बांग्लादेश: सियासी प्रदर्शनों के बीच सरकार पर विरोधियों की प्रताड़ना के गंभीर आरोप

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इमेज कैप्शन, शनिवार को ढाका में सरकार विरोधी प्रदर्शन में लोगों की भारी भीड़
    • Author, रजनी वैद्यनाथन
    • पदनाम, बीबीसी दक्षिण एशिया संवाददाता
बीबीसी हिंदी
  • विपक्षी बांग्लादेश नेशनल पार्टी का देशव्यापी प्रदर्शन का ऐलान
  • प्रधानमंत्री शेख़ हसीना पर चुनाव में धांधली कर सत्ता हथियाने का आरोप
  • सरकार विरोधी रैली में लोगों ने नारे लगाए- 'शेख़ हसीना वोट चोर है'
  • सरकार से स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से नए चुनाव कराने की मांग
  • बढ़ती महंगाई और मनवाधिकार हनन को लेकर भी गंभीर आरोप

"मेरे साथ ऐसे बर्ताव किया गया जैसे मैं चिड़ियाघर में बंद कोई जानवर हूं. वो मेरी आंखों पर हर वक्त पट्टी बांधे रखते थे. मेरे पीठ पीछे बंधे हाथों में बंधी हथकड़ियां भी सिर्फ़ खाना खाने के वक्त खोलते थे."

ये आपबीती सुनाते हुए बांग्लादेश के पत्रकार शफ़ीक़ुल इस्लाम काजोल उन 53 दिनों कों का पूरा ब्योरा बताते हैं जब उन्हें जबरन उठाकर एक भूमिगत जेल में रखा गया था. काजोल का ये आरोप है कि उन्हें इस पूरे दौरान बड़ी यातनाएं दी गईं.

"कई बार वो पूछताछ के लिए ले जाने से पहले मुझे बुरी तरह पीटते थे. उस दर्द को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता."

काजोल बताते हैं "वो मुझसे मेरी लिखी ख़बरों के बारे में पूछते थे. इस दौरान जिस पीड़ा से मैं गुजरा उसे बताने में आज भी मुश्किल होती है. "

जेल के दौरान काजोल के साथ जो भी हुआ उसकी पुष्टि बीबीसी स्वतंत्र रूप से नहीं करता. उन्होंने अपनी बात एक अज्ञात जगह से हमसे साझा की. 54 साल के काजोल आगे बताते हैं "इस देश में मानवाधिकार नाम की कोई चीज़ नहीं है. मैं लगातार ख़ौफ़ के साए में जी रहा हूं."

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इमेज कैप्शन, पत्रकार शफ़ीक़ुल इस्लाम काजोल का आरोप सरकार ने जबरन उठाया, यातनाएं दी

काजोल ने ये आपबीती हमसे उसी सप्ताह सुनाई जब राजधानी ढाका में सुरक्षा बलों और विपक्षी बांग्लादेश नेशनल पार्टी (BNP) के बीच झड़प हुई थी. बीएनपी ने सरकार विरोधी प्रदर्शन बांग्लादेश के मानवाधिकार दिवस पर किया था.

बीएनपी ने लोगों से अपील की थी कि वो प्रधानमंत्री शेख़ हसीना और उनकी आवामी लीग पार्टी की सरकार के खिलाफ़ सड़कों पर उतरे. बीएनपी की रैली का मुख्य मक़सद था स्वतंत्र और पारदर्शी रूप से चुनाव कराने, बढ़ती महांगाई पर काबू करने और मानवाधाकिर हनन के बढ़ते मामलों की तरफ ध्यान आकर्षित करना.

सुरक्षा बलों ने प्रदर्शन पर बल प्रयोग के दौरान विपक्ष के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया था. इस पर सरकार की काफी आलोचना हुई और इसे विरोध के सुरों को दबाने का अनैतिक तरीका बताया गया. हालांकि सरकार ने इस कार्रवाई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मानने से इंकार किया.

बीबीसी से बातचीत में बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल मोमेन ने कहा कि विपक्ष के ऐसे आरोप बेबुनियाद हैं. "विपक्ष के इन आरोपों में कोई दम नहीं कि हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट रहे हैं. 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के बाद एक देश के रूप में बांग्लादेश का गठन ही लोकतंत्र, मानवाधिकार और इंसाफ़ की रक्षा के मक़सद के साथ हुआ था."

काजोल के गुमशुदा होने की ख़बर मार्च 2020 में आई थी. तब संयुक्त राष्ट्र संघ समेत तमाम संगठनों ने इस पर चिंता जताई थी. एक बयान में यूएन ने कहा था-"शफ़ीक़ुल इस्लाम काजोल जैसे खोज़ी पत्रकारों को इस तरह निशाना बनाना स्वतंत्र पत्रकारिता को लेकर बांग्लादेश सरकार की प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े करता है."

लापता होने से एक दिन पहले काजोल का एक लेख छपा था, जिसमें सेक्स ट्रैफिकिंग में कुछ राजनेताओं की संलिप्तता से जुड़े ब्योरे दिए गए थे. काजोल के वकील के मुताबिक इस लेख के छपने के बाद सत्ताधारी आवामी लीग़ पार्टी के एक नेता ने उनपर मुक़दमा दर्ज कराया था.

अपहरण के बाद...

बांग्लादेश में प्रदर्शन

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काजोल के मुताबिक अगले दिन जब वो अपने बेटे को स्कूल से घर छोड़कर दफ्तर के लिए निकल रहे थे, तब आठ से 10 बाइक सवारों ने उनकी बाइक का पीछा करना शुरु किया. इसके बाद उन्हें एक मिनी वैन में डाल कर एक भूमिगत कोठरी में ले जाया गया.

उन दिनों को याद करते हुए काजोल बताते हैं "पूछताछ के दौरान मुझे कुर्सी से बांध दिया जाता था. वो पूछते थे कि मैंने सेक्स ट्रैफिकिंग के बारे में क्यों लिखा? ये सिलसिला कई बार 5 से 6 घंटे तक चलता था. वो सब बेहद भयानक था"

हालांकि काजोल की गिरफ्तारी को लेकर सरकार का पक्ष कुछ और है. बीबीसी से बातचीत में बांग्लादेश के गृह मंत्री ने बताया कि काजोल को कुछ लड़कियों की फोटो एडिट कर सोशल मीडिया पर डालने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. "उन लड़कियों ने शफ़ीक़उल इस्लाम काजोल के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी. इसके बाद उनकी गिरफ़्तारी हुई और क़ानून के मुताबिक़ उन्हें अगले दिन कोर्ट में पेश किया गया"

गृह मंत्री ने काजोल को भूमिगत कोठरी में 50 दिन से ज़्यादा दिन तक क़ैद रखने के आरोपों को भी खारिज किया.

बांग्लादेश में मानवाधिकार के मामलों की निगरानी करने वाली संस्था 'ह्यूमन राइट्स वॉच' के मुताबिक़ बांग्लादेश में ऐसे गुप्त यातना शिविरों को लेकर उसे भी ख़बर है. इस पर उसने बांग्लादेश सरकार से ऐसे डिटेंशन कैंप्स को लेकर लगने वाले आरोपों की जांच कराने और यहां क़ैद किए लोगों को आज़ाद करने की अपील भी की थी.

बीबीसी से बातचीत में संगठन की दक्षिण एशिया डाइरेक्टर मीनाक्षी गांगुली ने बताया- "हमने अक्सर ये सुना है कि लोगों को बिलकुल कम रौशनी वाली भूमिगत कोठरियों में रखा जाता है. कुछ लोगों ने यहां तक कहा कि उन्हें अपने आस-पास टॉर्चर किए जा रहे दूसरे लोगों की चीखें सुनाई देती थीं. ये बेहद परेशान कर देने वाला है. "

हालांकि सरकार ऐसे डिटेंशन कैंप्स होने की बात से इंकार करती है.

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इमेज कैप्शन, अपने लापता घरवालों की फोटो दिखाते परिजन

काजोल बताते हैं बीच रास्ते से उठाए जाने के बाद महीने भर तक उन्हें एक ही लोकेशन पर दो अलग अलग भूमिगत कोठरियों में रखा गया. इसके बाद उन्हें भारत की सीमा से लगे एक मैदान में फेंक दिया गया. उनके हाथ अब भी बंधे थे और आंखों पर पट्टी थी. यहां से सीमा सुरक्षा बलों ने उन्हें उठाया और जेल में डाल दिया. इस जेल में वो 237 दिन तक रहे और आखिरकार रिहाई की 13 अपीलों के बाद दिसंबर 2020 में उन्हें ज़मानत मिली.

जेल में रहते हुए ही काजोल पर बांग्लादेश डिजिटल सिक्योरिटी एक्ट के तहत मानहानि का मुक़दमा दर्ज किया गया. डिज़िटल सिक्योरिटी एक्ट को आलोचक विरोध की हर आवाज को दबाने वाला कठोर कानून बताते हैं. इसके तहत सरकार के विरोध में लिखा गया एक सोशल मीडिया पोस्ट भी आपको गुनहगार बना सकता है. 2018 में इस क़ानून के लागू होने के बाद से हज़ारों लोग इसके तहत आरोपी बनाए जा चुके हैं.

'ह्यूमन राइट्स वॉच' के मुताबिक काजोल के साथ जो किया गया, वो तरीक़ा पुलिस अक्सर सरकार की आलोचना को दबाने के लिए अपनाती है. बांग्लादेश के अलग अलग मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक 2009 के बाद से काजोल जैसे 600 लोग सुरक्षा बलों के द्वारा जबरन उठाए गए.

इसी साल अगस्त में छपी संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक सुरक्षा बलों द्वारा उठाए गए ऐसे 72 लोगों का आज तक कोई अता पता नहीं है.

हालांकि बांग्लादेश के विदेश मंत्री संयुक्त राष्ट्र संघ की इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहते हैं "यूएन ने ये आंकड़े उन समूहों से उठाए हैं, जो राजनीति से प्रेरित हैं. इसके लिए वो स्थानीय समूह जिम्मेदार है जो सूचनाओं, आंकड़ों से छेड़छाड़ करते हैं"

विदेश मंत्री अब्दुल मोमेन के इस बयान से अलग जो लोग आज तक गायब हैं उनके परिवारों की पीड़ा अलग है. इन्हें आज भी इंतज़ार है अपनों के सुरक्षित घर लौट आने का.

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इमेज कैप्शन, विपक्षी कार्यकर्ता साजिदुल इस्लाम शुमोन का 9 साल से कोई अता-पता नहीं

ऐसे ही एक शख़्स हैं साजिदुल इस्लाम शुमोन. ये विपक्षी बांग्लादेशी नेशनल पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता हैं और दिसंबर 2013 से आज तक नहीं देखे गए. जनवरी 2014 में आम चुनावों से पहले सत्ताधारी आवामी लीग सरकार की धमकियों की वजह से इन्होंने घर छोड़ दिया ताकि उनके परिवार पर कोई आंच नहीं आए.

एक दिन परिवार को कुछ चश्मदीदों ने बताया साजिदुल को किस तरह बांग्लादेश की 'रैपिड एक्शन बटालियन' ने पकड़ा और किस तरह उनके हाथ में हथकड़ी और आंख पर पट्टी बांधकर एक बस में डाल दिया गया.

साजिदुल को गिरफ़्तारी से कुछ दिन पहले उनकी बहन संजीदा ने देखा था जब वो अपने परिवार, खासतौर पर अपनी एक साल की बेटी अर्वा को देखने के लिए चुपके से घर आए थे.

संजीदा बताती हैं "वो दिसंबर का महीना था. कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. तो मैंने नीले रंग की एक हूडी दी थी पहनने के लिए. वो आखिरी चीज़ मैंने उन्हें दी थी. मुझे नहीं पता उन्हें वो कितने दिन पहनने को मिला होगा."

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इमेज कैप्शन, साजिदुल की बेटी अर्वा जो अब 10 साल की हो चुकी हैं

साजिदुल की बेटी अर्वा अब 10 साल की हो चुकी हैं. संजीदा जब भी अपने भाई की फोटो दिखाती हैं तो अर्वा उसे चूमने लगती हैं और पूछती हैं- 'उनके पिता कब घर लौटेंगे.'

संजीदा अब 'मेयर डाक' नाम से एक सपोर्ट नेटवर्क चलाती हैं. इसके जरिए वो दर्जनों महिलाओं की मदद करती हैं जिनके पति, भाई, बेटे और पिता आज तक गुमशुदा हैं. इनके गायब होने के बाद कई परिवारों में कोई कमाने वाला नहीं बचा लिहाज़ा ये गरीबी और बढ़ते कर्ज़ से जूझ रहे हैं.

संजीदा समेत कई पीड़ित महिलाओं ने कहा कि वो ढाका में सरकार विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए सड़क पर उतरेंगी ताकि अपने लिए इंसाफ की आवाज़ बुलंद कर सकें.

संजीदा और उनके दूसरे रिश्तेदारों ने बताया कि अपने लोगों की गुमशुदगी को लेकर उन लोगों ने पुलिस में शिक़ायत दर्ज़ कराने की कोशिश की. लेकिन हर बार ये कहकर लौटा दिया जाता है कि जब तक शिक़ायत पत्र में से सुरक्षा बलों पर आरोप नहीं हटाया जाएगा, कोई केस दर्ज नहीं होगा.

संजीदा की 70 वर्षीय मां, जो अब बीमार रहती हैं, अपने बेटे की खोज़ ख़बर के लिए केस दर्ज़ कराने हर हफ़्ते पुलिस स्टेशन जाती थी. परिवार ने अब भी उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं. वो कहती हैं- "जब तक हमें ये नहीं पता नहीं चल जाता कि मेरे बेटे के साथ क्या हुआ है, तब तक ये कैसे मान लें कि वो जिंदा नहीं है."

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