अमेरिका में दिखे चीनी 'स्पाई बलून' को लेकर गहराया विवाद, क्या बनेगा तनाव का कारण

राष्ट्रपति शी जिनपिंग और जो बाइडन

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    • Author, बारबरा प्लेट अशर
    • पदनाम, संवाददाता, अमेरिकी विदेश मंत्रालय

अमेरिका के आसमान में चीनी स्पाई बलून (जासूसी ग़ुब्बारा) मिलने के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का चीनी दौरा टाल दिया गया है. चीन-अमेरिका के संबंधों में इस घटना को एक बड़ा झटका माना जा रहा है.

एंटनी ब्लिंकन के चीन जाने से एक दिन पहले ही चीन का एक ग़ुब्बारा अमेरिका के आसमान में नज़र आया और जिस तनाव को कम करने के लिए ब्लिंकन चीन जा रहे थे वो बढ़ता दिखने लगा.

बुधवार को अमेरिका के पश्चिमी राज्य मोंटाना में इस गुब्बारे को उड़ता पाया गया था. इसके चलते इस इलाक़े में विमानों की उड़ान रोकनी पड़ी थी.

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक़ ये ग़ुब्बारा मोंटाना में दिखने से पहले अलास्का के अल्यूशन आईलैंड और कनाडा से होकर गुज़रा था.

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अमेरिका ने इसे एक 'जासूसी' ग़ुब्बारा बताया था. अमेरिका रक्षा अधिकारियों का कहना था, "हमें पूरा भरोसा है कि काफ़ी ऊंचाई पर उड़ने वाला ये स्पाई बलून चीन का ही है. ये बलून हाल ही में मोंटाना के पास देखा गया."

सेना ने इस ग़ुब्बारे को निशाना लगाकर नीचे गिराने का फ़ैसला इसलिए नहीं किया है क्योंकि उन्हें ये डर था कि इसका मलबा संवेदनशील जगहों पर गिरकर नुक़सान पहुंचा सकता है.

वहीं, अब लैटिन अमेरिका में भी चीन का एक कथित संदिग्ध ग़ुब्बारा पाया देखा गया है.

समाचार एजेंसी एएफ़पी और एसोसिएटेड प्रेस ने अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल पैट राइडर के हवाले से यह जानकारी दी है.

राइडर ने बताया कि चीन के दूसरे जासूसी ग़ुब्बारे को लैटिन अमेरिका में देखा गया है. हालांकि, उन्होंने ग़ुब्बारे की सटीक लोकेशन नहीं बताई.

अमेरिकी आसमान में गुब्बारा

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी आसमान में गुब्बारा

चीन ने क्या दिया जवाब

चीन ने ग़ुब्बारे के ज़रिए जासूसी के आरोपों से इनकार किया है. चीन ने इसे एक 'सिविलियन एयरशिप' बताया है जो रास्ते से भटक गया था.

चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि इस गुब्बारे का मक़सद खासतौर पर मौसम संबंधी जानकारियां जुटाना था. उन्होंने कहा कि अमेरिका के आसमान में इस तरह ग़ुब्बारा आने का चीन को खेद है.

चीन की ये प्रतिक्रिया दिखाती है कि वो विदेश मंत्री की यात्रा पर इसका असर नहीं पड़ने देना चाहता था.

ये दौरा पांच सालों में पहली बार हो रहा है. लेकिन, जो नुक़सान होना था वो हो गया.

चीन के सफ़ाई देने के बाद भी अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने दौरा रद्द करने की घोषणा कर दी.

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दोनों देशों के बीच तनाव किस स्तर तक बढ़ गया है ये देखते हुए कई सालों बाद हो रहे इस दौरे को लेकर खुशी जताई जा रही थी. लेकिन, अब इसे हाथ से निकले मौक़े की तरह देखा जा रहा है.

अमेरिकी अधिकारियों का कहना था कि ऐसा नहीं था कि इस दौरे से कोई समाधान निकल जाता लेकिन इससे बातचीत शुरू होने की उम्मीद ज़रूर थी.

अधिकारी कहते हैं, "एंटनी ब्लिंकन दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा की स्थिति को टकराव में बदलने से रोकना चाहते हैं."

ब्लिंकन ने पिछले महीने अपने भाषण में कहा था, "ऐसा करने का एक तरीक़ा ये है कि आप बातचीत के रास्ते खुले रखें."

अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन

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क्या चाहता है अमेरिका

वॉशिंगटन के सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ में चीन के विशेषज्ञ जूड ब्लैन्शेट ने कहा, "मुझे लगता है कि उनका मक़सद जल्द से जल्द शीत युद्ध की इस स्थिति में सुधार लाना है ताकि क्यूबा मिसाइल संकट जैसी स्थिति फिर ना बने."

1962 में क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ आमने-सामने आ गए थे. इतिहास में इस घटना को शीत युद्ध के सबसे नाज़ुक लम्हों के तौर पर याद किया जाता है.

लेकिन, मौजूदा दौर में दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए रिश्तों में तनाव कम करना काम आसान नहीं है.

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान के व्यापार युद्ध, हाल के दिनों में ताइवान को लेकर तनाव, साउथ चाइना सी में चीन के बढ़ते कदम और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन की महत्वाकांक्षा ने हाल के सालों में दोनों मुल्कों के बीच रिश्तों को एक तरह से पटरी से उतार दिया है.

ये तनाव तब और बढ़ गया जब चीन ने यूक्रेन पर हमले के लिए रूस की आलोचना नहीं की.

इसके बाद नवंबर में जी20 सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति जो बाइडन और शी जनिपिंग के बीच बात हुई. तब दोनों नेताओं ने टकराव कम करने की इच्छा व्यक्त की ताकि गहमागहमी कुछ कम हो सके.

अब एंटनी ब्लिंकन इस बात को आगे बढ़ाने के लिए बीजिंग पहुंचने वाले थे. लेकिन, इन ऐन वक्त कथित जासूसी ग़ुब्बारों ने तनाव कम करने की संभावना को कम कर दिया है.

राष्ट्रपति जो बाइडन

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जो बाइडन की मुश्किल

बीते सालों में अमेरिका चीन पर आर्थिक प्रतिबंध लगाकर और उसके आसपास के इलाक़ों में सैन्य विस्तार करके चीन पर दबाव बनाता आया है. इससे चीन की नाराज़गी भी बढ़ी है.

पिछले हफ़्ते ही जापान और नीदरलैंड के साथ अमेरिका का एक समझौता हुआ है. इसके तहत ये देश चीन को चिप बनाने वाले उपकरण का आयात रोकेंगे.

सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी के उत्पादन में चीन दूसरे मुल्कों से कहीं आगे है. अमेरिका इस क्षेत्र में उसे सीमित करना चाहता है ताकि माइक्रोचिप आपूर्ति की चीन की सप्लाई चेन को तोड़ा जा सके.

अंतरराष्ट्रीय इतिहास के प्रोफ़ेसर क्रिस मिलर कहते हैं, "ये दिखाता है कि अमेरिका ने तकनीकी हस्तांतरण को लेकर ज़्यादा सख़्त रुख अपनाया है. वो इसमें सहयोगी खोज रहा है."

क्रिस मिलर ने माइक्रोचिप तकनीक पर अमेरिका-चीन तनाव को लेकर क़िताब भी लिखी है.

कुछ दिनों पहले अमेरिकी सेना ने घोषणा की थी कि वो फिलिपींस के इलाक़े में अपनी मौजूदगी बढ़ाएगा. माना गया कि ताइवान को लेकर बढ़ते टकराव को देखते हुए अमेरिका इलाक़े में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है.

लेकिन, बाइडन प्रशासन चीन के साथ बातचीत की राह पर आगे बढ़ना चाहता है.

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जूड ब्लैन्शेट का कहना है कि अमेरिका के मुताबिक़ बातचीत के लिए ये समय सबसे अच्छा है क्योंकि पहली सरकार के मुक़ाबले इस समय उनकी सरकार ने चीन के ख़िलाफ़ कड़े कदम उठाकर दिखाए हैं. और ऐसे में वो चीन के सामने कमज़ोर नज़र नहीं आएंगे और विपक्षी हमले से भी बच जाएंगे.

लेकिन, स्पाई बलून के अमेरिकी हवाई क्षेत्र में आने के बाद रिपब्लिकन पार्टी चीन के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की मांग कर सकती है.

हालांकि, विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने कोशिशें नहीं छोड़ी हैं और एक और बैठक के लिए बातचीत अभी जारी है.

हालांकि अभी इसके लिए कोई तारीख तय नहीं हुई है और जब तक ऐसा नहीं होता दोनों मुल्कों के रिश्तों में बेहतरी की उम्मीद कम है.

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