी बाज़ार में अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले नशीले पदार्थ (हेरोइन) रहा.
- 2022 में नवंबर में हुई इसकी बैठक में भारत और पाकिस्तान दोनों ने ही हिस्सा लिया था, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान इसमें शांमिल नहीं था.


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भारत और अफ़ग़ानिस्तान के रिश्ते के लिए यह बैठक कितनी अहम
पिछले क़रीब 20 सालों में भारत ने अफ़ग़ानिस्तान को आर्थिक सहायता दी है. भारत यह भी मानता रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान उसका रणनीतिक सहयोगी है और इसके लिए दोनों मुल्कों के बीच संबंध अच्छे होने जरूरी हैं.
तालिबान के आने के बाद भी भारत ने धीरे-धीरे संपर्क सही दिशा में ले जाने के प्रयास किए हैं. मानवीय आधार पर भारत ने अफ़गानिस्तान को सहायता भी मुहैया कराई है.
भारत ने अब तक अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है. लेकिन इस साल के बजट को देखें तो भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में अफ़ग़ानिस्तान के लिए 200 करोड़ रुपये के सहायता पैकेज का प्रावधान किया है.
इसका वहां की तालिबान सरकार ने स्वागत भी किया है और कहा है किइससे दोनों मुल्कों के बीच रिश्ते बेहतर होंगे.
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अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा स्थिति भारत के लिए बेहद अहम हैं. मॉस्को में हुई चर्चा में भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में समावेशी सरकार और आतंकवाद से लड़ने के लिए सामूहिक प्रयासों की बात को दोहराया.
इस पर पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान मामलों के जानकार विनय कौड़ा कहते हैं, "भारत चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवादी संगठनों का जो जमावड़ा रहा है वो ख़त्म हो. पाकिस्तान की सरपरस्ती में वहां जो आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं, वो भारत के ख़िलाफ़ अपनी गतिविधियां न चलाएं."
"मॉस्को में आयोजित वार्ता सुरक्षा पर केंद्रित है और अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई . वहां अब भी शासन का ढांचा मजबूत नहीं है. ऐसे में इसका फ़ायदा उठाकर अल-क़ायदा और दूसरे आतंकवादी संगठन मज़बूत हो सकते हैं."

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विनय कौड़ा कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवाद को लेकर चिताएं हैं, ख़ास तौर पर इस्लामिक स्टेट (ख़ुरासान) को लेकर. वो अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल कर रहा है और आगे भी ऐसा करना जारी रख सकता है. हो सकता है कि आने वाले वक्त में वहां अल-क़ायदा मज़बूत हो जाए. ये सुरक्षा चिंताएं बातचीत के केंद्र में है."
"अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत की एक नीति रही है. वो भारत के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन के इस्तेमाल के विरोध में रहा है. भारत यह चाहेगा कि वहां आतंकवाद न पनपे और आतंकवाद के ख़िलाफ़ किसी तरह का सामूहिक सहयोग हो सके."

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इस बैठक में अफ़ग़ानिस्तान नहीं था आमंत्रित
इस बैठक में अफ़ग़ानिस्तान का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था क्योंकि उन्हें इसके लिए आमंत्रित ही नहीं किया गया था.
इस बारे में पूर्व राजदूत अज़ीज़ मारिज ने अफ़ग़ानिस्तान के टोलो न्यूज से कहा, "अफ़ग़ानिस्तान पर हो रही इस बैठक को दो कारणों से सफल नहीं माना जा सकता. पहला यो ये कि, इसमें अफ़ग़ानिस्तान का प्रतिनिधित्व ही नहीं था. अफ़ग़ानिस्तान न तो किसी फैसले का समर्थन कर सकता था, न अपने बचाव में कुछ कह सकता था और न ही इनकार कर सकता था. और दूसरी वजह ये है कि अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति को लेकर उनका एजेंडा भी स्पष्ट नहीं था."
इस बारे में विनय कौड़ा का कहना है, "अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार को अभी अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली है. इस वजह से उनको आमंत्रित नहीं किया गया."
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