चीन की अर्थव्यवस्था क्या मुश्किल में है?-दुनिया जहान

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग बीते महीने कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस के दौरान स्टेज पर पहुंचे तो तालियों की गड़गड़ाहट गूंजने लगी.
रिकॉर्ड तीसरी बार चीन के सर्वोच्च नेता चुने गए शी जिनपिंग ने वहां मौजूद दो हज़ार से ज़्यादा लोगों को निष्ठा और भरोसा दिखाने के लिए शुक्रिया कहा.
क़रीब डेढ़ घंटे लंबे भाषण में उन्होंने अपनी नीतियों की तारीफ़ की और दावा किया कि देश की आर्थिक सेहत उनकी प्राथमिकता है.
शी जिनपिंग ने कहा, "हम एक उच्चस्तरीय सोशलिस्ट मार्केट इकॉनमी बनाएंगे. हमें चीन के मूलभूत आर्थिक ढांचे में सुधार लाना है. हमें पब्लिक सेक्टर को मज़बूत बनाना है और ग़ैर सरकारी क्षेत्र की भी मदद करनी है."
फिलहाल चीन की अर्थव्यवस्था में कई छेद दिखते हैं- यहां बेरोज़गारी बढ़ रही है और कोविड लॉकडाउन के चलते भी अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है. अनुमान है कि इस साल चीन, आर्थिक उत्पादन के मामले में बाकी एशिया से पीछे रह जाएगा.
ये सवाल भी पूछा जा रहा है कि क्या चीन की अर्थव्यवस्था मुश्किल में है? बीबीसी ने इसका जवाब पाने के लिए चार एक्सपर्ट से बात की

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तरक्की की छलांग

क़रीब 50 साल पहले चीन अफ़रातफ़री के दौर से गुजर रहा था.
चीन के तत्कालीन नेता माओत्से तुंग सांस्कृतिक क्रांति के ज़रिए पूंजीवाद के बचे-खुचे निशान ख़त्म करने के प्रयास में थे.
लेकिन 1976 में माओत्से तुंग की मौत चीन के लिए नए दौर की दस्तक लेकर आई.
चैटम हाउस में चीन मामलों की सीनियर रिसर्च फेलो डॉक्टर यू जिया बताती हैं कि माओ के उत्तराधिकारी देंग शियाओपिंग ने देश को नए रास्ते पर आगे बढ़ाया और बाज़ार की ताक़तों के लिए दरवाज़े खोल दिए.
डॉक्टर यू जिया कहती हैं, "ये चीन के लिए टर्निंग प्वाइंट था. 10 साल बाद उन्हें लगा कि माओ की अगुवाई में देश जैसे चल रहा था, आगे उसी तरह से नहीं चलता रह सकता था. इसलिए उन्होंने शुरुआत चीन के बाज़ार और अर्थव्यवस्था की रफ़्तार पर लगी रोक को हटाने से की."
सदियों पहले चीन दुनिया का सबसे समृद्ध देश था और अब इरादा उसी रास्ते पर बढ़ने का था. सुधार के तहत कई सरकारी कंपनियों को बेच दिया गया. विदेशी निवेश की अनुमति दी गई.
यू जिया बताती हैं कि चीन का हर प्रांत निजी कंपनियों को आकर्षक शर्तों पर ऋण मुहैया करा रहा था. चीन की श्रम शक्ति भी दुनिया के लिए उपलब्ध थी.

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ऐतिहासिक तौर पर विद्वानों की खान रहे चीन में विश्वविद्यालय शुरू किए गए. सीखने और कुछ नया करने की संस्कृति को मानो दूसरा जन्म मिल गया. विनिर्माण, तकनीक और उद्योग के क्षेत्र में बहुत तेज़ी से तरक्की हुई. चीन की आर्थिक रफ़्तार की दर दुनिया में सबसे तेज़ हो गई.
डॉक्टर यू जिया कहती हैं, "अब यहां सिर्फ़ विचारधारा और नेतृत्व के प्रति वफ़ादारी दिखाने की बात नहीं थी. मुझे लगता है कि लोग अपनी आर्थिक संपन्नता के बारे में सोचने लगे थे. चीन में आज जितने ख़रबपति हैं, वो सब उसी पीढ़ी के हैं, जिन्होंने तब निजी क्षेत्र का रुख़ किया या कारोबार शुरु किए."
चीन साल 2001 में विश्व व्यापार संगठन में शामिल हुआ. इससे निर्यात को बढ़ावा मिला. देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक सामान आसानी से जा सके, इसके लिए ट्रांसपोर्ट नेटवर्क तैयार किया गया.
डॉक्टर यू जिया बताती हैं, "उन्होंने महसूस किया कि मैन्युफैक्चरिंग हब होने के नाते आपके पास ठीक-ठाक आधारभूत ढांचा होना चाहिए. अच्छे हाईवे हों, पर्याप्त संख्या में एयरपोर्ट हों और ऐसी ही दूसरी सुविधाएं हों. इसी तरह चीन को दुनिया की फैक्ट्री का दर्जा मिल सकता था."
अर्थव्यवस्था की तरक्की के साथ चीन के लोगों की ज़िंदगी बदलने लगी. वो ज्यादा पैसे बचाने लगे और निवेश के सुरक्षित विकल्पों की ओर देखने लगे.
डॉक्टर यू जिया कहती हैं, "शेयर बाज़ार में उतार चढ़ाव होता था. उस समय प्रॉपर्टी सेक्टर बेहतर रिटर्न की गारंटी देता था. इसलिए बचत और निवेश के लिए लोग हाउसिंग मार्केट की तरफ गए. प्रॉपर्टी सेक्टर पैसे बनाने के लिए आसान क्षेत्र मालूम होता है."
फिलहाल चीन के लोगों की घरेलू बचत का क़रीब 70 प्रतिशत हिस्सा रियल एस्टेट में लगा है. चीनी अर्थव्यवस्था में प्रॉपर्टी मार्केट का एक तिहाई हिस्सा है. लेकिन अब कई ख़ामियां भी दिखने लगी हैं.

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बढ़ता बाज़ार

चीन के हैंग सेंग बैंक की चीफ़ इकॉनमिस्ट डैन वांग कहती हैं, "जब हम बीते दशक में चीन की तरक्की को देखते हैं, तब इसकी अहम वजह घरों का निर्माण मालूम होती है. इसमें रिहायशी और व्यावसायिक इमारतों का निर्माण शामिल था."
डैन बताती हैं कि साल 2000 और 2010 के बीच चीन के शहरी घरों की कीमत लगभग दोगुनी हो गई. उस समय निवेश करने वालों ने जीवनभर के लिए दौलत जुटा ली.
आर्थिक तरक्की के साथ चीन में मध्यवर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी. काफी लोगों ने शहरों का रुख किया. प्रॉपर्टी डेवलपर्स ने इस मौके का फ़ायदा उठाया. लेकिन सब कुछ मन मुताबिक़ नहीं रहा.
डैन वांग बताती हैं, "चीन में दो तरह के सिस्टम हैं. एक बड़े शहरों का हाउसिंग मार्केट है. वहां संपत्ति सुरक्षित मानी जाती है. आर्थिक तरक्की की दर और अंतरराष्ट्रीय माहौल चाहे जैसा भी हो. वहां कीमतें लगातार बढ़ती रहती हैं. अब भी बीजिंग और शंघाई जैसे शहरों में हाउसिंग मार्केट बहुत अच्छी स्थिति में है. लेकिन जब आप उन बड़े शहरों से बाहर निकलते हैं तो पाते हैं कि छोटे शहरों में जितने मकान बनाए जा रहे हैं, मांग उससे काफी कम है."
चीन में ऐसे कई शहर हैं जहां बड़ी संख्या में घर तो बने लेकिन कभी बसे नहीं. दरअसल, साल 2008 के आर्थिक संकट के दौरान चीन की सरकार ने प्रांतीय सरकारों को निर्देश दिया कि वो सड़कें और पुल बनाने पर बड़ी रक़म खर्च करें. सरकार का इरादा बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा करने का था.
स्थानीय सरकारों को पैसे की ज़रूरत थी और इसके लिए एक ही रास्ता था, सरकारी ज़मीन की बिक्री.

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फिर क्या था, प्रॉपर्टी डेवलप करनेवालों के बीच ज़मीन ख़रीदने की होड़ लग गई. घर बनाने को पैसे चाहिए थे. ऐसे में उन्होंने घर के संभावित खरीदारों से कहा कि वो शुरुआत में कुछ रक़म दें. ख़रीदार इसके लिए तैयार थे.
डैन वांग कहती हैं, "प्रीपेड स्कीम चुनने की कई वजह हैं. पहली ये कि इसमें घर सस्ते पड़ते हैं. जब मार्केट में पहले से बने घर उपलब्ध होते हैं तब खरीदारों को ज़्यादा रकम देनी होती है. तब उन पर डाउन पेमेंट देने का दबाव होता है. बीते 10 साल से प्रीपेड स्कीम कामयाब है. इसने रियल एस्टेट डेवलपर्स को सस्ते मकान बनाने के लिए ज़रूरी फंड मुहैया कराया है."
लेकिन जब चीन का प्रॉपर्टी मार्केट बढ़ा तो डेवलपर्स ने फंड जुटाने के दूसरे स्रोत देखने शुरू किए. वो बड़े पैमाने पर कर्ज़ लेने लगे. पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना के मुताबिक़ साल 2020 में प्रॉपर्टी में सीधा निवेश दस खरब डॉलर के ऊपर पहुंच गया.
चीन की सरकार को चिंता सताने लगी कि कर्ज़ का पहाड़ दरक सकता है और उसने हस्तक्षेप का फ़ैसला किया. डेवलपर्स से कर्ज़ लेने की रफ़्तार घटाने को कहा गया और बैंकों पर भी दबाव बनाया गया.
डैन वांग बताती हैं कि इससे बहुत जल्दी नकदी ख़त्म हो गई. अभी जो दिक्कतें सामने हैं, उसकी वजह प्रशासन की अत्यधिक कड़ाई है.
चीन में लाखों अपार्टमेंट बना चुके प्रॉपटी डेवलपर एवरग्रैंड की सख़्ती के इस दौर में हालत ख़स्ता हो गई. इस पर 300 अरब डॉलर्स की देनदारी है. ये असर सिर्फ़ एवरग्रैंड तक सीमित नहीं रहा. प्रॉपर्टी सेक्टर को दिए गए कुल कर्ज़ में से एक तिहाई को बैड लोन बताया जा चुका है.
डैन वांग कहती हैं, "हम बता रहे हैं कि चीन के 100 आला रियल एस्टेट डेवलपर्स में से करीब साठ डिफ़ॉल्टर हो चुके हैं और जो बाकी 40 हैं, वो भी जल्दी ही डिफॉल्टर हो सकते हैं. इसे देखते हुए घर खरीदने वाले असहज स्थिति में हैं. कई लोग सौदे से बाहर निकल जाना चाहते हैं. जो लोग पैसे दे चुके हैं, वो अपने पैसे की सुरक्षा तय करना चाहते हैं."
जोख़िम में सिर्फ़ बैंक नहीं हैं, प्रॉपर्टी में निवेश करने वालों के लिए भी ये एक नए क़िस्म का ख़तरा है. डैन वांग कहती हैं कि चीन में लोगों को लगता था कि प्रॉपर्टी मार्केट हमेशा ऊपर ही जाएगा, लेकिन अब लोगों में ये भरोसा पैदा कर दिया गया है कि हाउसिंग मार्केट के अच्छे दिन लद गए हैं.

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आर्थिक मंदी

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के चाइना सेंटर में रिसर्च एसोसिएट जॉर्ज मैग्नस कहते हैं, "चीन का विकास अनूठा मुद्दा है. कोई भी देश हमेशा दहाई के आंकड़े के साथ तरक्की करता नहीं रह सकता है."
जॉर्ज मैग्नस ने एक क़िताब लिखी है, 'रेड फ्लैग्स, व्हाई शीज़ चाइना इज़ इन जेपर्डी.'
वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि इस साल चीनी अर्थव्यवस्था की तरक्की दर एशिया प्रशांत क्षेत्र के बाकी हिस्से के मुक़ाबले पीछे रह जाएगी. ऐसा 30 साल से ज़्यादा वक़्त में पहली बार होगा.
जॉर्ज बताते हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था कई दिक्कतों से जूझ रही है लेकिन इनमें सबसे अहम है मानवाधिकार और विदेश नीति को लेकर पश्चिमी देशों के साथ मनमुटाव.
जॉर्ज मैग्नस बताते हैं, "चीन के लिए कारोबार और प्रतिबंधों के लिहाज से बाहरी कारण बहुत जटिल हो गए हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे, शिनजियांग प्रांत में लोगों के साथ बर्ताव का मुद्दा, हॉन्ग कॉन्ग पर सख़्ती, एशिया और साउथ चाइना सी में ताइवान को लेकर दूसरे देशों के साथ बनी दिक्कतों जैसी बहुत सी बातें कारोबार और निवेश के लिहाज से चीन की संभावनाओं को प्रभावित कर रही हैं."
जार्ज कहते हैं कि चीन ने बाकी दुनिया से कारोबारी संपर्क जोड़कर आर्थिक तरक्की हासिल की और अब वो संपर्क काट रहा है. अमेरिका और दूसरे देश भी उसे अलग कर रहे हैं.
चीन के नेता शी जिनपिंग ने पार्टी की हालिया कांग्रेस में ऐसे कोई संकेत नहीं दिए कि वो दूसरे देशों से संपर्क मजबूत करने के लिए काम करेंगे. बल्कि उन्होंने अपनी विदेश नीति को और मज़बूती के साथ आगे बढ़ाने का इशारा किया.
संकेत ये भी मिला कि राजनीतिक लक्ष्य और पार्टी के लिए प्रतिबद्धता उनके लिए अर्थव्यवस्था की सेहत से ज़्यादा मायने रखती है.

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2019 में इसका उदाहरण मिल चुका था. तब चीन के सबसे अमीर व्यक्ति जैक मा ने सरकार की खुलेआम आलोचना की थी. कुछ दिन बाद वो रहस्यमय तरीके से ओझल हो गए. कई महीने बाद वो फिर सामने आए और चुप्पी साध ली.
जॉर्ज मैग्नस कहते हैं, "मुझे लगता है कि ये लोगों, कंपनियों और उद्यमियों पर दबाव बनाने का तरीका है. उन्हें कहा जा रहा है कि वो खुद को संयत रखें और पार्टी के दिशानिर्देशों का पालन करें. मुझे लगता है कि ये दुश्मनों को जेल में डालने से बेहतर तरीका है."
कोविड प्रतिबंधों ने भी दिक्कतें बढ़ाई हैं. इस साल सरकार ने सौ से ज़्यादा शहरों में लॉकडाउन लगाया.
जॉर्ज मैग्नस कहते हैं, "ये दिलचस्प स्थिति है. दो वजह हैं जिन्हें लेकर चीन ज़ीरो कोविड नीति को छोड़ नहीं सकता है. पहली है लोगों का स्वास्थ्य. 2024 या 2025 तक उनके पास अपनी एमआरएनए वैक्सीन नहीं होगी. दूसरी वजह है सामाजिक नियंत्रण. सरकार लोगों को बांधकर रखना चाहती है. ज़ीरो कोविड नीति के तहत लोगों पर नियंत्रण का अवसर मिलता है."
चीन के आर्थिक प्रबंधन को लेकर एक और बात है जिस पर सवाल उठाए जा रहे हैं, ये है सामूहिक समृद्धि. ये विचार साल 2021 के मध्य में आगे बढ़ाया गया. इसका मकसद चीनी संसाधन के बड़े हिस्से को ग़रीबों तक ले जाना था.
हालांकि, जॉर्ज कहते हैं कि इसका मतलब क्या है, ये साफ़ नहीं हैं.

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चीन के सामने विकल्प

यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेनेसी में सप्लाई चेन मैनेजमेंट की क्लिनिकल एसोसिएट प्रोफ़ेसर सारा सू कहती हैं, "मुझे लगता है कि चीन की अर्थव्यवस्था को एक राह तय करनी होगी. आर्थिक तरक्की की गिरावट रोकने की ज़रूरत है. कर्ज़ के जाल ने पूरे सिस्टम को घेरे में ले लिया है. ये एक टिकाऊ परिदृश्य नहीं है."
आगे बढ़ने के रास्ते में पहला अवरोध स्थानीय सरकारों के भारी कर्ज हैं. दूसरी बात ये है कि जब प्रॉपर्टी क्षेत्र की बड़ी कंपनी एवरग्रैंड ने कहा कि वो बकाया चुकाने की स्थिति में नहीं है तब अर्थव्यवस्था का भरोसा डंवाडोल हो गया.
सारा सू कहती हैं, "विदेशी निवेशकों को बॉन्ड डिफॉल्ट होने पर हैरानी हुई. ये रियल सेक्टर के ऐसे बॉन्ड थे जिनके पीछे सरकार की गारंटी मानी जा रही थी. वो मान रहे थे कि सरकार इस कर्ज की भरपाई करेगी क्योंकि इसके पीछे गारंटी दी गई थी. लेकिन बॉन्ड डिफॉल्ट होने पर उन्हें भुगतान नहीं हुआ. मुझे लगता है कि विदेशी निवेशकों को इससे झटका लगा."
सारा कहती हैं कि फिलहाल लोगों को लग रहा है कि आर्थिक संकट के चलते उनकी नौकरी ख़तरे में आ सकती है. जायदाद की कीमतें गिरने से भी वो फिक्रमंद हैं. लोगों को डर है कि प्रॉपर्टी में उन्होंने जो पैसे लगा रखे हैं, वो भी डूब सकते हैं. अब वो अपनी बचत बढ़ाएंगे और उतने पैसे ख़र्च नहीं करेंगे. दिक्कतें यहीं ख़त्म नहीं होती. बेरोज़गारी भी चरम पर है. लॉकडाउन के दौरान लोगों ने अपनी खपत भी घटा दी. वो कीमतें घटने तक इंतज़ार करना चाहते हैं.
सारा सू कहती हैं, "मुझे लगता है कि चीन में महंगाई दर कम है. बल्कि कई जगह तो कीमतें पहले से भी कम हैं. पश्चिमी देशों में जैसा देखने में आ रहा है, चीन में स्थिति उसके आसपास भी नहीं है. क्योंकि यहां मांग ही नहीं है."
अब सवाल ये है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आगे के लिए क्या योजना है, ऐसा लगता है कि चीन में राजनीतिक नियंत्रण और अर्थव्यवस्था को फलने फूलने के लिए जो आज़ादी चाहिए, उसके बीच एक असंतुलन है.
सारा सू कहती हैं, "मुझे लगता है कि ये एक मुश्किल स्थिति है. अतीत में आर्थिक तरक्की की वजह से लोग अपेक्षाकृत संतुष्ट थे. अब अर्थव्यवस्था में शायद ही कहीं चमक दिखाई देती है. लेकिन मुझे लगता है कि चीन की तरक्की जारी रहेगी. ख़ासकर तकनीक के क्षेत्र में. नई तकनीक जैसे कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, ब्लॉकचेन, क्लाउड कंप्यूटिंग और बिग डेटा के क्षेत्र में चीन के पास महारथ है. इसलिए वो इन क्षेत्रों में आगे बढ़ता रहेगा."
लौटते हैं उसी सवाल पर क्या चीनी अर्थव्यवस्था मुश्किल में है?
साफ़ है कि चीन में तरक्की की रफ़्तार सुस्त पड़ गई है. कर्ज़ देश की अर्थव्यवस्था के दोगुने से ज़्यादा हो चुका है.
आर्थिक उदारीकरण से समृद्धि के रास्ते खुल सकते हैं. इसके लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग को नियंत्रण हटाना होगा लेकिन उनकी कार्यशैली संकेत देती है कि इसकी संभावना न के बराबर है.
अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ेंगी या घटेंगी, ये इस बात से तय होगा कि क्या चीन कर्ज़ के बढ़ते बोझ को संभाल पाएगा.
फिलहाल तो यही लगता है कि तेज़ रफ़्तार तरक्की के दिन हवा हो चुके हैं और एक बेरौनक युग की शुरुआत हो चुकी है.
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