सीओपी 27 : जलवायु परिवर्तन से जुड़े अहम सम्मेलन में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों?

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- Author, एस्मी स्टॉलर्ड
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, जलवायु और विज्ञान
मिस्र के शर्म अल-शेख में चल रहे जलवायु परिवर्तन सम्मेलन सीओपी27 में होने वाली बातचीत में काफी कम महिलाएं हिस्सा ले रही हैं.
चैरिटी संगठन,पर्यावरण कार्यकर्ताओं और राजनेताओं ने इसे लेकर चेताया है.
बीबीसी के विश्लेषण से दौरान पता चला है मिस्त्र में चल रहे यूएन के इस सम्मेलन के दौरान जलवायु परिवर्तन को काबू करने के मामले में तमाम देशों के बीच होने वाली सौदेबाजियों से जुड़ी टीमों में महिलाओं की संख्या 34 फीसदी से भी कम है.
इस बात के प्रमाण हैं कि महिलाओं पर जलवायु परिवर्तन का असमान बोझ है. इसके बावजूद ये स्थिति है.
सरकारी अधिकारियों और बेहतर पर्यावरण के लिए अभियान चलाने वालों का कहना है कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ाए बिना जलवायु परिवर्तन की समस्या नहीं सुलझेगी.
खराब पर्यावरण महिलाओं की ज़िंदगी के लिए और मुश्किलें ही खड़ी करेगा.
ब्राज़ील में मिना जरायस के क्रेनाक समुदाय की एक मूल निवासी महिला शर्ली जुकुरना क्रेनेक ने बीबीसी से कहा कि महिलाएं हमेशा से इस धरती को बचाने की लड़ाई लड़ती रही हैं.
वो कहती हैं,'' महिलाओं को पता है कि समुदाय में रहने का क्या मतलब होता है.''
इसका मतलब दूसरों की और प्रकृति की परवाह करना है.
महिलाओं की कम भागीदारी
शर्ली ने बीबीसी से कहा कि खास तौर पर मूल निवासी महिलाओं ने हमेशा से पर्यावरण संरक्षण के लिए लड़ाई लड़ी है, इसलिए हमारा सम्मान होना चाहिए. लोगों को हमारी बात सुननी चाहिए. ''
पिछले सप्ताह सीओपी27 में जुटे दुनिया भर के नेताओ ने सम्मेलन शुरू होने पर समूह में तस्वीरें खिंचवाईं. वहां 110 नेता मौजूद थे लेकिन उनमें में से सिर्फ दस महिलाएं थीं.
विमेन एनवॉयरनमेंट एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक यूएन के इस पर्यावरण सम्मेलन में ये महिलाओं की अब तक सबसे कम भागीदारी है. ये संगठन इस तरह के सम्मेलनों में महिलाओं की भागीदारी पर नज़र रखती है.
पर्यावरण सम्मेलन में भाग लेने आई तमाम देशों की टीमों में पुरुष नेताओं की ज्यादा भागीदारी एक व्यापक प्रवृति को दिखाती है.
बीबीसी ने इस सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले भागीदारों की सूची का विश्लेषण किया है और पाया है कि इन देशों की विचार-विमर्श और सौदेबाजी करने वाली टीमों में 34 फीसदी से भी कम महिलाएं हैं. कुछ टीमों में तो पुरुषों की संख्या 90 फीसदी से भी अधिक है.
ये टीमें जलवायु परिवर्तन को काबू करने के लिए फंडिंग और जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को सीमित करने जैसे मुद्दे पर बातचीत और सौदेबाजी करती हैं.

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महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की मांग
2011 में इस तरह की बातचीत में हिस्सा लेने वाले देशों ने ये वादा किया था कि वे महिलाओं की तादाद बढ़ाएंगे.
लेकिन विमेन एनवॉयरनमेंट एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक 2018 में ये तादाद 40 फीसदी बढ़ने के बाद घटती गई है.
रवांडा की कैबिनेट में 52 फीसदी महिलाएं हैं. रवांडा की पर्यावरण मंत्री डॉ. जीन डी'आर्क मुजावामारिया ने बीबीसी से कहा कि महिलाओं की कम भागीदारी से इन बातचीत के नतीजों पर असर पड़ेगा.
जलवायु परिवर्तन संकट पर यूएस सेलेक्ट कमेटी की अध्यक्ष कैथी केस्टर ने भी इस बात पर सहमति जताई.
उन्होंने कहा, ''पर्यावरण बेहतर करने के लिए ये बेहद जरूरी है कि युवा महिलाओं और लड़कियों को इस बारे में शिक्षित किया जाए. लेकिन इसका मतलब ये भी है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बातचीत की मेज पर उनकी भी भागीदारी हो. ''

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जलवायु परिवर्तन की ज्यादा मार महिलाओं पर
सोमवार को चैरिटी संगठन एक्शन-ऐड ने बताया कि जलवायु परिवर्तन की समस्या जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे महिलाओं के सामने ज्यादा और खास तरह के जोखिम पैदा हो रहे हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की सबसे ज्यादा मार झेल रहे कई विकासशील देश अपने परिवार के पानी, भोजन और ईंधन का इंतजाम करने वाले महिलाओं पर ज्यादा जिम्मेदारी है.
बाढ़, सूखे और जलवायु परिवर्तन से जुड़े दूसरे संकट के वक्त उनका ये काम और मुश्किल हो सकता है.
खेती-बाड़ी का काम करने वाले लोगों मे ज्यादा तादाद महिलाओं की ही है इसलिए जब भयंकर सूखा पड़ेगा तो निश्चित तौर पर उनकी आय भी नहीं हटेगी. पूर्वी अफ्रीका में ऐसा देखने को मिला है.
संयुक्त राष्ट्र के आकलन के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की वजह से विस्थापन होने वाले लोगों में से 80 फीसदी महिलाएं हैं.

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जलवायु परिवर्तन लैंगिक असमानता भी बढ़ा रहा है
केन्या में काकुला रिफ्यूजी कैंप में फिलहाल काम करने वाली और इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी की हेल्थ मैनेजर डॉ. सिला मोंथे ने बीबीसी से कहा कि सूखा प्रभावित इलाकों में उन्होंने महिलाओं और छोटी उम्र की लड़कियों में पोषण की कमी देखी है.
उनका कहना है, '' इसकी वजह ये है कि वो परिवार में सबसे आखिर में खाना खाती है और उन्हें सबसे खराब खाना मिलता है. ''
ये भी चिंता की बात है कि महिलाओं को भोजन और पानी जुटाने के लिए काफी दूरी नापनी पड़ती है और इसमें उनके हिंसा का शिकार होने की आशंका बनी रहती है.
एक्शन-ऐड में सीनियर क्लाइमेट एडवाइजर सोफी रिज ने बीबीसी से कहा कि जलवायु परिवर्तन लैंगिक असमानता भी बढ़ा रहा है.
लिहाजा सीओपी27 में उन समस्याओं के हल निकाले जाने चाहिए, जिनका महिलाओं को सामना करना पड़ रहा है.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक महिलाएं जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली समस्या का मुकाबला करने में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रही हैं.
जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर काम न करने वाली सरकारों के ख़िलाफ़ सबसे प्रसिद्ध मुकदमे उन्होंने ही लड़े हैं.

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यूरोप और उत्तरी अमेरिकी देशों में ज्यादा संतुलन
वर्ल्ड बैंक में डायरेक्टर फॉर जेंडर हाना ब्रिक्सी ने कहा इस बात के प्रमाण बढ़ते जा रहे हैं कि सीओपी27 जैसे वैश्विक मंच पर महिलाओं की भागदारी से नतीजे बेहतर निकलते हैं.
एक्शन-ऐड की रिज इस पर सहमति जताती हैं. वो कहती हैं,'' महिलाएं ऐसे उपाय सुझाती हैं जिनसे लंबे वक्त तक समस्याओं को सुलझाने में मदद मिलती है. ''
ब्रिक्सी का कहना है इस वजह से जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए काम कर संगठनों और सरकारों में इसके उपाय के लिए उठाए जाने वाले कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है.
मिस्र में चल रहे सीओपी के विश्लेषण से बीबीसी ने पाया है कि यूरोप, उत्तरी अमरेका और द्वीपीय देशों की टीमों ज्यादा संतुलन की संभावना है.
यानी महिलाओं और पुरुषों की संख्या बराबर होने की संभावना रहती है. लेकिन अफ्रीकी और मध्य पूर्व के देशों की टीमों में संतुलन पुरुषों की ओर होने की संभावना होती है.
अमेरिकी दल में शामिल केस्टर ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर उनके देश की ओर से बात करने वालों ने सम्मेलन के मेजबान देश से महिलाओं की कम भागीदारी का सवाल उठाया है.
अमेरिकी दल दूसरे देशों से भी इस मुददे पर बात करेगा.
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