ब्राज़ील में बोलसोनारो की हार और लूला डा सिल्वा की जीत के क्या मायने हैं?

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- ब्राज़ील में लूला डा सिल्वा की जीत को एक नए ट्रेंड के तौर पर देखा जा रहा है
- दक्षिणपंथी नेताओं के उभार के बीच लूला डा सिल्वा का जीतना अहम
- ब्राज़ील में लूला डा सिल्वा की जीत से इकनॉमी सुधरने की उम्मीद
- बोलसोनारो की हार में ग़रीबी और बेरोज़गारी बढ़ने की भूमिका

ब्राज़ील धुर दक्षिणपंथ से वामपंथ की ओर मुड़ गया है. यहां पूर्व राष्ट्रपति और वामपंथी वर्कर्स पार्टी के लुईस ईनास्यू लूला डा सिल्वा सत्ता में लौट आए हैं.
लूला डी सिल्वा ने मौजूदा राष्ट्रपति जाएर बोलसोनारो को हरा दिया है. लूला को 50.9 फ़ीसदी वोट मिले. वो तीसरी बार ब्राज़ील के राष्ट्रपति का पद संभालेंगे.
लूला की ये जीत चौंकाने वाली है क्योंकि आख़िरी वक्त में दोनों के बीच कांटे की टक्कर चल रही थी. बोलसोनारो को 49.1 फ़ीसदी वोट मिले हैं.
ओपिनियन पोल शुरू से ही ये बता रहे थे कि लूला जीतेंगे, लेकिन जब पहले राउंड के चुनावों में बोलसोनारो को लूला के 48 फ़ीसदी के मुक़ाबले 43 फ़ीसदी वोट मिले तो लूला के समर्थक हताश दिखने लगे.
दोनों के बीच वोटों के घटते फ़ासले के बीच जाएर बोलसोनारो के समर्थकों कहना था कि मीडिया और सत्ता प्रतिष्ठान के ताकतवर लोग उनके ख़िलाफ़ हैं. लेकिन बोलसोनारो ज़रूर जीतेंगे.
बहरहाल लूला की जीत ने बोलसोनारो के समर्थकों को झटका दिया है जो लूला पर लगातार 'चोरी' का आरोप लगाते रहे हैं. उनका कहना था कि लूला इसलिए छूट गए क्योंकि उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया ठीक से नहीं चलाई गई.
लूला एक ब्राज़ीली कंस्ट्रक्शन कंपनी से रिश्वत लेने के दोषी पाए गए थे. इसके बदले कंपनी को ब्राज़ील की सरकारी कंपनी पेट्रोब्रास के ठेके मिले थे. इस आरोप में लूला को 580 दिन जेल में बिताने पड़े थे. इसी वजह से वह 2018 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ पाए थे.
अपनी जीत पर लूला बोले, ''उन्होंने (विपक्षियों) तो मुझे जिंदा दफ़्न करने की कोशिश की थी, लेकिन मैं आज आपके सामने खड़ा हूं''
लूला की जीत को इसलिए अहम माना जा रहा है कि इस वक्त मज़बूत दक्षिणपंथी नेताओं के उभार के बीच वह वामपंथ का परचम लहराने में सफल रहे हैं.
करिश्माई नेता हैं लूला

लूला 2003 से लेकर 2006 तक और 2007 से 2010 के बीच दो बार ब्राज़ील के राष्ट्रपति रह चुके हैं. इस दौरान देश में ज़बर्दस्त कमोडिटी बूम दिखा. इसकी बदौलत ब्राज़ील में बड़े पैमाने पर सामाजिक कल्याण के कार्यक्रम शुरू किए गए.
इन कार्यक्रमों की बदौलत ब्राज़ील के करोड़ों लोग ग़रीबी से ऊपर उठे. बोल्सा फ़ेमिलिया जैसी स्कीमों के तहत ग़रीबों के बच्चों को स्कूल भेजने और हेल्थ चेकअप कराने के लिए कैश दिए गए.
लूला के राष्ट्रपति रहते ब्राज़ील की अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ी. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें एक बार इस दुनिया का सबसे लोकप्रिय नेता बताया था.
लूला काफ़ी साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं. 10 साल तक वह पढ़ या लिख नहीं सकते थे. पांचवीं क्लास के बाद उन्हें पढ़ाई बंद करनी पड़ी क्योंकि ग़रीबी की वजह से उन्हें बचपन में ही काम करना पड़ा. वो मेटल वर्कर बन गए और 1975 में कामगार यूनियन के नेता चुने गए.
ब्राज़ील के सैन्य शासन के ख़िलाफ़ उन्होंने मज़दूरों की बड़ी हड़तालों का नेतृत्व किया. 1980 में उन्होंने वर्कर पार्टी की नींव रखी जो बाद में देश में प्रमुख वामपंथी ताक़त बनी.

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गठबंधन की राजनीति के माहिर हैं लूला

ब्राज़ील में लूला की जीत का श्रेय बोलसोनारो की बढ़ती अलोकप्रियता को दिया जा रहा है. कोविड के कुप्रबंधन और देश की लगतार गिरती अर्थव्यवस्था की वजह से लोगों ने एक बार फिर लूला का दामन पकड़ा है.
लेकिन उनकी चुनौती कम नहीं हुई है. बोलसोनारो भले ही हार गए हों, लेकिन संसद में उनके नज़दीकी सांसदों ने बहुमत हासिल कर लिया है. इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में लूला को संसद में अहम बिलों को पारित करने में उनके विरोध का सामना करना होगा.
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि लूला गठबंधन की राजनीति के माहिर हैं. वाइस प्रेसिडेंट के रनिंग मेट के तौर पर उन्होंने अपने पूर्व प्रतिद्वंद्वी जेराल्डो एकमिन को चुना था. एकमिनो लूला के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ चुके थे.
उनकी 'यूनिटी' टिकट की रणनीति कारगर साबित हुई है. इससे वर्कर पार्टी को वोट न देने का फ़ैसला करने वाले वोटरों का भी वोट उन्हें मिला है.
जीत के बाद दिए गए अपने भाषण में लूला ने कहा कि वो ब्राज़ील के सभी लोगों के लिए काम करेंगे, चाहे उन्होंने उन्हें वोट दिया हो या नहीं.
उन्होंने कहा, '' इस देश को शांति और एकता की ज़रूरत है. लोग अब आपस में लड़ना नहीं चाहते.''

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बोलसोनारो पर क्या हैं आरोप, क्यों हारे चुनाव?

लिबरल पार्टी के जाएर बोलसोनारो 2019 में ब्राज़ील के राष्ट्रपति बने. इससे पहले लूला को अपना राजनीतिक गुरु मानने वाली डिल्मा रॉसेफ़ का शासन ख़राब अर्थव्यवस्था और भ्रष्टाचार की वजह से ख़ासा बदनाम हो गया था.
आर्मी में कैप्टन रह चुके धुर दक्षिणपंथी जाएर बोलसोनारो ब्राज़ील की अर्थव्यवस्था को दोबारा मज़बूत करने का वादा कर सत्ता में आए थे.
पिछले एक दशक में ब्राज़ील की गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने का वादा कर सत्ता में आए बोलसोनारो ने बाज़ार और अधिक खोलने और निजीकरण के ज़रिये रोज़गार बढ़ाने और ग़रीबी हटाने का वादा किया था. लेकिन उनके क़दम जल्द ही अलोकप्रिय हो गए.
लूला डा सिल्वा ने चुनाव प्रचार के दौरान आरोप लगाया कि बोलसोनारो बजट में निर्धारित सामाजिक कल्याण योजनाओं का पैसा सांसदों पर लूटा रहे हैं ताकि उनका समर्थन लिया जा सके. कोविड ने बोलसोनारो की लोकप्रियता को काफ़ी बड़ा झटका दिया.
महामारी की शुरुआत से ही ब्राज़ील के राष्ट्रपति बोलसोनारो कोविड-19 के प्रति गंभीर रुख नहीं दिखा रहे थे. वे इसे एक हल्का बुख़ार बता रहे थे. 2021 जब उनसे कोविड-19 से मरने वालों की संख्या को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि "ये सवाल क़ब्रें खोदने वालों के लिए है."

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बोलसोनारो ने सोशल डिस्टेंसिंग का भी विरोध किया. उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था चलती रहनी चाहिए और 'मूर्ख लोग' घर पर रहते हैं.
मध्य आय वर्ग के देश ब्राज़ील, जहाँ बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण की व्यवस्थाएं मौजूद हैं, वहाँ ये हालात कैसे पैदा हुए?
कई लोग मानते हैं कि इसके लिए ब्राज़ील के धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रपति जाएर बोलसोनारो ज़िम्मेदार हैं.
वे सही क़दम उठाकर सबकी मदद कर सकते हैं. लेकिन उन्होंने इसके विपरीत काम किया.
वैक्सीन निर्माता कंपनी फ़ाइज़र ने कहा था कि उनकी कंपनी ने सरकार को बार-बार वैक्सीन बेचने से जुड़ा प्रस्ताव भेजा था.
लेकिन कई महीनों तक इसे अनदेखा किया गया. लगभग 100 ईमेल्स का जवाब नहीं दिया गया.
इस मामले में एक सुनवाई के दौरान एक गवाह ने राष्ट्रपति बोलसोनारो पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि उन्होंने भारत से एक ऐसी वैक्सीन, जिसे मंज़ूरी भी नहीं मिली, उसे बेहद ऊँची क़ीमत और भारी अनियमितताओं के साथ ख़रीदे जाने के अनुबंध की ओर ध्यान दिया.

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बेरोज़गारी, महंगाई और अमेज़न के जंगलों की कटाई

लूला के शासन की तुलना में बोलसोनारो के शासन में महंगाई, बेरोजगारी में लगातार बढ़ोतरी हुई और जीडीपी गिरता गया. ब्राज़ील की इकनॉमी लूला के नेतृत्व में 2002 से 2010 के बीच काफ़ी तेज़ी से बढ़े.
एक वक्त यह 1.89 ट्रिलियन डॉलर के साथ दुनिया की 12वीं सबसे बड़ी इकोनॉमी बन गई. लेकिन बोलसोनारो के शासन में इसमें लगातार गिरावट आती गई. इसके साथ देश में बेरोज़गारी तेज़ी से बढ़ी .
लूला के वक्त देश की महंगाई 14 से घटा कर चार फ़ीसदी तक लाने में कामयाबी मिली थी. लेकिन 2022 में ज़्यादातर वक्त महंगाई दहाई अंक में रही है.
बोलसोनारो पर अमेज़न के जंगलों की कटाई की अनुमति देने का आरोप है. अमेज़न दुनिया का सबसे बड़ा वर्षा वन है. इसका ज़्यादातर हिस्सा ब्राज़ील में है. पेड़ों के काटने से भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन हो रहा है जो जलवायु परिवर्तन के ख़तरे को और बढ़ा रहा है.

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अमेज़न के जंगल की कटाई रिकॉर्ड स्तर पर

ब्राज़ील में अमेज़न के जंगल की कटाई रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. नेशनल स्पेस रिसर्च एजेंसी इनपे (INPE) के मुताबिक़, 2022 के पहले छह महीनों में ही अमेज़न में न्यूयॉर्क शहर से पांच गुना बड़ा इलाका साफ़ हो गया है. यह पिछले साल इन्हीं महीनों में हुई कटाई की तुलना में 10.6 फ़ीसदी ज़्यादा है.
ब्राज़ील में लोगों का आरोप है कि बोलसोनारो अमेज़न के जंगलों के व्यावसायिक दोहन के पक्ष में हैं और इस जंगल का बड़ा हिस्सा निजी कंपनियों को दे दिया गया है. उनका आरोप है कि बोलसोनारो के राष्ट्रपति बनने के बाद से जंगलों की कटाई में तेज़ी आयी है.
साल 2019 में राष्ट्रपति बनने से पहले ही बोलसोनारो ने अमेज़न के अधिक से अधिक व्यावसायिक दोहन के लिए अपना समर्थन ज़ाहिर किया था. इन जंगलों के कटने से यहां रहने वाली जनजातियों का अस्तित्व भी ख़तरे में पड़ गया है.
राष्ट्रपति का तर्क है कि स्थानीय जनजाति (जो देश की 21.30 करोड़ की आबादी में सिर्फ़ 11 करोड़ से कुछ ही अधिक हैं) को उन क्षेत्रों का अधिकार नहीं होने चाहिए जो देश के कुल भूभाग का 13 फ़ीसदी हिस्सा है.

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वामपंथी लहर

लूला की जीत के साथ लातिन अमेरिका की राजनीति में वामपंथ एक बार फिर हावी होता दिख रहा है. हाल के कुछ वर्षों में यहां कई देशों में वामपंथियों की वापसी हुई है. 2018 में मैक्सिको में एंद्रे मैनुअल लोपेज की वामपंथी सरकार सत्ता में आई.
उसके बाद 2019 में अर्जेंटीना में अल्बर्टो फ़र्नांडिस की अगुआई में वामपंथी सरकार ने सत्ता हासिल की. इसके बाद चिली में भी गैब्रियल बोरिक की वामपंथी सरकार सत्ता में आई. पेरू और कोलंबिया में भी वामपंथी दलों ने चुनाव जीता.
पेरू में पेद्रो कैस्तिलो और कोलंबिया में गुस्तावो पेत्रो के नेतृत्व में वामपंथी सरकार बनी. ब्राज़ील में लूला की जीत के बाद लातिन अमेरिका की छह बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों पर वामपंथी राजनेताओं की सरकार होगी.

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क्या बोलसोनारो हार स्वीकार करेंगे?

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में पूछा है कि क्या ब्राज़ील के लोकतांत्रिक संस्थानों पर लगातार चोट करने वाले बोलसोनारो क्या हार स्वीकार करेंगे. उन्होंने देश के वोटिंग सिस्टम को लगातार कमज़ोर किया है. इस वजह से अब उनके लाखों समर्थकों ने देश के चुनावों पर अविश्वास करना शुरू कर दिया है.
चुनाव अभियान काफ़ी तनाव भरा रहा था. बोलसोनारो ने बग़ैर कोई सबूत पेश किए देश के इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए थे.
ब्राज़ील में 1996 में ईवीएम से चुनाव कराने शुरू किए गए थे. हालांकि शुक्रवार को जब बोलसोनारो से एक इंटरव्यू के दौरान चुनाव नतीजों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ''इसमें कोई शक़ नहीं है. डेमोक्रेसी में जो ज़्यादा वोट लाता है. सत्ता उसी की होती है. हालांकि लोगों को उनके इस रुख़ पर विश्वास नहीं हो रहा है.

लूला डा सिल्वा और भारत

लूला के शासन के वक़्त भारत और ब्राज़ील के संबंध काफ़ी अच्छे रहे. 2004 में वह भारत में पहली बार गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि थे.
2007 और 2008 में भी वो भारत आए. 2006 और 2010 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ब्राज़ील गए थे.
पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल 2008 में ब्राज़ील गई थीं. 2009 में जब रूस में ब्रिक (उस समय दक्षिण अफ़्रीका इसका सदस्य नहीं था) का पहला सम्मेलन रूस में हुआ था तो लूला डा सिल्वा ही ब्राज़ील के राष्ट्रपति थे.
(कॉपी - दीपक मंडल)
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