COP28 जलवायु सम्मेलनः तेल कंपनी के बॉस को क्यों बनाया कॉन्फ्रेंस का अध्यक्ष

सुल्तान अल जबर

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इमेज कैप्शन, संयुक्त अरब अमीरात की स्टेट ऑयल कंपनी के सीईओ सुल्तान अल जबर
    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

इस साल के यूएन क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस (COP28) की अध्यक्षता के लिए सुल्तान अल जबर का नाम आगे कर संयुक्त अरब अमीरात ने विवाद खड़ा कर दिया है.

सुल्तान अल जबर यूएई की सरकारी ऑयल कंपनी के प्रमुख हैं. इसलिए ये सवाल उठ रहे हैं कि वो शख़्स जो जमी़न से तेल निकालने के बिज़नेस में है, वो जलवायु संकट के मुद्दों को कितनी तवज्जो देगा?

यूएई दुनिया के 10 सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में से एक है. तेल निर्यातक देशों की संस्था ओपेक के आंकड़े के मुताबिक, यूएई की सरकारी तेल कंपनी एडनॉक (ADNOC) ने 2021 में हर रोज़ 27 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन किया.

लेकिन कंपनी का उत्पादन लक्ष्य आने वाले दिनों में और बड़ा होने वाला है. कंपनी के सीईओ सुल्तान अल जबर के निर्देशों के मुताबिक कंपनी 2027 तक तेल का रोज़ाना उत्पादन दोगुना करने जा रही है. लक्ष्य है हर दिन करीब 50 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन.

ऐसे लक्ष्यों को लेकर एडनॉक की वेबसाइट पर लिखा है, 'हम एक उभरती हुई कंपनी हैं...जो पूरे यूएई के अविकसित तेल और गैस भंडारों की खोज के लिए प्रतिबद्ध है.'

एडनॉक के ऐसे लक्ष्यों के आधार पर तमाम क्लाइमेट एक्टिविस्ट और जलवायु अभियान से जुड़े लोग ये सवाल उठा रहे हैं.

वो पूछ रहे हैं कि इतनी बड़ी तेल उत्पादक कंपनी के सीईओ COP28 कॉन्फ्रेंस में अपनी भूमिका कैसे निभाएंगे? इस कॉन्फ्रेस के जरिए सदस्य देशों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की अपील की जाती है.

मौजूदा स्थिति में अगर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की बात करें तो हालात बेहद गंभीर नजर आते हैं. पिछले साल जारी संयुक्त राष्ट्र संघ के आकलन के मुताबिक अभी जो नीतियां हैं उसकी वजह से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 2030 तक 2010 के मुकाबले 10 फ़ीसदी तक बढ़ जाएगा.

जबकि जरूरत है 2019 के मुकाबले उत्सर्जन में 43 फीसदी कमी की, ताकि वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री के औद्योगिकरण के पहले के स्तर पर रोका जा सके.

ऐसी स्थिति की गंभीरता को समझाते हुए 350.org के प्रमुख ज़ीना खलील हज कहती हैं, "ये ठीक वैसा ही है, जैसे कैंसर के इलाज पर कॉन्फ्रेंस की अगुवाई के लिए आप किसी सिगरेट कंपनी के सीईओ को न्यौता दे दें."

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सुल्तान अल जबर- क्लाइमेट चेंज के हीरो या विलेन?

ज़ीना खलील की संस्था 350.org पूरी दुनिया से जीवाश्म इंधनों का इस्तेमाल बंद करने की वकालत करती है.

कॉन्फ्रेंस को लेकर आशंका जताते हुए वो कहती हैं, "हमें चिंता इस बात की है कि COP28 हमारे मक़सद से अलग इस बार कहीं तेल और गैस डील का मेला न बन जाए. इस कॉन्फ्रेंस को हम तेल और गैस इंडस्ट्री का व्यापार केन्द्र नहीं बनने दे सकते."

एमनेस्टी इंटरनेशनल की क्लाइमेट एडवाइज़र कियारा लिगोरी भी मानती हैं कि सुल्तान की नियुक्ति से ग़लत संदेश गया है.

वो कहती हैं, "ये फ़ैसला उन सबको निराश कर देने वाला है जो COP28 से कार्बन उत्सर्जन की दर में कमी और जलवायु के मोर्चे पर इंसाफ़ की उम्मीद कर रहे हैं."

इन आलोचनाओं के बीच सुल्तान अल जबर का एक दूसरा रूप भी है. वो एडनॉक के सीईओ और यूएई के इंडस्ट्री और एडवांस टेक्नोलॉजी मंत्री होने के साथ MASDAR के चेयरमैन भी हैं. ये एक रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी है, जो 40 से ज़्यादा देशों में सक्रिय है.

2006 में लॉन्च की गई MASDAR ने मुख्य तौर पर सोलर और विंड पॉवर एनर्जी परियोजनाओं में निवेश किया है. इन सभी परियोजनाओं की क्षमता है 15 गीगावाट्स, जिससे कार्बन उत्सर्जन में सालाना 2 करोड़ टन की कमी आ सकती है.

एडनॉक की तरह MASDAR के भी अपनी महात्वाकांक्षी परियोजनाएं हैं. 2030 तक ये कंपनी अपनी क्षमता 15 गीगावाट्स से 100 गीगावाट्स तक बढ़ाना चाहती है. इसके बाद जल्दी ही इसकी क्षमता दोगुनी, यानी 200 गीगावाट्स से अधिक करने का लक्ष्य है.

दिलचस्प बात ये भी है कि यूएई जैसा देश जिसकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार तेल उत्पादन है, उसने 2050 तक कार्बन न्यूट्रल देश होने का ऐलान किया है.

हालांकि यूएई ने ये लक्ष्य हासिल करने का रोडमैप नहीं बताया है. ये कैसे मुमकिन होगा जब एडनॉक का लक्ष्य है यूएई के सभी अविकिसत तेल और गैस भंडारों का दोहन करना? यूएई का कुल ज्ञात कच्चा तेल भंडार 111 अरब बैरल है.

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इमेज कैप्शन, MASDAR की अबु धाबी में बनाई 'लो कार्बन सिटी'

...तो दो लक्ष्यों को एक साथ लेकर कैसे चलेंगे सुल्तान?

पिछले अक्टूबर में जब अबू धाबी में इंटरनेशनल पेट्रोलियम एक्ज़िबिशन और कॉन्फ्रेंस का आयोजन हुआ था, तो इसे संबोधित करते हुए सुल्तान ने कहा था कि 'दुनिया की आज ज़रूरत है न्यूनतम उत्सर्जन के साथ अधिकतम उर्जा.'

सुल्तान ने अपने संबोधन में आगे कहा था, "दुनिया को हर मुमकिन उपाय करने होंगे. तेल औऱ गैस के साथ सोलर, विंड, न्यूक्लियर और हाईड्रोजन से बनने वाली उर्जा के साथ क्लीन एनर्जी भी विकसित करनी होगी और इसका उत्पादन व्यावसायिक स्तर पर करना होगा."

यूएई की सरकारी न्यूज़ एजेंसी WAM ने सुल्तान के एक बयान का ज़िक्र करते हुए लिखा कि 'एक देश के तौर पर हम COP28 बड़े लक्ष्यों के साथ पूरी ज़िम्मेदारी के साथ देख रहे हैं. इसमें हम ऐसे वास्तविक और व्यावहारिक समाधान लाएंगे, जिससे जलवायु में सुधार के साथ कम कार्बन उत्सर्जन के साथ आर्थिक विकास संभव हो सकेगा.'

यूएन क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में प्रतिनिधियों के पास एक मौका होता है मेजबान देश के नामित किए गए प्रेसिडेंट के नाम को मंजूर करने का. आमतौर पर नॉमिनी को मंजूर कर लिया जाता है. इस बार ये सुल्तान अल जबर के साथ भी मुमकिन हो सकता है.

बीबीसी से बातचीत में कांगो के प्रमुख जलवायु वार्ताकार क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस में अफ्रीकी समूह के प्रमुख तोसी मपानू ने कहा, "सुल्तान अल जबर को ग्रीन हाउस गैसों के बुरे उत्पादक के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि ये भी देखना चाहिए कि रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में वो क्या कर रहे हैं. वो जीवाश्म ईंधन डीकार्बनाइज़ेशन के साथ वो समझते हैं कि हम कैसे रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ बढ़ सकते हैं."

उधर अमेरिकी राष्ट्रपति के दूत जॉन कैरी ने भी ट्वीट कर कहा कि 'सुल्तान अल जबर की दोहरी 'भूमिकाओं का अनूठा मिश्रण' सभी स्टेकहोल्डर्स को एक साथ लाने और तेजी से आगे बढ़ने में मददगार होगा.'

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी अल जबर को बधाई देते हुए ट्वीट किया कि "उर्जा और जलवायु परिवर्तन पर आपका व्यापक अनुभव COP28 के सफल आयोजन का शुभ संकेत देता है."

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इमेज कैप्शन, सुल्तान अल जबर के नॉमिनेशन को पर्यावरणविदों से ज्यादा राजनयिकों का समर्थन

सुल्तान अल जबर के पक्ष में कौन?

गौरतलब है कि सुल्तान अल जबर की नियुक्ति का विरोध देश नहीं करेंगे, जिनकी अर्थव्यस्था कोविड महामारी में बुरी तरह प्रभावित हुई है और इसकी वजह से इन्होंने क्लीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स की रफ़्तार धीमी कर दी है.

इसके अलावा वो देश भी सुल्तान के ख़िलाफ़ नहीं खड़े होंगे, जिन्होंने रूसी गैस पर निर्भरता खत्म करने के लिए कोयले का इस्तेमाल बढ़ा दिया है. जलवायु के लिहाज से कोयला तीन सबसे ज़्यादा हानिकारक ईंधनों में से एक है.

बाकी वो देश भी कुछ नहीं बोल पाएंगे जिन्होंने एलपीजी गैस के आयात के लिए बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर लिया है. यानी ऐसे देश कच्चे तेल और गैस जैसे जीवाश्व ईंधनों पर निर्भरता आने वाले बरसों में भी बनाए रखेंगे.

साल 2012 में जब क़तर ने COP18 कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी की थी, तब उसने अपने उर्जा मंत्री अब्दुल्ला बिन हमद अल अतिया को प्रेसिडेंट नॉमिनेट किया था. लेकिन उनका चुनाव नहीं हुआ.

तब से लेकर आज 11 साल बाद जलवायु संकट को लेकर बहुत कुछ बदल चुका है. तब के मुकाबले आज इसे ज्यादा गंभीरता के साथ संबोधित किया जाता है.

जहां तक बात जलवायु परिवर्तन के मौजूदा हालात का सवाल है, तो वैज्ञानिक इसे 'अलार्मिंग' बता चुके हैं. चरम मौसमी घटनाओं के साथ धरती का तापमान पहले ही पूर्व-औद्योगिक काल से 1.1 डिग्री सेंटिग्रेड ज़्यादा हो चुका है.

COP की पिछली कई बैठकों से मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों की आलोचना इस बात के लिए लगातार होती रही है, कि वो ग्लोबल कार्बन उत्सर्जन की मात्रा कम करने में अपनी तरफ़ से सख़्त कदम नहीं उठा रहे है.

पिछले साल जब मिस्र में COP27 का आयोजन हुआ, तो इसमें जीवाश्म इंधन के सैकड़ों लॉबिस्ट को शामिल किया गया. इसके लिए आयोजकों की खूब आलोचना हुई.

कॉन्फ्रेंस का जो अंतिम फ़ैसला था, उसमें कोयले से उर्जा उत्पादन बंद करने की तो बात की गई, लेकिन जीवाश्म ईंधनों के सवाल पर कुछ नहीं कहा गया.

यही वजह है आज दुनिया भर के क्लाइमेट एक्टिविस्ट सुल्तान अल जबर की अध्यक्षता में होने वाले COP28 को लेकर मुखर नज़र आ रहे हैं.

इसका आयोजन 30 नवंबर से होना है. अगर इसमें कार्बन उत्सर्जन कम करने के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो विवाद और और बढ़ेगा.

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