पाकिस्तान: इमरान ख़ान ने क्या अमेरिका के ख़िलाफ़ अपने सुर बदल लिए हैं

इमेज स्रोत, MOHSIN RAZA/Reuters
- Author, अहमद एजाज़
- पदनाम, बीबीसी उर्दू के लिए
इमरान ख़ान प्रधानमंत्री थे. उनके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा ज़ोरों पर थी. 27 मार्च, 2022 की शाम थी. इस्लामाबाद के परेड ग्राउंड में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी की मीटिंग थी.
इमरान ख़ान ने अपनी जेब से एक चिट्ठी निकाली और अपने कार्यकर्ताओं को दिखाते हुए कहा, "यह पत्र विदेश से लिखा गया है जिसमें हमारी सरकार को गिराने की साज़िश की गई है."
ज़ाहिरा तौर पर इमरान ख़ान का अमेरिका विरोधी नैरेटिव यहीं से बना था, लेकिन इस साल मार्च में तैयार किया गया अमेरिका विरोधी रुख़ पीटीआई के हालिया आज़ादी लॉन्ग मार्च के दौरान कमज़ोर पड़ता दिखाई दे रहा है. इसकी वजह इमरान ख़ान के कुछ इंटरव्यू हैं जो उन्होंने विभिन्न विदेशी मीडिया संस्थानों को दिए हैं.
यहां हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि इमरान ख़ान अमेरिका को लेकर अपना रुख़ बदल तो नहीं रहे हैं. अगर ऐसा है, तो इसकी ज़रूरत क्यों महसूस की गई? क्या यह नीतिगत बदलाव है, अगर नीतिगत बदलाव है तो क्या अब इमरान ख़ान सरकार गिराने के लिए अमेरिका को ज़िम्मेदार नहीं मानते हैं?
सबसे पहले इस पहलू को देखने की ज़रूरत है कि इमरान ख़ान का अमेरिका विरोधी नैरेटिव बदल रहा है या नहीं.

इमेज स्रोत, RAHAT DAR/EPA-EFE/REX/Shutterstock
क्या इमरान ख़ान अमेरिका विरोधी रुख़ बदल रहे हैं?
विश्लेषकों का मानना है कि इमरान ख़ान को अमेरिक विरोधी रुख़ से जो राजनीतिक फ़ायदा होना था, वो हो चुका है. अब वो आगे देख रहे हैं और अमेरिका को और अधिक नाराज़ करने के बजाय उसके साथ बेहतर संबंध बनाना चाहते हैं.
विश्लेषक सुहैल वड़ाइच का मानना है कि इमरान ख़ान अपने नैरेटिव से हट रहे हैं. उन्होंने कहा, "इमरान ख़ान ने साइफ़र के मुद्दे पर यूटर्न लिया है, इस तरह वो अमेरिका के बारे में अपने रुख़ को बदल रहे हैं."
लेकिन सुहैल वड़ाइच इस बदलाव को सकारात्मक रूप से देखते हैं. उनके अनुसार, सवाल यह है कि पिछला पक्ष ठीक था या अब वाला पक्ष ठीक है? मुझे लगता है कि पहले वाला पक्ष सही नहीं था. वो अब अपनी नीति बदल रहे हैं, यह विदेश नीति के लिए अच्छा है.
यही सवाल जब पीटीआई के वरिष्ठ नेता अली नवाज़ अवान से पूछा गया तो उन्होंने कुछ अस्पष्ट ढंग से बदलते रुख़ को स्वीकार किया.
उन्होंने कहा कि ''अमेरिका का इतिहास सत्ता परिवर्तन से भरा पड़ा है. हम अमेरिका के ख़िलाफ़ नहीं हैं, बल्कि उसकी नीतियों के ख़िलाफ़ हैं. हमारी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है, लेकिन हम अमेरिका के साथ बेहतर संबंध चाहते हैं और वैसे भी हमें आगे बढ़ना चाहिए.''
ये भी पढ़ें:-

इमेज स्रोत, REHAN KHAN/EPA-EFE/REX/Shutterstock
क्या अमेरिका विरोधी नैरेटिव से राजनीतिक फ़ायदा उठाया जा चुका है?
इमरान ख़ान ने अपने एक इंटरव्यू में कथित अमेरिकी साज़िश को लेकर कहा था कि "अब वक्त बीत चुका है, हमें आगे की तरफ़ देखना चाहिए."
इसके अलावा सितंबर के महीने में इमरान ख़ान का कथित ऑडियो लीक सामने आया था, उसमें भी तहरीक-ए-इंसाफ़ के चेयरमैन ने कहा था कि "हमें सिर्फ़ खेलना है, अमेरिका का नाम नहीं लेना है."
और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के नेता अली नवाज़ अवान ने हमसे बात करते हुए यही बात कही, "हमें आगे देखना चाहिए."
यहां सवाल यह है कि क्या अमेरिका विरोधी नैरेटिव में बदलाव या लचीलेपन से इमरान ख़ान अब अपनी सरकार को गिराने के लिए अमेरिका को ज़िम्मेदार नहीं मानते हैं? और इस रणनीति से जो राजनीतिक फ़ायदा उठाना था, वह उठाया जा चुका है और अब आगे देखा जा रहा है, तो यह कैसा राजनीतिक फ़ायदा था?
सुहैल वड़ाइच का कहना है कि सरकार गिरने के बाद इमरान ख़ान ने जो अमेरिका विरोधी रुख़ अपनाया था, उससे वो अमेरिका और यूरोप को नाराज़ कर रहे थे. जबकि अब अपना रुख़ बदलकर सत्ता में वापसी का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं. वे इस बात को समझते हैं कि अमेरिका के साथ संबंध ठीक रखने होंगे.
ये भी पढ़ें:-
'नैरेटिव का फ़ायदा उठाया जा चुका है'
जब यही सवाल राजनीतिक विश्लेषक ज़ैग़म ख़ान से किए गए तो उन्होंने कहा कि अमेरिका पर इमरान के रुख़ में नरमी की पहली वजह यह है कि अमेरिका विरोधी नैरेटिव का फ़ायदा उठाया जा चुका है.
अब काफ़ी समय बीत चुका है और अमेरिका विरोधी विमर्श कमज़ोर पड़ गया है. इमरान ख़ान अपनी लोकप्रियता के आधार पर मानते हैं कि उनके पास सत्ता में वापसी का मौक़ा मौजूद है. और अगर उन्हें अब अमेरिका विरोधी नेता के रूप में देखा गया तो उनकी वापसी के रास्ते में रुकावट पैदा हो जाएगी.
क्योंकि विदेश नीति और सुरक्षा के लिए इस्टैब्लिशमेंट उनको एक समस्या के रूप में देखेगी. इसलिए वे अमेरिका के साथ अपने संबंध सुधारने की कोशिश कर रहे हैं.
उनके मुताबिक़ यह सब सरकार में वापस आने की तैयारी है.
स्तंभकार ख़ुर्शीद अहमद नदीम का भी यही मानना है. उनके मुताबिक़, "इमरान ख़ान ने अमेरिका में लॉबीइंग भी शुरू कर दी है, उन्हें सलाह दी जा रही है कि जनभावनाओं को अपने पक्ष में करने का फ़ायदा उठाया जा चुका है."
ये भी पढ़ें:-
इमरान के रुख़ में बदलाव कब और क्यों आया
जानकारों का कहना है कि अगर इमरान ख़ान सत्ता में वापस आना चाहते हैं तो अगले चरण के लिए काम करें और अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करें. इसलिए उन्होंने अमेरिका के मुद्दे पर यूटर्न ले लिया है. अमेरिका का विरोध करके जो राजनीतिक फ़ायदा उठाना था, वह उठाया जा चुका है, इसलिए अब सोच-समझकर रुख़ बदला जा रहा है.
इस बारे में अली नवाज़ अवान ने कहा कि ''आप एक ही समय में किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं हो सकते. अमेरिका की आलोचना में कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया गया था. हम उनके विरोध के मुद्दे से पीछे नहीं हट रहे हैं.''
जब हमने पीटीआई के एक अन्य वरिष्ठ नेता महमूद-उल-रशीद से बात की तो उन्होंने कहा, "हमारी अमेरिका से कोई निजी दुश्मनी नहीं है. इमरान ख़ान हमेशा कहते थे कि हमारा एजेंडा अमेरिका विरोधी नहीं है, लेकिन हम बराबरी के स्तर पर संबंध रखना चाहते हैं. इमरान ख़ान के हालिया बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है."
लेकिन जब उनसे पूछा गया कि इमरान ख़ान हाल के दिनों में अमेरिका के साथ संबंधों के बारे में ज़्यादा बात कर रहे हैं तो महमूद-उल-रशीद ने कहा, "एक या डेढ़ महीने पहले अमेरिकी राजनयिक इमरान ख़ान से मिले थे. शायद वहां कुछ ऐसी बातचीत हुई हो, लेकिन कोई बड़ा बदलाव या नीतिगत बदलाव नहीं हुआ है."
ये भी पढ़ें:-
पूर्व में इमरान ख़ान का अमेरिका के बारे में क्या रुख़ रहा है?
अमेरिका पर इमरान ख़ान के बदलते रुख़ को और स्पष्ट करने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि शासनकाल के दौरान और सत्ता से पहले इमरान ख़ान का अमेरिका को लेकर क्या रुख़ था.
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ ने क़रीब साढ़े तीन साल तक शासन किया. इमरान ख़ान ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी मुलाक़ात की थी. क्या सत्ता के दौरान इमरान सरकार के अमेरिका के साथ बेहतर संबंध, विदेश नीति की प्राथमिकता थी?
इस पर ख़ुर्शीद नदीम ने कहा, "इमरान ख़ान का नैरेटिव कुछ तत्वों का ऐसा घालमेल है, जो उन्हें लोगों के बीच लोकप्रिय बनाता है, जैसे अमेरिका विरोधी, धार्मिक दृष्टिकोण, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जनता का रुख़ आदि."
उन्होंने कहा कि हमें इमरान ख़ान की अमेरिका के ख़िलाफ़ सोची समझी नीति का कोई सुराग़ नहीं मिलता है. "शासनकाल के दौरान ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता है कि वह अमेरिकी विरोधी थे या उनकी अमेरिका के प्रति कोई स्पष्ट नीति थी."
ये भी पढ़ें:-
साल 2018 के चुनाव से पहले पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ की राजनैतिक शैली में अमेरिका विरोधी तत्व मिलता है? क्या कथित पत्र को अमेरिका के प्रति रवैये में बदलाव के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है या अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की इमरान सरकार को लेकर ज़ाहिर की गई बेरुख़ी इसका कारण है?
इस संबंध में वरिष्ठ विश्लेषक और पत्रकार मुर्तज़ा सोलंकी का कहना है कि 'जो बाइडन उस समय सत्ता में आए थे, जब अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से निकल रहा था. पाकिस्तान की भूमिका को लेकर अमेरिका में काफ़ी गुस्सा था. राष्ट्रपति चुनाव के दौरान इमरान प्रशासन के ट्रंप समर्थक बयान भी पृष्ठभूमि में रहे थे.'
इमरान ख़ान के अफ़ग़ान तालिबान की तारीफ़ में दिए गए बयान भी बाइडेन प्रशासन को पसंद नहीं आये. फ़ोन न करने पर मीडिया में धमकी भरे रवैये ने आग में घी डालने का काम किया, इस तरह ये रिश्ते बिगड़ते चले गए.
इस बारे में ख़ुर्शीद नदीम ने कहा कि इमरान ख़ान को जो बाइडेन की वजह से निजी तौर पर बेइज़्ज़ती महसूस हुई, उसके चलते उन्होंने यह राय अपनाई.
ये भी पढ़ें:-
अमेरिका को लेकर पीटीआई की नीति दूसरी पार्टियों से कितनी अलग है?
इस बारे में मुर्तज़ा सोलंकी ने कहा कि मौजूदा दौर में अमेरिका को लेकर तीनों पार्टियों की नीतियां उनके बयानों तक सीमित हैं, इनमें से कोई भी पार्टी अमेरिका विरोधी नहीं है.
''जैसे ही ये पार्टियां सत्ता में आती हैं या सत्ता से बहार होती हैं, अपने बयानों में थोड़ा सा बदलाव करती हैं, और ये बयान उस विशेष समय में अमेरिका के प्रति इस्टेब्लिशमेंट के रवैये से भी प्रभावित होते हैं. इस मामले में इस्टेबलिशमेंट कंपास की भूमिका निभाती है.''
इस पहलू पर ख़ुर्शीद नदीम का कहना है कि अमेरिका के बारे में पीपीपी की रणनीति के दो दौर हैं. एक ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का दौर था. जिसके अंत में उन्होंने कहा था कि सफ़ेद हाथी उनके ख़िलाफ़ हैं, लेकिन बाद में बेनज़ीर भुट्टो ने आकर पूरी तरह से अलग पक्ष अपनाया और अमेरिका समर्थक नीति अपनाई.
उनके अनुसार, मुस्लिम लीग (नवाज़) का एक स्पष्ट पक्ष यह है कि वह संघर्ष की राजनीति नहीं करती, चाहे वह अमेरिका हो या भारत, वे संघर्ष से बचते हैं.
जबकि अतीत में ड्रोन हमलों को लेकर इमरान की जो नीति थी वो दिखावटी थी, इसलिए जब वह सत्ता में आये, तो एक भी घटना ऐसी नहीं है कि उन्होंने अमेरिका से अलग हट कर अपनी कोई नीति बनाई हो.'
ये भी पढ़ें:-
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)























