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बीबीसी 100 वीमेन: क्या है अफ़गान महिलाओं का सीक्रेट
- Author, लीज़ डूसे और ज़रघुना करगर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
"मेरी कलम परिंदे के पंख जैसी है; ये आपको उन विचारों के बारे में बताएगी, जिन्हें सोचने की हमें आज़ादी नहीं है, उन सपनों के बारे में बताएगी, जिन्हें हमें देखने की इजाज़त नहीं है."
कभी कभी काबुल या अन्य शहरों की सड़कों पर छोटे प्रदर्शनों से अफ़गान महिलाओं की आवाज़ उठती है. अक्सर ये आवाज़ें उन महिलाओं के भाषणों में उठती हैं, जो दूर हैं, अफ़ग़ानिस्तान से से भी दूर. लेकिन आम तौर पर उनके विचार केवल खामोशी और सुरक्षित जगहों पर ही व्यक्त होते हैं.
या फिर लगातार कड़े होते तालिबान सरकार के नियमों के साथ अपनी ज़िंदगी को ढालने की कोशिश में ये आवाज़े उनके सिर में घुटती रहती हैं.
वे हर चीज़ पर पाबंदी लगाते हैं, महिलाएं क्या पहनें, कहां काम करें, उन्हें अपनी ज़िंदगी में क्या करना चाहिए क्या नहीं.
जब अगस्त 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी हुई, उससे पहले 18 अफ़ग़ान लेखिकाओं ने असल ज़िंदगी की फ़िक्शनल कहानियां लिखीं जिसे किताब 'माई पेन इज़ विंग ऑफ़ बर्ड' के रूप में इसी साल की शुरुआत में प्रकाशित किया गया.
अधिकांश महिलाएं निराशा महसूस करती हैं और अंतरराष्ट्य समुदाय द्वारा खुद को अकेला छोड़ दिया गया महसूस करती हैं.
लेकिन इन लेखिकाओं ने अपने कलम और फ़ोन का इस्तेमाल एक दूसरे को दिलासा देने और लाखों महिलाएं और लड़कियां जो कुछ झेल रही हैं, उसको बयान करने के लिए किया.
यहां, काबुल की दो लेखिकाएं हैं, जिनके पेन नेम हैं- परांदा और सदफ़. इन्होंने अपने विचार व्यक्त किये हैं जो उन्होंने गुपचुप तरीके से लिखे.
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'क्या पिंक स्कार्फ़ पहनना पाप है?'
"आज मैं एक बात निश्चय करके के जगी. कपड़े चुनते समय मैंने तय किया कि पिंक हेड स्कार्फ़ पहनूंगी. रोज़ ब्लैक स्कार्फ़ पहनती हूं और ये एक तरह से विरोध दर्ज कराना होगा. क्या पिंक हेड स्कार्फ़ पहनना पाप है?"
परांदा, खुद को महिला जैसा महसूस कराने के लिए पिंक कपड़े पहनना पसंद करती हैं. लेकिन महिलाएं क्या पहनें ये चुनना अब रोज़ रोज़ का एक संघर्ष बन चुका है.
तालिबान राज में शराफ़त को लेकर कड़े क़ानून लागू हैं और आम तौर पर बलपूर्वक लागू किए जाते हैं. इस रूढ़िवादी समाज में, अफ़ग़ान महिलाएं सिर ढंकने के ख़िलाफ़ नहीं लड़ रही हैं, बल्कि वे चुनने का बस आधिकार चाहती हैं.
आप इसे सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर देख सकते हैं. एक पिंक स्कार्फ़. घनघोर अंधेरे में एक छोटी रोशनी जैसे.
'हम पीछे नहीं जा सकते'
कवियत्री हफ़ीज़ुल्ला हमीम लिखती हैं, "पीछे जाना आसान नहीं है. लेकिन आगे जाना और बड़ी मुश्किल भरा है, क्या मुझे आशावादी होना चाहिए, या नहीं? हम पीछे नहीं जा सकते."
कभी कभार होने वाले प्रदर्शनों की अगुवाई अफ़ग़ान महिलाएं करती रही हैं. काबुल और अन्य शहरों की सड़कों पर इनकी छोटी लेकिन बहादुर भीड़ 'रोटी, काम, आज़ादी' के नारे लिखे बैनर लेकर निकलती रही हैं.
उन्हें जबरन तितर बितर किया जाता है या हिरासत में लिया जाता है. कुछ तो हिरासत में ग़ायब हो गईं. सीमा के दूसरी तरफ़, ईरान में, ये महिलाएं ही हैं जो 'औरत, ज़िंदगी, आज़ादी' के नारे के साथ बदलाव और अनिवार्य हिज़ाब ख़त्म किए जाने की मांग की अगुवाई कर रही हैं.
अफ़ग़ानों के लिए ये मांग है महिलाओं को काम करने की आज़ादी और लड़कियों के लिए शिक्षा.
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'डर का ग़ुस्से में बदलना'
"तालिबान गार्ड ने हमारे ऑफ़िस की कार को रोका, उसने मेरी ओर इशारा किया...मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा, मेरा शरीर कांप गया. ऐसा लगा जैसा हवा मेरे शरीर के आर पार गुज़र गई हो...जैसे ही हमारी कार आगे बढ़ी, लगा हवा एक झोंका दूसरी तरफ़ से आया. मेरा डर ग़ुस्से में बदल गया था."
ये ऐसी अनिश्चितता है जिसे झेलना बहुत मुश्किल है. कुछ तालिबान गार्ड बहुत आक्रामक होते हैं, कुछ नर्म. औरतों के लिए यात्रा करना सांसें थामने जैसा है. औरतों को 72 किलोमीटर से अधिक दूरी की यात्रा करने के लिए महराम यानी मर्द सहयोगी अनिवार्य है.
कुछ तालिबान अपनी मर्ज़ी से इसका उल्लंघन भी करते हैं और महिलाओं को घर जाने देते हैं.
'आइसक्रीम का रोमांच'
"एक बच्चे की तरह आइसक्रीम खाने का उत्साह वैसा ही होता है जैसे एक वयस्क के रूप में अंतरिक्ष यात्रा का रोमांच."
आइसक्रीम की दुकानों, कैफ़े के सामने आपको अक्सर औरतों और बच्चों की क़तारें दिखती हैं. ऐसी जगहें दुर्लभ खुशी का ठिकाना बन गई हैं.
अब तो पब्लिक पार्क और महिला जिम और सार्वजनिक स्नानागार भी पहुंच से बाहर हैं क्योंकि महिलाएं हिजाब नहीं पहनतीं, जोकि यहां का कड़ा ड्रेस क़ानून है.
इन सबका मतलब है कि छोटी जगहें और भी सिकुड़ गई हैं.
'13 साल की उम्र में सगाई'
"सार्वजनिक स्नानागार के मालिक की बेटी की सगाई हो गई. ये दिलचस्प है. वो अभी 13 की है. उसकी मां कहती है कि तालिबान फिर से स्कूल कभी खुलने नहीं देंगे, जहां क़िस्मत है उसे उस घर में जाने दो...ऐसा लगता है कि वो छोटी बच्ची मैं ही होऊं...जब पहली बार तालिबान पहुंचे तो मैं बहुत हताश थी. मैंने भी ज़बरदस्ती की शादी स्वीकार की. वे घाव अभी भी भरे नहीं हैं...लेकिन मैं धूल से उठी और फिर खड़ी हो गई."
ये लगातार होने वाला दमन है. अफ़ग़ान महिलाएं बहुत दर्द से 1990 के दशक के तालिबान शासन को याद करती हैं, उस समय भी उनसे उनकी शिक्षा छीन ली गई थी.
जब 2001 में सत्ता बदली, अन्य औरतों की तरह परांदा ने भी मौके का फ़ायदा उठाया, स्कूल जाने या तलाक़ लेने के लिए.
स्कूल जाने वाली लड़िकियों की एक नई पीढ़ी बड़े सपनों के साथ बड़ी हो गई है. उनके स्कूल बंद होने की वजह से उनका दर्द और गहरा है.
'औरतों के ख़िलाफ़ मर्दों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द'
"मैं सोशल मीडिया इस्तमाल कर चुकी हूं लेकिन अब मैंने अपनी ज़बान बंद कर ली है. मैं अपने समाज से बहुत दुखी हूं, मर्दों द्वारा औरतों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए जाने वाले गंदे शब्द परेशान करते हैं. मैं मानती हूं कि अफ़ग़ान महिलाओं की मुसीबत वो सरकारें नहीं है जो नए नए नियम और बदलाव लेकर आती हैं, बल्कि औरतों के ख़िलाफ़ मर्दों की बुरी सोच सबसे बड़ी समस्या है."
अफ़ग़ानिस्तान में सरकारें आती हैं और जाती हैं, लेकिन पितृसत्ता जस की तस बनी रहती है.
अफ़ग़ान औरतें लंबे समय से मर्दों द्वारा बनाए नियमों के साथ रहती आई हैं. लेकिन हाल के दिनों की प्रगति पीछे जा रही है, जिसे संयुक्त राष्ट्र ने 'अभूतपूर्व दमन' क़रार दिया है.
इसका दूरगामी प्रभाव है. रुढ़िवादी पारिवारिक रिवाज़ों को थोपा जाता है, जिसका नतीजा है महिलाओं और लड़कियों को दबा कर रखना.
'अच्छे देश की उम्मीद में'
"क्या हो रहा है, इसके बारे में मुझे लिखना ही होगा. बहुत कम ही मीडिया संस्थान बचे हैं. मैं मानती हूं कि किसी दिन अफ़ग़ानिस्तान, औरतों और लड़कियों के लिए एक अच्छा देश बनेगा. इसमें समय लगेगा. लेकिन ये होकर रहेगा."
परांदा एक पेन नेम है, जिसका मतलब होता है परिंदा. उनके जैसी औरतें, ख़ासकर शहरों में रहने वाली शिक्षित औरतों ने घर में बंद होकर रहना अस्वीकार कर दिया है.
कई तो, ताबिलान शासन से फरार हो गईं. कई इसी उम्मीद में हैं. छोटी ही संख्या में लेकिन वे बहादुरी से प्रदर्शन करती हैं.
यहां तक कि देश के दूर दराज़ इलाकों में मैं अशिक्षित महिलाओं से मिली, जिनमें जेल जैसी ज़िंदगी को लेकर अंदर ही अंदर ग़ुस्सा है.
'घाव पर मरहम लगाने के लिए लेखन'
सदफ़ लिखती हैं, "लिखना! आप क्यों डरी हुई हो? किससे डर है आपको?...हो सकता है आपका लिखा किसी की आत्मा के लिए मरहम बन जाए...आपकी कलम किसी के टूटे हुए हाथ का सहारा बन जाए और कुछ निराश लोगों में एक छोटी उम्मीद जगा दे."
कहीं भी एक लेखक की ज़िंदगी शंका और डर से भरी हो सकती है. ख़ासकर अफ़ग़ान औरतों के लिए खुद को जानना और मक़सद तलाशने के लिए लिखने की सुरक्षित, शांत जगह चाहिए.
'माई पेन इज़ द विंग ऑफ़ बर्ड' में प्रकाशित होना उनके शब्दों को नई ज़िंदगी देने जैसा है.
"एक स्टूडेंट ने किताब की बहुत ख़ूबसूरत शब्दों में तारीफ़ की और सबसे अच्छी बात ये रही कि उसने मेरा ज़िक्र किया. सभी छात्राओं ने मेरे लिए ख़ुशी ज़ाहिर की. इसे मैं अपनी ज़िंदगी की सबसे सुखद याद के रूप में लिख रही हूं."
'मैं ही घर चलाती हूं'
"मेरा विश्वास कहता है कि मुझे पैसे की चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि ख़ुदा के पास मेरे लिए कुछ और बेहतर हो सकता है. लेकिन ख़ुदा जाने क्यों मैं बहुत चिंतित हूं. हमारे परिवार में 10 लोग हैं और मैं अकेली कमाने वाली हूं. पिछली रिपब्लिक सरकार में मैं बहुत अच्छा नहीं कमा पाई और इस इस्लामिक अमीरात में भी बहुत कुछ अच्छा नहीं चल रहा."
कामकाजी महिलाओं की संख्या बिल्कुल ख़त्म नहीं हुई है. कुछ महिला डॉक्टर, नर्स, टीचर, पुलिस वुमेन अभी भी नौकरी कर रही हैं, मुख्य रूप से महिलाओं और लड़िकयों के साथ काम करने वाली जगहों पर.
कुछ बिज़नेस वुमन अभी भी व्यवसाय कर रही हैं. लेकिन आर्थिक तंगी बहुत ज़्यादा है.
लेकिन अधिकांश सरकारी मंत्रालयों में महिलाओं के दरवाज़े बंद हैं. लड़कियों के लिए हाईस्कूल बंद होने के साथ ही महिलाओं के लिए काम के मौके बहुत कम हुए हैं.
'तुम मज़बूत हो'
"मैंने कहा, नहीं नहीं! मैं ख़ुदकुशी नहीं कर सकती. मैंने खुद से सवाल किया, मैंने कहा- हो सकता है कि तुम ज़िंदा नहीं रहना चाहतीं. फिर भी तुम्हारी ख़ुदकुशी बहुत से दूसरे लोगों पर असर डालेगी. कृपया उनके प्रति नरम दिल रहो, तुम मज़बूत हो, सबकुछ ठीक हो जाएगा, तुम रास्ता निकाल लोगी. ये भी बीत जाएगा."
ये फुसफुसाहट आप हर जगह सुनते हैं. ख़ुदकुशी, ख़ासकर नौजवान औरतों में, तेज़ी से बढ़ रही है, लेकिन इसकी पुष्टि करना मुश्किल है.
परिवार अपने राज़ दफ़्न रखते हैं. सरकारी अस्पतालों को सबूत छिपाने के लिए कहा जाता है.
संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी ने मुझे बताया कि जब वे अलग अलग प्रांतों में महिलाएं से मिले, तो ये मुद्दा सामने आया. स्कूल छुड़ाकर लड़कियों की कम उम्र में शादी करना इसकी एक वजह है.
'ये सब कब ख़त्म होगा?'
"हम कब सामान्य रह सकते हैं, पागल नहीं? हम कितना दर्द सह सकते हैं. आख़िरकार मेरा दिल मान लेता है कि यह धरती हर हैवानियत और क्रूरता को झेल चुकी है. लेकिन इस सबका अंत कब होगा?"
एक नहीं कई पीढ़ियां अब सिर्फ युद्ध को जानती हैं- अब तो चार दशक हो चुके हैं.
देश एक संकट से दूसरे संकट का झटका खाता है. अफ़ग़ान बड़ी बहादुरी से एक नए अध्याय का सपना देखते हैं जो पिछले से बेहतर होगा.
ये एक ऐसी कहानी है जिसका अंत होता नहीं दिखता.
'उम्मीद की रोशनी'
"मैं अपने दिल पर उम्मीद की रोशनी छिड़कती हूं...वहां मेरे अंदर एक आग है. मेरे अंदर एक स्पिरिट है जो संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती है. मुझे उम्मीद है कि क़ुदरत का नियम इन काले दिनों से अंधेरा छांटने के लिए अपने आदेश देगा."
अफ़ग़ान अक्सर कहते हैं कि मरने के लिए आख़िरी चीज़ उम्मीद है.
हाल के सालों में, और तालिबान की वापसी से पहले, जब हर दिन हिंसा और तेज़ हो रही थी, कुछ लोग कहते थे, उममीद भी मारी गई.
लेकिन इतना कुछ झेलते हुए भी जो ज़िंदा रहे, वे अभी उम्मीद का दामन कस कर पकड़े हुए हैं, चाहे वो कितनी भी कम क्यों न बची हो.
फ़ोटोग्राफ़ः नाना मुस स्टीफ़ेंसन
अनटोल्ड डायरी प्रोजेक्ट को ब्रिटिश काउंसिल और बागरी फ़ाउंडेशन का समर्थन प्राप्त है. इन लेखिकाओं की लघु कथाओं के संकलन 'पेन इज़ द विंग ऑफ़ अ बर्डः न्यू फ़िक्शन बाई अफ़ग़ान वुमेन' को मैकलहोज़ प्रेस ने छापा है.
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