इमरान और पाकिस्तान सरकार की 'जंग', असेंबली भंग करने से किसका नुक़सान?

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इमेज कैप्शन, 'लॉन्ग मार्च' रोकने के बाद इमरान ख़ान अगले ऐलान पर नज़र
    • Author, शुमाएला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तक़रीबन महीने भर से पाकिस्तान में चर्चा में रहा 'हक़ीक़ी आज़ादी' मार्च 26 नवंबर को समाप्त हुआ. इस दिन पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपना सड़क मार्च रोकने का जो एलान किया, वो हैरान कर देने वाला था.

इमरान ख़ान की तरफ से पाकिस्तान में जल्द आम चुनाव कराने की मांग करने वाले इस मार्च को ख़ासा जनसमर्थन मिल रहा था. इसे देखते हुए तमाम राजनीतिक विशेषज्ञ ये मान कर चल रहे थे कि इमरान ख़ान या तो राजधानी इस्लामाबाद में धमाकेदार एंट्री करेंगे या फिर हज़ारों लोगों के साथ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ जाएंगे.

लेकिन इमरान की इस घोषणा से सिर्फ़ राजनीतिक विशेषज्ञ ही नहीं, उनके राजनीतिक विरोधी भी हक्के-बक्के रह गए जब उन्होंने आक्रोश से भरे लंबे भाषण के बाद ये एलान किया- "हम सभी असेंबली से ख़ुद को अलग कर रहे हैं. हम मुल्क में अव्यवस्था फैलाने से बेहतर इस भष्ट तंत्र को इसके हाल पर छोड़ना समझते हैं."

विरोध प्रदर्शन का स्टैंड अचानक़ कैसे बदला?

इमरान ख़ान ने अपनी पार्टी की सत्ता वाली सभी असेंबली से हटने का एलान तो कर दिया, लेकिन इन्हें भंग करने की कोई तय तारीख़ नहीं बताई. इस पर अंतिम निर्णय के सवाल पर इमरान ख़ान ने कहा कि वो पंजाब और ख़ैबर पख़्तूनख्वा जैसे प्रांतों में, जहां उनकी पार्टी की सरकार है, अपने मुख्यमंत्रियों और पार्टी की संसदीय कमेटी से सलाह मश्विरा करेंगे.

उसके बाद से ही इमरान ख़ान अपनी पार्टी और गठबंधन के नेताओं से मिल रहे हैं. उन्होंने दोनों पंजाब और ख़ैबर पख़्तूनख्वा प्रांत के मुख्यमंत्रियों के साथ भी बैठकें की हैं. इन बैठकों के बाद इमरान का दावा है कि 'सबने आम सहमति से उन्हें असेंबली भंग करने पर अंतिम फ़ैसला लेने के लिए अधिकृत कर दिया है. अगर सत्ताधारी गठबंधन पाकिस्तान में जल्द से जल्द आम चुनाव कराने की घोषणा नहीं करता, तो वो प्रातीय सरकारें कभी भी भंग कर सकते हैं.'

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इमेज कैप्शन, 26 नवंबर की सभा में मार्च रोकने का एलान करते इमरान ख़ान

पाकिस्तान में अगले आम चुनाव अक्टूबर 2023 में होने हैं. लेकिन अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए प्रधानमंत्री पद से हटाए गए इमरान ख़ान उससे पहले ही चुनाव कराने की मांग पर अड़े हुए हैं. इमरान ख़ान का कहना है कि मौजूदा सरकार को पाकिस्तान की सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक आधार नहीं हैं.

बहरहाल, इमरान के विरोधी उनकी इस मांग के आगे झुकने को तैयार नहीं दिखते. सत्तारूढ़ दल ये बार-बार दोहरा रहे हैं कि जब तक इमरान ख़ान का रवैया और बात रखने का तरीका ठीक नहीं होगा, तब तक उनकी मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाएगा. शहबाज़ शरीफ़ सरकार ने ये भी साफ़ कर दिया कि इमरान और उनकी पार्टी तहरीक़-ए-इंसाफ़ के साथ पहले से शर्त रखकर कोई बातचीत नहीं की जाएगी.

इसके बाद बीते हफ़्ते से ही इमरान के रुख़ में नरमी के संकेत मिलने लगे थे. पहले वो अपनी मांग को लेकर कोई समझौता करने को तैयार नहीं दिखते थे, यहां तक कि अपने विरोधियों से किसी तरह की बातचीत के भी मूड में नहीं थे.

एक इंटरव्यू में इमरान ने साफ़ कहा था कि "वो इस सरकार को जवाब देने के लिए सिर्फ कुछ दिनों का ही समय देंगे. वो किसी भी क़ीमत पर मार्च के पहले चुनाव कराना चाहते हैं. अगर वो इसके लिए तैयार होते हैं तो हम अपना प्रदर्शन रोक देंगे, वर्ना प्रांतीय असेंबली को भंग कर देंगे."

'मार्च' इमरान का सियासी झांसा?

इमरान ख़ान के विरोधियों का दावा कुछ ऐसा ही है. उनके मुताबिक़ 'लॉन्ग मार्च' की नाक़ामी इमरान ख़ान को साफ़ दिख गई. इसी के बाद से वो प्रांतीय असेंबलियों को भंग करने की धमकी देने लगे. पाकिस्तान के गृह मंत्री राणा सनाउल्लाह ने तो यहां तक कह दिया- 'इमरान ख़ान जनादेश के अपमान की हद पार कर चुके हैं.'

राणा सनाउल्लाह ने ये भी कहा कि पीडीएम के नेतृत्व वाली सरकार संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक़ काम करती रहेगी और जो भी हालात सामने हैं उनका राजनैतिक समाधान निकालेगी.

उन्होंने कहा, "संवैधानिक दायरे में रहते हुए हम अगले चुनावों को जितनी देर के लिए हो सकता है टालेंगे. हम ये क़तई नहीं चाहेंगे कि हमारा गठबंधन सिर्फ़ दो प्रांतों के चुनाव में शामिल हो."

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़

सनाउल्लाह के बयान का मतलब ये हुआ कि इमरान ख़ान की पार्टी की कोई भी मांग पूरी नहीं होगी. अगर असेंबली भंग करते हैं तो दो प्रांतों में सरकार उन्हीं की जाएगी.

इमरान की पार्टी पीटीआई ने नेशनल असेंबली से अपने सदस्यों का इस्तीफ़ा दिलवा दिया है, लेकिन इसके बाद की क़ानूनी कार्रवाइयां पूरी नहीं होने की वजह से ये इस्तीफ़े अब भी लंबित हैं.

इमरान ख़ान के ज़्यादातर सांसदों के इस्तीफे़ इसलिए पेंडिंग है क्योंकि इनका पर्सनल वेरिफ़िकेशन अभी तक नहीं हुआ है. इस्तीफ़े की मंज़ूरी के लिए हर सांसद को नेशनल असेंबली के स्पीकर के पास ख़ुद जाना होता है.

पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार असमां शिराज़ी के मुताबिक़, 'सत्ताधारी पीडीएम पूरे हालात में 'वेट एंड वॉच' की रणनीति अपना रही है. इमरान के असेंबली भंग करने के बाद पैदा हुए हालात में उनके पास क्या विकल्प होंगे, इस पर लगातार नज़र बनाए हुए हैं.'

शिराज़ी मानती हैं कि पीडीएम के सभी घटक इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि इमरान असेंबली भंग करने जैसा कोई क़दम नहीं उठाने जा रहे. अगर वो ऐसा करते हैं तो इससे निपटने के लिए राजनीतिक विकल्प उनके पास भी तैयार हैं.

असमां शिराज़ी के मुताबिक़, ''इमरान ख़ान के बारे में आम धारणा ये है कि उनकी नज़र रावलपिंडी पर टिकी हुई है. उन्हें नई सरकार की तरफ़ से किसी संकेत का इंतज़ार है. लेकिन अब वो किसी तरह, बिना शर्त के भी मसले को सुलझाने के लिए बेक़रार हैं."

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राजनीतिक जानकारों का कहना है ख़ैबर पख़्तूनख्वा और पंजाब में सरकार भंग करने का मतलब है, केन्द्रीय सरकार को अस्थाई सरकार बनाने की दावत देना ताकि इसकी निगरानी में असेंबली चुनाव कराए जा सकें.

जानकारों का कहना है कि इस मसले पर ख़ुद इमरान की पार्टी के अंदर ही आगे की रणनीति को लेकर मतभेद हैं. पार्टी के एक तबके को लगता है कि सरकार भंग करने का फ़ैसला हमारे लिए ज़्यादा नुक़सानदेह हो सकता है.

शहज़ाद इकबाल जैसे सीनियर जर्नलिस्ट इस हालात को अलग नज़रिए से देखते हैं. इन्हें लगता है कि इमरान की पार्टी नहीं सत्तारुढ पीडीएम गठबंधन बैकफ़ुट पर है.

शहज़ाद कहते हैं, "पीडीएम के लोग पहले कह रहे थे कि अगर इमरान जल्द चुनाव चाहते हैं तो उनकी पार्टी के लोगों को प्रांतीय असेंबली से इस्तीफा दे देना चाहिए. अब इमरान ने ऐसा करने का एलान कर दिया, तो पीडीएम के लोग कहने लगे हम ऐसा क़तई नहीं होने देंगे. यानी ये लोग भी असमंजस में हैं."

शहज़ाद बताते हैं कि सरकार और इस रस्साकशी के बीच इमरान की पार्टी और सरकार के नुमाइंदे पिछले दरवाज़े से बातचीत में भी मशगुल हैं. इमरान की पार्टी के कुछ नेताओं ने संकेत दिया है कि वो इस बातचीत के नतीजे का इंतज़ार कर रहे हैं. अगर सरकार मई में भी चुनाव कराने पर राज़ी हो जाती है तो प्रांतीय सरकारें भंग करने की नौबत नहीं आएगी.

वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि 'प्रांतीय सरकारों से हटने का एलान इमरान ने अपनी साख बचाने के लिए किया है. ऐसा इसलिए है क्योंकि अपनी मांग पूरी करवाने के लिए उन्हें जो भी करना था वो कर चुके हैं, लेकिन इन सबके बावजूद उनके हाथ कुछ नहीं लगा.

हालांकि अपने लगातार विरोध प्रदर्शनों की वजह से उनकी लोकप्रियता काफ़ी बढ़ी. इस आधार पर अगले चुनाव में उनके जीतने की संभावना काफ़ी बढ़ जाती है. लेकिन असेंबलियों से बाहर निकलने की उनकी मांग अनसुनी हो गई लगती है.'

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क्या चरमरा जाएगी लोकतांत्रिक व्यवस्था?

ये सवाल बेहद अहम है क्योंकि सरकार की उम्मीदों के उलट अगर इमरान प्रांतीय असेंबली भंग करने का फ़ैसला कर लेते हैं तो क्या होगा कहना मुश्किल है. प्रांतीय सरकारों के साथ इस्लामाबाद में केन्द्रीय सरकार क्या स्थिर रह पाएगी?

जानकारों के मुताबिक़ ऐसे हालात से निपटने के लिए कई सारे विकल्प मौजूद हैं. इसमें प्रांतों में गवर्नर रूल लगाने के साथ ख़ैबर पख़्तूनख्वा और पंजाब के मुख्यमंत्रियों के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव जैसे विकल्प शामिल हैं.

इस टास्क को पूरा करने में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने पहले ही आसिफ़ अली ज़रदारी को लगा दिया है. ज़रदारी पीपीपी के उपाध्यक्ष हैं और पाकिस्तान में अपनी राजनैतिक साठ-गांठ के लिए जाने जाते हैं. ज़रदारी निर्दलीय सदस्यों के साथ इमरान समर्थक दलों के नेताओं से संपर्क साध रहे हैं ताकि इन्हें अपने पाले में लेकर इमरान का पूरा प्लान नाकाम कर दिया जाए.

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी

ख़ैबर पख़्तूनख्वा और पंजाब में सरकार भंग करने का मतलब है पाकिस्तान में 66 फ़ीसदी असेंबली सीटें खाली हो जाएंगी. इससे ज़ाहिर है राजनीतिक संकट बड़ा हो जाएगा. ऐसे हालत को सत्तारुढ़ पीडीएम भले ही राजनीतिक विकल्पों के साथ साध लेने का दावा करे, लेकिन इससे पाकिस्तान की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था चरमरा जाएगी.

अगर ऐसा हुआ तो इसकी वजह से पैदा होने वाला आर्थिक संकट पाकिस्तान की मौजूदा सरकार को झुकने पर मजबूर कर देगा. पाकिस्तान में जारी मौजूदा अस्थिरता की वजह से ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ बातचीत लगातार टल रही है.

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ऋण की अगली किश्त को लेकर ये बातचीत नवंबर में ही होनी थी. लेकिन राजनीतिक अस्थिरता की वजह से आर्थिक मदद देने से पहले दूसरी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं भी आईएमएफ़ के ग्रीन सिग्नल का इंतज़ार कर रही हैं. लिहाज़ा अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो मौजूदा व्यवस्था का टिके रहना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर हो जाएगा.

मशहूर स्तंभकार मलीहा लोधी के मुताबिक़, "निरंतर राजनीतिक टकराव की वजह से देश की पूरी व्यवस्था कमज़ोर हो चुकी है, लेकिन राजनीतिक टकराव में कमी आने के कोई संकेत नहीं दिख रहे. हर आंदोलन में राजनेता कहते हैं कि ये पाकिस्तान के लिए निर्णायक होगा. लेकिन ये लड़ाई कभी ख़त्म नहीं होती."

मलीहा के मुताबिक़, ''पाकिस्तान के लिए सबसे चिंताजनक ये बात है कि मौजूदा हालात में पाकिस्तान को कोई राहत मिलती नज़र नहीं आती. ना ऐसी राजनीति से, ना शासन की गंभीर चुनौतियों से और ना ही अदूरदर्शी आर्थिक प्रबंधन से. इस हालत में सरकारी संस्थानों में आम लोगों का भरोसा भी डगमगाता दिख रहा है.''

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