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मिस्र में COP27 जलवायु सम्मेलनः किन बड़े मुद्दों पर रहेगी दुनिया की नज़र
- Author, एस्मे स्टैलर्ड
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ विज्ञान और जलवायु संवाददाता
मिस्र में होने वाले संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण सम्मेलन में वैश्विक नेता जलवायु परिवर्तन के मुद्दे और इसके समाधान पर चर्चा करेंगे.
बीता साल जलवायु से संबंधित आपदाओं से घिरा रहा. कई जगहों पर ज़रूरत से अधिक बारिश हुई और अप्रत्याशित बाढ़ आई तो कई जगहों पर तापमान के रिकॉर्ड टूट गए.
संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन क्या है?
संयुक्त राष्ट्र का जलवायु शिखर सम्मेलन हर साल होता है. इसमें सरकारें वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए उठाए जाने वाले क़दमों पर चर्चा करती हैं और इन पर मुल्कों में सहमति बनती है.
इन्हें सीओपी या 'कांफ्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़' कहा जाता है. इन सम्मेलनों में वो देश शामिल होते हैं जिन्होंने 1992 में हुए मूल जलवायु समझौते पर दस्तख़त किए थे, वही पार्टी भी हैं.
COP27 संयुक्त राष्ट्र की जलवायु के मुद्दे पर 27वीं सालाना बैठक है. ये मिस्र के शर्म अल-शेख़ में 6 से 18 नवंबर के बीच होगी.
इन बैठकों की ज़रूरत क्यों है?
धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है. इसकी मुख्य वजह मानव उत्पादित उत्सर्जन है जो मुख्यतः जीवाश्व ईंधन जैसे तेल, गैस और कोयले के जलने से होता है.
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु वैज्ञानिकों के मुताबिक़ वैश्विक स्तर पर धरती का तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है और इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के मुताबिक़ ये 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने की ओर अग्रसर है.
आईपीसीसी के अनुमान के मुताबिक़ यदि तापमान 1850 के दशक के मुक़ाबले 1.7 या 1.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है तो दुनिया की आधी आबादी जानलेवा गर्मी और आद्रता के दायरे में आ जाएगी.
इसे रोकने के लिए 194 देशों ने साल 2015 में पेरिस समझौता किया था. इसका मक़सद वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम पर रोकना था.
COP27 में कौन-कौन होगा?
इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए 200 से अधिक देशों की सरकारों को आमंत्रित किया गया है.
कुछ बड़े देशों के नेता जैसे ब्रितानी प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शायद इसमें शामिल ना हो पाएं. हालांकि इन देशों के प्रतिनिधि सम्मेलन में हिस्सा लेंगे.
वहीं चीन जैसे कुछ देशों ने भी अपनी अपने नेता की उपस्थिति की पुष्टि नहीं की है.
मेज़बान मिस्र ने देशों से अपने मतभेदों को किनारे करके 'नेतृत्व प्रदर्शित' करने की अपील की है.
वैश्विक नेताओं के अलावा पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन, कम्यूनिटी ग्रुप्स, थिंक टैंक, कारोबारी कंपनियां, धार्मिक समूह भी इस सम्मेलन में हिस्सा लेंगे.
मिस्र में ही क्यों हो रहा है COP27?
ये पांचवीं बार होगा जब अफ़्रीका के किसी हिस्से में जलवायु सम्मेलन हो रहा है.
क्षेत्रीय सरकारों को उम्मीद है कि ये सम्मलेन अफ़्रीका में हो रहे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की तरफ़ वैश्विक समुदाय का ध्यान खींचेगा. आईपीसीसी के मुताबिक़ अफ़्रीका दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है.
अनुमानों के मुताबिक़ इस समय पूर्वी अफ़्रीका में सूख़े की वजह से 1.7 करोड़ लोग खाद्य चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.
हालांकि, मिस्र के सम्मेलन की मेज़बानी करने को लेकर भी विवाद हो रहा है. कुछ मानवाधिकार समूहों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने उन्हें सम्मेलन में हिस्सा लेने से रोक दिया है क्योंक वो सरकार के रिकॉर्ड पर सवाल उठाते रहे हैं.
COP27 में किन-किन मुद्दों पर चर्चा होगी?
बैठक से पहले देशों से अपनी महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय योजनाओं को प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था. अभी तक सिर्फ़ 25 देशों ने ही ऐसा किया है.
COP27 में मुख्य तौर पर तीन बिंदुओं पर चर्चा होगी-
- उत्सर्जन कम करना.
- देशों को जलवायु परिवर्तन से निबटने के लिए तैयार रहने और इस दिशा में क़दम उठाने में मदद करना.
- इन गतिविधियों के लिए विकासशील देशों के लिए फंड सुरक्षित करना.
इसके अलावा COP26 में जो बिंदू छूट गए कुछ बिंदुओं पर भी चर्चा होगी-
- नुक़सान और क्षति वित्तीय सहयोग. जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से उबरने के लिए देशों को पैसा भी मुहैया कराना.
- वैश्विक कार्बन बाज़ार की स्थापना. वैश्विक स्तर पर उत्पादों और सेवाओं की क़ीमत में उत्सर्जन के प्रभावों को भी जोड़ना.
- कोयले का इस्तेमाल कम करने के लिए प्रतिबद्धताओं को और मज़बूत करना.
क्या हमें इस सम्मेलन से कुछ उम्मीदें हैं?
लैंगिक असमानता, कृषि और जैव-विविधता जैसे मुद्दों पर चर्चाओं और घोषणाओं के लिए सम्मेलन के अलग-अलग दिनों की थीम अलग-अलग होगी.
जलवायु पर चर्चाओं के दौरान वित्तीय सहयोग बड़ा मुद्दा रहा है.
2009 में विकसित देशों ने साल 2020 तक विकासशील देशों को उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन के लिए तैयार रहने के लिए 100 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धिता ज़ाहिर की थी. हालांकि ये लक्ष्य हासिल नहीं हो सका और अब इसे 2023 तक हासिल करना है.
लेकिन जिस क्षति और नुक़सान का सामना कर रहे हैं उसकी भरपाई के लिए भी वो फंड मांग रहे हैं.
बॉन में हुए जलवायु सम्मेलन से भुगतान करने के विकल्प को हटा दिया गया था. विकसित देशों को डर है कि अगर उन्हें पैसा चुकाने के लिए मजबूर किया गया तो उन्हें फिर दशकों तक पैसे चुकाते रहना होगा.
यूरोपीय संघ का कहना है कि इस बारे में COP27 में चर्चा होनी चाहिए.
इस सम्मलेन के दौरान आपको ये शब्द ख़ूब सुनने को मिलेंगे-
पेरिस समझौताः ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए हुए पेरिस समझौते ने दुनिया के सभी राष्ट्रों को एकजुट किया है.
आईपीसीसीः जलवायु परिवर्तन पर गठित इस पैनल में कई देशों के वैज्ञानिक शामिल हैं जो जलवायु परिवर्तन पर नवीनतम शोधों पर अध्ययन करते हैं.
1.5 डिग्री सीःवैश्विक तापमान वृद्धि को ओद्योगिक समय से पहले की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रखना जलवायु सम्मेलन का लक्ष्य है. यदि ये लक्ष्य हासिल होगा तो जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी परिणामों को रोका जा सकेगा.
हमें कैसे पता चलेगा कि सम्मेलन कामयाब रहा?
ये इस पर निर्भर करता है कि आप किससे बात कर रहे हैं.
विकासशील देश, कम से कम, ये चाहेंगे कि नुक़सान और क्षति के लिए वित्तीय सहयोग एजेंडा में रहे. वो चाहेंगे कि कम से कम उन्हें फंड मिलने की शुरुआत होने की एक तारीख़ या समयसीमा तय हो जाए.
विकसित देश चाहेंगे कि विकासशील देश जैसे कि चीन, भारत, ब्राज़ील, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ़्रीका कोयले का इस्तेमाल ख़त्म करने पर अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर करें.
पिछले साल जंगलों, कोयले और मीथेन गैस को लेकर कुछ समझौते हुए थे. कुछ और देश इन पर हस्ताक्षर कर सकते हैं.
हालांकि कुछ वैज्ञानिकों का ये मानना है कि वैश्विक नेताओं ने जलवायु परिवर्तन पर फ़ैसले लेने में बहुत देर कर दी है और अब चाहें जो भी समझौते हों, 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को COP27 में हासिल नहीं किया जा सकेगा.
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